प्रश्न: आचार्य जी, बुरी आदतें कैसे छोड़ें? तम्बाकू की लत हो कैसे छोड़ें?
आचार्य प्रशांत जी:
तम्बाकू हो, या निंदा हो, या माँस हो, या आलस हो, हर आदत सत्य का, मौज का, एक विकल्प होती है। असफल और सस्ता विकल्प।
असली चीज़ नहीं मिली है, तो तम्बाकू चबा रहे हो, जैसे बच्चे को माँ न मिले, तो अँगूठा चूसे।
श्रोता: वो रग, रग में चली गई होती है।
आचार्य प्रशांत जी:
अरे रग-रग कराह किसके लिए रही है, उसका तो नाम लो। तम्बाकू रग-रग में भरोगे, तो कैंसर ही मिलेगा अधिक-से-अधिक। रग-रग में राम भर लोगे, तो मुक्ति मिल जाएगी। जो तड़प मुक्ति के लिए उठ रही है, उस तड़प के एवज में तुम्हें कैंसर मिल जाए, ये कहाँ की अक्ल है? चाहिए था राम, और लो आए कैंसर, बढ़िया।




