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अच्छा काम करने में डर की बाधा || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत : मनीष ने कहा है कि जब भी कोई अच्छा काम करना चाहता हूँ, तो भीतर से एक डर उठता है जो उस काम को करने से रोकता है । सत्र में आने से पहले भी ऐसा ही होता है ।

तो तुम आ गए ना सत्र में? बस, उस डर के साथ यही सलूक किया करो । उसका क्या काम है? रोकना । और तुम्हारा क्या काम है? आना । उसे अपना काम करने दो, तुम अपना काम करो । वो जो भीतर है ना, वो भीतर हो के भीन ज़रा पराया है । उसको समझना । मनीष, जो ये भीतर है ना, जो कुछ करने को कहता है, कुछ करने को रोकता है, वो यूँ तो लगता है कि जैसे भीतर है पर वो वास्तव में पराया है । तुम दो हो, एक वो जो तुम अभी हो, और दुसरे वो जो तुम शताब्दियों से हो, सदियों से हो । नहीं समझे?

अभी तुम ध्यान हो ।

जानने वालों ने कहा है कि यही सत्य है । इसके अलावा तुम्हारी कोई पहचान सच्ची नहीं । जब तुम ध्यान में हो, उस वक़्त तुम्हारी सारी पहचानें कहाँ जाती हैं? हाँ? पता नहीं कहाँ जाती हैं, कौन जाने कहाँ गयी? अच्छा, आप ध्यान से सुन रहे हैं – कहिये कि आप, आप, और आप (भिन्न श्रोताओं की ओर इंगित करते हुए) । तो दो जने पुरुष हैं और दो जने स्त्री हैं । एक जन ज़रा प्रौढ़ है एक ज़रा युवा हैं । एक किसी पृष्टभूमि से आते होंगे दूसरे किसी पृष्टभूमि से आते हैं । आर्थिक स्थिति, जातीयता, भाषा, खानपान, इत्यादि में भी खूब भेद होगा? वो सारी पहचाने कहाँ चली गयी थी पिछले आधे घंटे में? पिछले आधे घंटे में जब मुझे ध्यान से सुन रहे थे तो क्या इनके ध्यान, इनके ध्यान और इनके ध्यान में कोई अंतर था? क्या तुम कहोगे कि इनका ध्यान स्त्री का ध्यान था और इनका ध्यान पुरुष का ध्यान था? स्त्री पीछे छूट गयी । कौन बचा?

श्रोता : ध्यान ।

आचार्य जी : प्रौढ़ता पीछे छूट गयी, क्या बचा?

श्रोता : ध्यान ।

आचार्य जी: यौवन पीछे छूट गया, अभी क्या था?

श्रोता : ध्यान ।

आचार्य जी: अभी तुम ये तो नहीं कहोगे ना कि यहाँ यदि पचास लोग हैं तो यहाँ पचास तरह के ध्यान हैं? अगर पचास तरह के ध्यान हैं तो अभी ध्यान लगा नहीं । यदि ध्यान में अभी किस्में हैं और ध्यान के भी रूप रंग और नाम हैं तो फिर ध्यान अभी? लगा नहीं ।

तो एक तो तुम वो हो जो अभी होते हो । उसका नाम है विशुद्ध ध्यान, मौजूदगी, उपस्थिति और उसमें कोई और पहचान मायने नहीं रखती । उसमें तुम ये नहीं कहोगे कि अभी मैं स्त्री हूँ, अभी ये हूँ, अभी वो हूँ । अभी तुम यहाँ जितने बैठे हो, तुम सब विशुद्ध चैतन्य मूर्ति हो और ये सब मूर्तियाँ निराकार हैं । तो इनके चेहरे नहीं हैं । इनका कोई नाम आकार इत्यादि नहीं हैं । तुम ये इसलिए नहीं कह पाओगे कि ये अलग-अलग हैं ।

एक ये है तुम्हारी सच्चाई, तुम्हारी हक़ीक़त, मनीष । और दूसरी तुम्हारी हक़ीक़त वो है जो तम अपने जिस्म में ले के घूम रहे हो ।

वो चली आ रही है पीछे अनंत काल से । मैंने तो बस इतना ही कहा था सदियों से शताब्दियों से । सदी और शताब्दी तो बड़े छोटे काल खंड होते हैं । वो सहस्रों युगों से चली आ रही धारा है । उसमें तुम्हारी आँख छुपी है, तुम्हारा बाल छुपा है, तुम्हारे कान छुपे हैं, तुम्हारी जाति, धर्म, संस्कार, धारणाएँ, अरे पता नहीं क्या क्या छुपा है । तुम्हारे बाल यूँ ही थोड़े ही काले हैं ! तुम्हारे बाल क्यों काले हैं? काल की अनंत धारा ने तुम्हारे बालों को किया काला । और उसी धारा ने किसी और के बालों को? सफ़ेद कर दिया, भूरा कर दिया, कितने रंग के बाल होते हैं दुनिया में? अब, इनके बाल उड़े हुए हैं, उनके बाल खूब घने हैं । इसका संबंध तुम्हारी अभी की स्थिति से नहीं है । इसका संबंध है तुम्हारे गहन अतीत से । कोई स्त्री है, कोई पुरुष है, कोई कुछ है, कोई कुछ है, कोई मोटा, कोई पतला । तमाम तरह के भेद होते हैं, जीव-जीव में । ध्यान में उन सब भेदों का, कोई अर्थ नहीं रह जाता ।

लेकिन ध्यान में जब तुम नहीं हो, जब ध्यान टूटा, तो फिर वही सारी पहचाने हावी हो जाती है, तुम वही हो जाते हो । ध्यान टूटेगा, तुम पुनः स्त्री हो जाओगे, तुम पुनः पुरुष हो जाओगे, बूढ़े हो जाओगे, बच्चे हो जाओगे, अमीर हो जाओगे, गरीब हो जाओगे । कोई हिन्दू हो जाएगा, कोई मुसलमान हो जाएगा ।

*ध्यान* में मुसलमान नहीं रहता या कह दो कि ध्यान में मुसलमान ‘सच्चा’ मुसलमान हो जाता है और हिन्दु ‘सच्चा’ हिन्दु हो जाता है ।

दोनों ही बातें ठीक हैं । तो वो जो दूसरा है जो कहाँ से आ रहा है? पीछे से । तो मैंने कहा वो लगता तो यूँ है जैसे तुम्हारे साथ है, तुम्हारे भीतर है, पर वो है ज़रा?

श्रोता : पराया ।

आचार्य जी: पराया । उसको पराया ही जानना । वो अपना काम करेगा तुम उसे रोक नहीं पाओगे । उसकी बढ़ी हस्ती है । वो माया का बेटा है । वो साक्षात माया ही है ।

हम सब अपने भीतर दो को ले कर घूमते हैं । पहला कौन? वो जो हम वास्तव में हैं । वो जो हम हो जाते हैं, किन पलों में?

श्रोता : ध्यान में ।

आचार्य जी: ध्यान में । और वो जिसने हमें ये योनि दी है, ये माथा दिया है, बुद्धि दी है, यादाश्त दी है । ये हाड़ माँस दिया है, दूसरा वो है । उसकी ताकत को भी बहुत कम मत मान लेना । उसकी ताकत बहुत है, बस परमात्मा से ज़रा सी कम है । तो उससे कोई और नहीं निपट सकता उससे बस राम निपट सकते हैं । तुम ये सोचो अगर, जैसा तुमने अपने प्रश्न में लिखा, कि तुम उसकी आवाज़ को मूक कर दो, तो कर नहीं पाओगे । उसकी बहुत ताकत है, वो गुर्रा के, चिल्ला के बोलता है । और जब वो हावी होता है, तो अच्छे अच्छों का दम निकल जाता है । गुस्से का क्षण देखा है क्या होता है? क्या होता है? अब उस समय एक ही पहचान बची है, क्या? वही । ध्यान तो गया । पता नहीं कहाँ गया । या विक्षिप्तता, पागलपन या काम का उन्माद । इनको हल्का मानते हो? कोई है जो इनको हल्का मानता हो? अरे मान मत लेना । बड़ी पटकी खाओगे ।

आ रही है बात समझ में?

वो अपना काम करेगा । जब तक ये संसार है तब तक उस दूसरे को अपना काम करने का पूरा हक़ है । उसे उसका काम करने देना, तुम अपना काम करना । तुम्हारे पास ये विकल्प उपलब्ध है, कि तुम उसकी सुनो कि इसकी सुनो । तुम किसकी सुनना? जो सच्चे वाले तुम हो उसकी सुनना ।

लोग शास्त्रीय तौर पर कहते हैं कि ‘हम दो हैं’ ।

मैं तो कहता हूँ, ‘हम तीन हैं’ । एक सच्चा, एक झूठा, और एक वो जो सच्चे और झूठे में चुनाव करता है कि सच्चे के साथ होना है कि झूठे के साथ होना है । सच्चा भी आवाज़ देता है, और झूठा भी आवाज़ देता है । मेरी सारी शिक्षा इतनी ही है कि तुम सच्चे की सुनना ।

* झूठे की आवाज़ घोटने की कोशिश मत करना । झूठा बोलता रहेगा । जिस दिन तक ये जिस्म है, उस दिन तक वो सारे संस्कार और प्रभाव और काल की धारा, बोलते ही रहेंगे, जिन्होंने तुम्हें ये जिस्म दिया । वो सब बोलेंगे ।* क्रोध भी आएगा, थकान भी होगी, इच्छाएँ भी उठेंगी, वासना भी उठेंगी, वो सब अपनी-अपनी बात करते रहेंगे । बस तुम उनकी बात पर ज़ोर मत देना । उनके पक्ष में मत खड़े हो जाना । तुम तो सदा एक के ही पक्ष में रहना । किसके पक्ष में? जो तुम अभी हो, ध्यान में । ठीक है?

और ना बुरा मानना । तुम कहो कि हमने खूब सतसंग कर लिए, खूब ग्रन्थ पढ़ लिए । उसके बाद भी पुरानी आवाज़ें पीछा क्यों करती हैं? अरे छोड़ो ! वो पुरानी आवाज़ें किसी को नहीं छोड़ती ।

कबीर कहते हैं, “सुर, नर, यति, मुनि, सन्यासी किसी को नहीं छोड़ती” । करो पूरा क्या कर रहे थे !

श्रोता : लाग रहे बहु फिकरे में ।

आचार्य जी: तो पीछा वो सब का करती हैं । बस आदमी और आदमी में फर्क ये होता है कि कोई उसकी आवाज़ को महत्व देता है, और कोई महत्व नहीं देता । तुम महत्व मत देना । सुन लेना । मूल्य मत देना ।

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