जंगल से बाहर आ गए, भीतर से अभी भी जंगली हैं || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य: देखो, आदमी बहुत पुराना है। है न? जो पूरी हमारी विकास की प्रक्रिया ही रही है जिसमें हम जंगल से उठे हैं, वो करोड़ों साल पुरानी है। जैसा हम मनुष्य को जानते हैं, कम–से–कम सत्तर हजार साल पुराना है। और जैसा हमारा आज का शारीरिक आकार है और रूप है, ये लगभग ऐसा ही लाखों साल पहले भी था। और जैसे हमने विचार करना शुरू कर दिया है। हम सोचने लगे हैं न? हमारे पास आज भाषा है।
ये सब पिछले पचास हज़ार साल, सत्तर हज़ार साल से लगभग ऐसा ही है, इतने पुराने हैं हम। हम तब भी परेशान थे, जबकि तब हमारे पास वैसा कोई मुद्दा नहीं था जैसा हमारे पास आज है। आज आप परेशान हो, आपका आईफोन खो गया, तब आईफोन था क्या? आज आप परेशान हो कि आपका वीजा नहीं लग रहा, अमेरिका का। तब अमेरिका का वीजा लगता था क्या?
लेकिन आप उस समय के आदमी को लेकर के आयें और आज के आदमी के बगल में खड़ा कर दें। दोनों को कपड़े एक से पहना दें, किसी भी तरह के एक से कपड़े पहना दें दोनों को। आपको दोनों की शक्लों में अन्तर करना मुश्किल हो जाएगा। आप हज़ारों साल पहले के एक आदमी को लेकर के आयें और आप उसे अपने बगल में खड़ा कर दें। बस कपड़े उसे अपने जैसे पहना दीजिए।
आपको चेहरों में और आखों में अन्तर करना मुश्किल पड़ जाएगा। वो भी परेशान था, वो भी दुखी था, वो भी कामनाग्रस्त था, वो भी क्रोधित था, वो भी आतंकित था; ठीक वैसे जैसे हम हैं। लेकिन हमारे ऊपर जब ये सब चीज़ें आती हैं तो हमें लगता है वो हमारी हैं। वो हमारी नहीं हैं, वो इतिहास की हैं। वो प्रकृति की हैं, वो सदा से रही हैं। और जैसा हमारा ये शरीर है ऐसा ही रहा तो वो आगे भी रहेंगी। ये ताप मन का नहीं, तन का है।
आप पुरानी सब लड़ाईयाँ देखो इतिहास की, वो किन मुद्दों पर हुईं हैं, क्या मुद्दे थे? महाभारत की लड़ाई किन मुद्दों पर हुई थी? यूरोप के क्रूसेड्स किन मुद्दे पर हुए थे?



