कॉन्फ़िडेंस का मतलब ये नहीं होता कि आप भयमुक्त हो गए। कॉन्फ़िडेंस का मतलब होता है कि भीतर भय तो बिराजा ही हुआ है उसके ऊपर आप निर्भय दिखने की कोशिश कर रहे हो। अगर भीतर वो डर मौजूद नहीं होता तो आपको कॉन्फ़िडेंस की ज़रूरत पड़ती ही नहीं। डर छोड़ना आसान है, बस डर के साथ जो सुख सुविधाएँ मिलती हैं उनका लालच थोड़ा छोड़ दीजिए।
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प्रश्नकर्ता: मैं देखती हूँ कि ग्रंथों के और अध्यात्म के जो मूल सिद्धांत हैं, बहुत लोग हैं जो उनके बिल्कुल विपरीत जी रहें हैं। मुझे साफ़ दिखाई देता है कि वो एक गलत ज़िन्दगी आगे बढ़ा रहें हैं। लेकिन फिर भी उनमें भरपूर आत्मविश्वास होता है। मैं समझना चाहतीं हूँ कि लोग इतनी गलत ज़िन्दगी जीते हुए भी इतने कॉन्फ़िडेंट (आत्मविश्वासी) कैसे रहते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो, अगर तुम एक करुणा-विरुद्ध, बोध-विरुद्ध, धर्मविहीन जीवन जी रहे हो तो कोई वजह होगी न! वजह है — भय और सुख। दोनों साथ चलते हैं। समझिएगा। आप जैसी ज़िन्दगी जी रहें हैं उसमें भ्रम है, धोखा है, हिंसा है, अप्रेम है, लालच है तमाम तरीक़े के; लेकिन उसमें से आपको कुछ तात्कालिक सुख मिलते जा रहे हैं। किस तरह के सुख? कि मानसिक तल की सुरक्षा मिल गई कि तुम जो कर रहे हो, ये करते रहो।
अगर ये करते रहोगे आज, तो आश्वस्ति है कल तुमको फ़लाने तरह का फल मिलता रहेगा। तुम्हारा भविष्य अनिश्चित नहीं रहेगा। भले ही आज जो कर रहे हो वो गलत है, पर अगर तुम ये करते चलो तो भविष्य में सुरक्षा का आश्वासन तुमको उपलब्ध रहेगा। तो आपको सुख मिल गया। तुम आज जो कर रहे हो करते चलो, भले ही तुमको पता है कि वो सही नहीं है, लेकिन उसके बदले में तुमको पैसा मिलता चलेगा। तो आप करते चलोगे।




