(गीता-10) दुख का अंत सुख पाकर नहीं होता || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, सांख्ययोग, दूसरा अध्याय, बावनवाँ श्लोक।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।२.५२।।
जब तुम्हारी बुद्धि, मोह या अज्ञान रूप पाप को छोड़ देगी तब सुनने योग्य और सुने हुए विषयों में तुम्हें वैराग्य प्राप्त होगा अर्थात् वे विषय तुम्हारे सामने निरर्थक हो जाएँगे।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ५२
अर्जुन को कह रहे हैं श्रीकृष्ण — “जब तुम्हारी बुद्धि, मोह या अज्ञान रूप पाप को छोड़ देगी तब सुनने योग्य और सुने हुए विषयों में तुम्हें वैराग्य प्राप्त होगा अर्थात् वे विषय तुम्हारे सामने निरर्थक हो जाएँगे।”
जिस शब्द का उपयोग करते हैं कृष्ण, वो है 'निर्वेद'। 'तुम निर्वेद हो जाओगे, अर्जुन! तुम्हारे मन से मोह और अज्ञान जब हटेगा तो जितनी सुनी-सुनाई बातें हैं, इनके पाश से तुम मुक्त हो जाओगे।'
पिछले कुछ श्लोकों में भी कृष्ण कह रहे हैं कि वेदों में जो कामना-मूलक कर्म हैं, जो व्यक्ति उन्हीं के प्रति ज़्यादा प्रशंसा और आतुरता रखता है, उस व्यक्ति को कभी ज्ञान नहीं प्राप्त हो पाता। यहाँ भी निर्वेद होने के लिए कह रहे हैं।





