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माया का असली रूप || योगवासिष्ठ सार पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
32 min
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हे राम! माया ऐसी है कि अपने नाश से एक अनूठा आनंद उत्पन्न करती है। इसका स्वरुप जाना नहीं जा सकता है और यह ध्यान से देखने मात्र से नष्ट हो जाती है। —योगवासिष्ठ सार

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसका भावार्थ बताएँ।

आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें कही हैं। पहला, अपने नाश से एक अनूठा आनंद उत्पन्न करती है; दूसरा, इसे जाना नहीं जा सकता है। और तीसरी बात, ध्यान से देखने से मिट जाती है। क्या है ये? आप खुश हो जाते हो कि मिटी तृष्णा, मिटी वासना—जो लक्ष्य किया था, वो मिल गया; दुश्मन पर फ़तह हुई, शत्रु का नाश हुआ। और आपको ये नहीं पता होता कि जो मिला है, वो अपने मिलने के कारण ही और भूख पैदा करेगा।

पानी पीते हो तो प्यास बुझती है। शराब पीते हो तो प्यास लगती है। समझना, एक पेय पदार्थ वो होता है जिसको पियो तो तृष्णा बुझेगी और दूसरा पेय पदार्थ वो होता है जिसको आत्मगत करोगे तो तृष्णा और बढ़ेगी, और आग लगेगी। पर उस पल क्या लगेगा जिस पल तुम उसका सेवन कर रहे हो? उस पल तो बड़ा अच्छा लगेगा। तो तुम्हें तो यही लगेगा कि प्यास का नाश हुआ, तुम्हें तो यही लगेगा कि तुम्हें इच्छित वस्तु मिली। अब मिली है या तुम उससे और दूर हो गए?

तुम चाहते क्या थे? तुम चाहते थे तृष्णा का नाश। तुम चाहते थे प्यास से मुक्ति, और तुमने पी क्या लिया? तुमने कुछ ऐसा पी लिया जो प्यास को और बढ़ाएगा। तो तुम खुश तो बहुत हो रहे हो, पर थोड़ी देर में तुम्हें पता चलेगा कि बात क्या है।

माया का अर्थ है वो इच्छाएँ जो तुम्हें यह भ्रम देती हैं कि वो कभी भी पूरी हो सकती हैं। तो तुम इस भ्रम में हो कि पूरी हो जाएँगी तो आनंद मिल जाएगा, तृप्ति मिल जाएगी। तुम यह नहीं समझ पाते कि वो यदि पूरी हुईं तो उसके पीछे चार और खड़ी हैं। कर लो पूरी!

जैसे कोई ट्रक की चेसिस खरीद लाए, अब चला लो ट्रक , या कोई ट्रक का इंजन खरीद लाया, चला लो! अब थोड़ा सा खरीदा है तो पूरा खरीदना पड़ेगा। घर खरीदा है तो अब उसमें सामान भी रखो न। भाई, फर्निशिंग चलेगी अब, अभी तो घर आया है बस। हो गई फर्निशिंग , अब उसमें रहने वाले भी तो चाहिए, तो ब्याह करो जाकर नहीं तो इतना बड़ा घर काहे को लाए? अब ब्याह हो गया तो छौने भी तो होंगे। कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।

एक इच्छा पूरी होती है, वो अपने पीछे पाँच और लेकर आती है। इच्छाओं का नाश नहीं हो रहा है, यह इच्छाओं का संवर्धन हो रहा है, विस्फोट है।

ये ऐसी-सी बात है कि दीवाली पर वो हज़ार वाली लड़ी हो और उस लड़ी के पहले पटाखे से तुम्हें दुश्मनी हो, कि “ये जो इच्छा है, इसको नष्ट करना है।” तुम उसे नष्ट कैसे करते हो? उसमें आग लगाकर। वो हज़ार की लड़ी है और तुम पहला पटाखा नष्ट करना चाहते हो। और तुम बड़े खुश हो कि, “ये देखो, आज मैं इसमें आग लगाकर इसको भस्म ही कर दूँगा।” तुम जाकर उस पहले पटाखे में आग लगा देते हो और बड़े खुश हो कि लगा दी आग। तुम ये भूल गए कि अब क्या होगा। और यहाँ तो अनंत लड़ी है। तुम खुश होते रहते हो कि कुछ मिला। तुम्हें यह नहीं पता होता है कि क्या फटा, क्या सिला।

फिर दूसरी बात क्या कही है?

प्र१: इसका स्वरुप जाना नहीं जा सकता।

आचार्य: या यह लिखा है कि मात्र ध्यान में जाना जा सकता है? तो जो आम चेतना होती है, जिसमें हम लोग जीते हैं, उसमें नहीं पता चलती ये माया। उसमें वो माया नहीं है, उसमें वो परमात्मा है। दिख ही जाए कि माया है तो आप भाग नहीं लेंगे?

जो हमारी आम द्वैतात्मक चेतना है—सांसारिक चेतना, जिसमें हम आमतौर पर जीते हैं—उसमें इच्छाएँ बुरी थोड़े ही लगती हैं, उसमें तो इच्छाएँ आकृष्ट करती हैं, लोभित करती हैं, प्यारी चीज़ लगती हैं न? असल में प्यार का अर्थ ही इच्छा होता है। जिसकी इच्छा उठे, उसे हम कहते हैं, “तुझसे प्यार हुआ।”

तो उसका स्वरुप जाना नहीं जा सकता। कब तक जाना नहीं जा सकता? जब तक खूब पिटाई न हो जाए। जब पिट लोगे खूब, तब सब जान जाओगे। उसके पहले तो कुछ नहीं।

फिर है कि ध्यान से देखने मात्र से नष्ट हो जाती है। ध्यान से देखोगे कैसे? पिट जो रहा है, वो शराबी है, अब वो अगर कोशिश भी बहुत करे ध्यान से देखने की तो उसे दिखेगा क्या? वो पिट ही इसीलिए रहा है क्योंकि वो शराबी है, और चूँकि शराबी है इसलिए पिटता रहेगा क्योंकि पिटाई रोकने का एक ही तरीका है, क्या? ध्यान। और ध्यान शराबी को उपलब्ध होगा नहीं। तो तुम तो फँसे, बच्चू! इस दुष्चक्र से बाहर आओगे कैसे?

तुम क्यों पिट रहे हो? क्योंकि तुम शराबी हो। पिटाई रोकने का एक ही तरीका है - ध्यान। और ध्यान तुम्हें मिलेगा नहीं क्योंकि तुम शराबी हो, तो पिटो। एक ही साधन है मुक्ति का—इतना पिटो, इतना पिटो कि शराब उतर जाए। इतना पिटो कि सारा नशा छूमंतर हो जाए, और पिटते ही जाओ।

शराबी बेचारे का अभाग ये होता है कि उसे तो ये पता भी नहीं होता कि उसे पीट कौन रहा है, तो ध्यान से देखेगा क्या? कोई बड़ी बात नहीं है कि कोई पीट न रहा हो, खम्बों पर सिर दे रहा हो अपना। तुम्हें पता है कौन तुम्हें पीट रहा है? ईमानदारी से बताओ। ज़्यादा पिटता है तो एक और चढ़ा लेता है बोतल। पिटाई से बचने का साधन - बेहोशी। और पिटे, और बेहोश हो जाओ। पता ही नहीं चलेगा कि कितने ज़ख्म हैं, कितना अपमान।

ध्यान से देखने से माया नहीं नष्ट होती, ध्यान से देखने से तुम्हारी आत्मघाती प्रवृति रुक जाती है।

ध्यान अगर नहीं है तो तुम क्या कर रहे हो? वहीं दीवारों पर, पत्थरों पर, खम्बों पर सिर दे रहे हो और क्या कर रहे हो! प्रमाण इसका यह है, फिर पूछ रहा हूँ, तुम्हें पता भी है कि तुम्हारा दुश्मन कौन है? तुम्हें पता भी है कि तुम्हें कौन पीट रहा है? तुम अनुमान लगाते हो और अनुमान सारे ग़लत हैं।

तुम्हें पता भी नहीं है कि तुम्हें कौन पीट कर चला गया। तुम व्यर्थ ही किसी और को झापड़ मार रहे हो। तुम दुनिया में सबसे लड़ रहे हो क्योंकि वास्तव में तुम अपने-आप से खीझे हुए हो। तुम्हें अपने असली दुश्मन का नाम, पता, चेहरा कुछ नहीं मालूम इसीलिए पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन है; क्योंकि जो नहीं जानता कि कौन मेरा दुश्मन है, उसके लिए तो सब शक़ के दायरे में आते हैं। पूरी दुनिया उसकी दुश्मन है, वो सबसे लड़ेगा।

दुश्मन उसका सिर्फ़ एक है - उसका अपना नशा। ज़िन्दगी वो ऐसी जी रहा है कि नशा उतर रहा होता है तो वो फिर चढ़ा लेता है। कुछ-न-कुछ उसे ऐसा करना है कि नशा कायम रहे। गहरी और गन्दी आदत—यही माया है—वहाँ दुश्मन देखना जहाँ दुश्मन है नहीं, और जहाँ दुश्मन है, वहाँ कुछ देख न पाना, और जब सहायता आए तो उसे ठुकरा देना।

प्र१: ऋषि ‘नाश’ शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं?

आचार्य: आपको ऐसा लगता है कि आप नाश कर रहे हो उसका। आपको कुछ तो चाहिए न यह अनुभव करने के लिए कि आप बढ़िया आदमी हो।

प्र१: नाश कर रहे होते हैं या पूर्ति कर रहे होते हैं?

आचार्य: हाँ, पूर्ति के माध्यम से नाश। 'मैंने अपनी भूख का नाश कर दिया', ऐसे। 'मुझे किसी चीज़ की कमी बहुत सताती थी। मुझे जो चीज़ सता रही थी, मैंने उसका नाश कर दिया', उस अर्थ में।

प्र२: पिछले कुछ सालों से अर्धचेतन मन, पावर ऑफ़ सबकॉन्शियस माइंड (अर्धचेतन मन की शक्ति), जिसमें बड़ी बातें की जाती हैं, मैनिफेस्टेशन (अभिव्यक्ति), थॉट (विचार), फीलिंग (भावना), ये सब और लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन (आकर्षण का सिद्धांत), इन पर बहुत कुछ लिखा गया है। मैं भी इनकी तरफ़ आकर्षित हुआ था पर अब मुझे लगता है कि ये सब मार्केटिंग के अलावा और कुछ नहीं है। आचार्य जी, कृपया इनकी सत्यता पर प्रकाश डालें।

आचार्य: अब क्या करें आचार्य जी? जितने साल आपको गँवाने थे गँवा ही आए, और जो आपको पता लगना था, वो भी लग ही गया, तो अब मेरे करने के लिए क्या बचा? भारतीय हो आप—और मैं आपकी राष्ट्रीयता की बात नहीं कर रहा, मैं आपके कुनबे की बात कर रहा हूँ, आपकी आत्मा की बात कर रहा हूँ—आपको ग्रंथों की कमी थी जो ये सब पढ़ने गए थे, पावर ऑफ़ सबकॉन्शियस माइंड , लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन ?

गीता से आपका पेट नहीं भरा? अष्टावक्र आपका ह्रदय नहीं भर पाए? उपनिषद् आपके मन को पूर्ति नहीं दे पाए जो आपने ये सब पढ़ा? क्यों पढ़ा आपने ये सब, क्यों अपने साल व्यर्थ किये? दम कितना था उनमें? दम कुछ नहीं था। सच्चाई की उन पर ज़रा सी रोशनी पड़ी नहीं कि अब वो सब आपको व्यर्थ लगते हैं। व्यर्थ वो उनको भी लगते हैं जो उनके मुरीद हैं, जो उनके बड़े समर्थक हैं, उन्हें भी वो व्यर्थ लगते हैं, पर उन्हें कोई विकल्प नहीं मिलता।

सबको ज्ञान चाहिए, सब ज्ञानी होना चाहते हैं। सब अपनी ओर से पते की ही बात करना चाहते हैं। सब यही चाहते हैं कि कुछ ऐसी बात बोलें जो जम जाए, कोई ऐसी बात बोलें जिसमें दम हो। लोगों का फेसबुक स्टेटस देखिए। हर आदमी ज्ञान की ही तो बात करना चाहता है न? ठीक है, कभी हँसकर, कभी रोकर, कभी गंभीर होकर, पर हर आदमी कोई पते की बात बोलना चाहता है। पते की बात समझ रहे हो? गहरी बात, और गहरा माने क्या? सत्य। पर उन्हें कुछ मिलता नहीं तो वो इधर-उधर की बातें बोलते हैं।

अंग्रेज़ी के बड़े आशिक़ हो तो अंग्रेज़ी पुस्तक भंडार में घुस जाते हो। वहाँ पर यही सब छाए हुए हैं, नियो-स्पिरिचुअलिस्ट्स , और ये तुमको बड़ी बातें पढ़ा देते हैं। " सबकॉन्शियस माइंड है, उसमें ये कर दो, वो कर दो, उससे तुम अपनी सारी हसरतें पूरी कर पाओगे। तुम्हारे चैतन्य मन में सिर्फ़ एक प्रतिशत ताक़त है, निन्यानवे छुपी हुई है। उस निन्यानवे को बाहर निकालो तो तुम सुपरमैन हो जाओगे।" उससे क्या होगा? "उससे तुम्हें जो चाहिए मिलेगा!"

"बोलो कौन सी लड़की चाहिए? अभी अध्यात्म के द्वारा उपलब्ध कराते हैं। बोलो कौन सी नौकरी चाहिए? बोलो किसको दबाना है? बोलो किस पर छाना है? समाज में प्रतिष्ठा चाहिए? रुपया चाहिए, पैसा चाहिए, कुर्ता-पजामा चाहिए, क्या चाहिए? सब अध्यात्म से मिलेगा। एक साल का पिज़्ज़ा मुफ़्त, अमेरिकन अध्यात्म!"

लोग पढ़ भी रहे हैं, और जब ये सब पढ़ रहे होते हो तुम्हें उपनिषद् ज़रा भी याद नहीं आते। तुम बिलकुल अपने माँ-बाप को भूल जाते हो। तुम ऐसा आठवें तल्ले पर जाकर खड़े होते हो कि मिट्टी की खुशबू तुम्हें ज़रा भी नहीं आती।

जिन दुकानों से तुमने वो सब किताबें खरीदीं थी, उन दुकानों में योगवासिष्ठ तो नहीं पाया होगा न, कि मिला था? क्यों गए उन दुकानों में, ऐसे दुकानदार से तुमने सम्बन्ध क्यों रखा जो अपनी दुकान में योगवासिष्ठ न रखे? वो लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन रख रहा है पर ईशावास्य नहीं रख रहा, इससे तुम्हें उसकी औक़ात का और जात का पता नहीं चल रहा? तुम जा क्यों रहे हो उसके पास?

और सब ऐसे ही हैं। बड़ा कूल लगता है कि तुम ट्रैन में बैठे हो, कि फ्लाइट में बैठे हो और तुम्हारे हाथ में एक अंग्रेजी की किताब है। ताज़ा-ताज़ा अभी, आज के किसी अंग्रेज़ गुरु से निकलकर आई है, और वो तुमको बता रहा है थॉट क्या होता है, फीलिंग क्या होती है, और घूम-फिरकर तुमको यही बता रहा है कि तुम अपनी हसरतें पूरी कैसे कर सकते हो। वो तुम्हें सारे समाधान दे रहा है। और कितना लुभावना लगता है न!

तब कबीर की आवाज़ तुम्हें सुनाई नहीं देगी क्योंकि कबीर तो देसी बोलते हैं, भाई। हिंदी भी नहीं बोलते, अवधी बोलते हैं। अवधी भी उनकी शुद्ध नहीं है। न जाने कहाँ-कहाँ की क्षेत्रीय भाषाएँ उनकी बोली में सम्मिलित हैं। और यहाँ पर खड़ी अंग्रेज़ी में दनादन वो बोल रहा है, और जो बोल रहा है उसके अगल-बगल फिरंगी-ही-फिरंगी खड़े हैं, वो भी फिरंगी लड़कियाँ। वो अपने फिरंगी स्वर में गा रही हैं, ‘शिवोहम्-शिवोहम्’। नहीं, ऐसे नहीं, कैसे है वो?

'जय-जय शिव शम्भो, जय-जय शिव शम्भो।’ दिल पसीज जाता है, लगता है यहीं पर कुछ निकल पड़ेगा। एकदम सब तरल हो जाएगा भीतर जो जमा हुआ है, पिघल ही गए, गिर ही पड़े!

तब कहाँ कबीर और कहाँ मीरा और कहाँ नानक! ये याद ही नहीं आएँगे। ये ऐसे ही हैं सब, देसी, गँवार, लुच्चे। इनकी क्या हैसियत है? कबीर को हिंदी तक नहीं आती, भाई। "कौन सी भाषा में बोलता है वो देहाती? उस देहाती की क्या बिसात, उसको क्यों सुनें? हाँ, कोई अंग्रेज़ी में बैठ कर सत्संगा कर रहा है, अंग्रेज़ी वाला सत्संगा , क्या फूल खिल रहे हैं गोरे-गोरे!"

मुझे माफ़ करना अगर मैं ज़्यादा उग्र हो रहा हूँ, पर ये बात मेरी छोटी सी समझ से बिलकुल बाहर है कि जो इस देश की धरती पर पैदा हुआ है, वो कबीर छोड़कर लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन कैसे पढ़ सकता है। तुम्हें बुल्ले शाह नहीं समझ में आए, तुम्हें दादू दयाल नहीं समझ में आए? शंकराचार्य अपने पीछे इतना साहित्य छोड़ गए, तुमने वो नहीं पढ़ा। सूफ़ियों के कलाम नहीं हैं, जाम हैं, पियो और खुमारी चढ़ जाए। तुम्हें उससे कोई सरोकार नहीं।

वो कहते हैं न दीपक तले अंधेरा। अभिनवगुप्त को जानते हो? नहीं जानते। कोई ऐसा ही होगा दुमछल्ला, पुछल्ला, इधर-उधर का जिसका कोई पब्लिशिंग हाउस प्रचार कर रहा होगा, उसको तुम जानते होगे। क्यों? क्योंकि उसका प्रचार हो रहा है। लल्लेश्वरी को जानते हो? नहीं जानते होगे।

न लाओ त्ज़ू ज़िंदा हैं, न ली त्ज़ू ज़िंदा हैं, वो ख़ुद तो आएँगे नहीं अपना प्रचार करने। और बहुत आज दुकानदार घूम रहे हैं जो जानते हैं कि कैसे फँसाना है, और तुम फँसते जाते हो। फ़रीद से तुमको प्रयोजन नहीं, रैदास को तुमने ठुकरा दिया। दर्शन की छः शाखाएँ, किसी में भी तुम्हें शांति नहीं मिली?

प्र३: सत्य का ही अस्तित्व है; माया, मन अस्तित्वहीन हैं। फिर सत्य किसे चाहिए और क्यों?

आचार्य: सत्य नित्य होता है। अगर सत्य मात्र का अस्तित्व होता तो तुम मारे-मारे क्यों फिरते? तुम मारे-मारे इसलिए फिरते हो क्योंकि तुम्हें बहुत चीज़ों की सुरक्षा करनी है। जो नित्य है, उसे सुरक्षा चाहिए क्या?

तुम जिस भी चीज़ को बचाने के लिए घूम रहे हो — और घूम रहे हो तो बचाने के लिए ही घूम रहे हो, या तो बचाने के लिए या संवर्धित करने के लिए — तुम ज़िन्दगी में दिन भर जो इधर-उधर घूमते-फिरते हो, वो क्यों घूमते-फिरते हो? या तो कुछ बचाना चाहते हो या कुछ बढ़ाना चाहते हो। कोई भी आदमी जो दिन भर इधर-उधर भटक रहा है और मारा-मारा फिर रहा है, वो क्यों फिर रहा है? या तो कुछ बचाना चाहता है या कुछ बढ़ाना चाहता है।

सत्य क्या है? जिसे बचाने की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि वो नित्य है, अमर है। उसको तो कहीं जाना नहीं तो उसको कैसा बचाना? सत्य क्या है? जो पूर्ण है, तो बढ़ भी नहीं सकता, उसका संवर्धन नहीं हो सकता; वो तो लगातार पहले ही पूर्ण है।

तो तुम अगर दुनिया में चीज़ों को ऐसा देख रहे हो कि उनको बचाना है और बढ़ाना है। चाहे वो तुम्हारे रिश्ते हों, चाहे व्यापार हो, तो निश्चित रूप से तुम दुनिया में लगातार क्या देख रहे हो? सत्य का अभाव ही तो देख रहे हो। तुम्हें अगर कुछ सत्य दिख रहा होता तो क्या तुम उसे बचाने या बढ़ाने जाते? तुम अपना घर बचाना चाहते हो। तुम अपना व्यापार बढ़ाना चाहते हो न? जो तुम बचाना चाहते हो या बढ़ाना चाहते हो, उसको तो तुमने स्वयं ही घोषित कर दिया कि असत्य है।

लेकिन प्रश्न में देखो तुमने क्या लिखा कि “मात्र सत्य का अस्तित्व है।” अरे, मात्र सत्य का अस्तित्व होता तो तुम इतने परेशान क्यों घूमते? तुम्हारे मन में दस प्रकार के लक्ष्य और परेशानियाँ क्यों होतीं?

आदमी मारा-मारा घूमता ही इसीलिए है क्योंकि उसे लग रहा है कि दुनिया में सत्य के अलावा भी बहुत कुछ है। सर्वप्रथम तो वो अपने आप को ही सत्य नहीं समझता। प्रमाण क्या है इस बात का? सत्य तो मरता नहीं, पर देखो तुम्हें मौत का कैसा ख़ौफ़ है। सत्य को तो लुटने का कोई ख़ौफ़ नहीं होता, सत्य लुट सकता है क्या? पर तुम्हें अपने लुटने का बड़ा ख़ौफ़ है। सत्य के लिए तो मान-अपमान कुछ नहीं, पर देखो तुम्हें मान-अपमान कैसा बुरा लगता है।

तो पूरी दुनिया में जो तुम लगातार देख रहे हो अपनी दृष्टि से, वो क्या है? वो सत्य का अभाव है। तुमने स्वयं ही घोषित कर रखा है कि दुनिया में सत्य कहीं नहीं है। तुम्हारी दृष्टि ही प्रमाण है कि सत्य कहीं नहीं है। और तुम जो दृष्टा हो, वो स्वयं प्रमाण है कि सत्य कहीं नहीं है, क्योंकि वो अपने-आप को भी बस एक लहर जैसा मानता है। सपने में भी डरा रहता है कि कहीं छिन न जाऊँ, कहीं नष्ट न हो जाऊँ।

अभी कोई आकर खबर दे दे कि इतने का नुकसान हो गया, देखो कैसे काँपोगे। हो सकता है एक प्रकार के नुकसान पर न काँपो, दूसरे प्रकार के नुकसान पर काँपोगे। कुछ तो होगा जो तुम्हें कँपा जाएगा। अब बताओ, तुम्हें वास्तव में लगता है क्या कि मात्र सत्य का ही अस्तित्व है?

नहीं, ये बात तुम कह भर रहे हो, तुम्हारी गहरी धारणा ऐसी नहीं है। दिल-ही-दिल तुम जानते हो किसमें यकीन करते हो? दिल-ही-दिल तुम यकीन करते हो असत्य में। दिल-ही-दिल में तुम ये माने बैठे हो कि दुनिया में असत्य का राज है। शब्दों से तुम कह रहे हो, शाब्दिक समर्पण है तुम्हारा; वास्तविक समर्पण तुम्हारा असत्य को है।

जब असत्य को समर्पण होता है तो आदमी को चारों ओर क्या दिखता है? असत्य। और असत्य माने क्या? असत्य माने वो नहीं जो झूठ है। समझना, तुम असत्य को झूठ थोड़े ही बोलते हो। तुम असत्य को बोलते सत्य ही हो, लेकिन गुण उसमें सारे असत्य के रखते हो। इस बात पर ध्यान देना, तुम असत्य को बोलते तो हो कि सत्य है क्योंकि बड़ी छीछालेदर है कि असत्य को असत्य बोल दिया।

सोचो पत्नी आ रही सामने से, कि ग्राहक आ रहा है सामने से और उसको तुम बोल रहे हो, "तू असत्य है!" तो तुम उसको बोलोगे नहीं कि, "तू असत्य है", तुम उसको बोलोगे यही कि "तू सत्य है।" लेकिन तुम अपनी धारणा-वश उसमें गुण सारे किसके देखोगे? असत्य के। तो तुम मुँह से तो ये बोल रहे हो कि, "अरे, अरे, अरे, आपका और हमारा रिश्ता सच्चा है। अरे, अरे, अरे, तुम्हारा और मेरा प्रेम तो सात जन्मों का है।" लेकिन दिल-ही-दिल में डरे हुए हो कि कहीं ये अगले ही क्षण भाग न जाए। शब्दों से तो कह रहे हो कि, "सच्चाई है हमारे-तुम्हारे रिश्ते में", लेकिन दिल-ही-दिल में डर रहे हो कि ग्राहक खो न दूँ, कहीं घर न बिखर जाए, कहीं तिजोरी न खुल जाए, कहीं इज़्ज़त न लुट जाए।

क्या ये कहते हो कभी कि इज़्ज़त झूठी है? कहते तुम यही हो कि, "मेरी इज़्ज़त सच्ची है!" सच्ची होती तो लुट सकती थी क्या? पर देखो इस विरोधाभास को—एक तरफ़ तो कहते हो, "मेरी इज़्ज़त सच्ची है!" और दूसरी तरफ़ प्रतिपल काँपते रहते हो कि कहीं ये इज़्ज़त लुट न जाए। ऊपर-ऊपर से कहते हो कि सब सत्य है, अंदर-ही-अंदर जानते हो कि सब असत्य है।

तो छोटी सी बात - ईमानदारी का जीवन जियो। जिसको जान गए हो कि असत्य है, अब उस पर सत्य का ठप्पा मत लगाना, दोबारा कभी मत बोलना कि सच्चा है। उसे झूठ नहीं बोलना चाहते किसी कारण तो होंठ सी लो, पर कम-से-कम उसे यह मत बोलना कि, "तू सत्य है।"

माया जीती इसीलिए है क्योंकि उसे कोई माया बोलता नहीं। उसको हम बोलते हैं 'रूपा', कि 'बिटिया', कि 'प्यारी', कि 'शोना', कि 'बाबू'। 'माया' बोला कभी उसको? झूठ को झूठ बोला है कभी उसके मुँह पर? झूठ चल ही इसलिए रहा है क्योंकि झूठ ने अपना नाम रखा है सच। झूठ की औक़ात नहीं कि वो खुलेआम बोल दे कि 'मैं झूठ हूँ'।

ईमानदारी का जीवन जियो, मत कहो कि अस्तित्व सत्य है। सिर झुका लो और बोलो कि, “मेरा जीवन प्रमाण है, मेरा डर प्रमाण है, मेरी चिंता प्रमाण है कि मुझे तो सब कुछ अनित्य ही दिखाई देता है, मुझे तो सब कुछ क्षणभंगुर ही दिखाई देता है। मुझे तो हर पल यही लग रहा होता है कि मेरी दुनिया के नीचे से पता नहीं कब दुनिया हिल जाएगी। मैं कभी आश्वस्त नहीं हो पाता।”

सत्य तो पूर्ण आश्वस्ति देता है न? तुम्हें किसी भी चीज़ में पूर्ण आश्वस्ति है, तुम्हें किसी भी चीज़ में इतना भरोसा है कोई डिगा न पाए? तुम्हें तो ज़रा सी कोई खबर दे दे तो तुम्हारा गहरे-से-गहरा रिश्ता काँप उठेगा। फिर कहते हो कि अस्तित्व सत्य है। कहाँ सत्य है तुम्हारे लिए?

आदर्शों में सत्य होगा, ग्रंथों में सत्य होगा, गुरुओं के लिए सत्य होगा, सत्य के लिए सत्य होगा, तुम बताओ तुम्हारे लिए सत्य है क्या? सत्य वो जो अडिग हो, सत्य वो जो नित्य हो, सत्य वो जो अमर हो। मैं फिर पूछ रहा हूँ, तुम्हें संसार में ये सारे गुण दिखाई देते हैं क्या? संसार तुम्हारे लिए अडिग है? संसार तुम्हारे लिए श्रद्धेय है? संसार में तुम्हारा विश्वास है पूरा? बोलो, है ये सब संसार से तुम्हारे रिश्ते में?

अगर नहीं है तो क्यों बोल रहे हो कि अस्तित्व सत्य है? बोलो कि अस्तित्व भ्रम से भरा हुआ है, झूठ है, दुश्मन है, खाने को तैयार है, कभी भी कोई भी नुकसान कर देगा। एक बार तुमने ईमानदारी से स्वीकार कर लिया, उसके बाद शायद सत्य उतरे। उसके बाद शायद तुम सत्य को मौका दे पाओ उतरने का।

प्र१: हमारे भीतर इस प्रकार के प्रश्न भी तभी आते हैं जब हमें सत्य का कोई भरोसा न हो।

आचार्य: भरोसा हमें किसी चीज़ का नहीं है। खूब तर्क देकर आपको यह भी आश्वस्त किया जा सकता है कि आपने पिछले हफ़्ते खून किया था। ऐसे-ऐसे तर्क दिए जाएँगे कि आपको मानना पड़ेगा। क्यों? क्योंकि आप बुद्धि के तल पर जीते हो। बुद्धि तो तर्कों पर चलती है, बुद्धि को तो एक ही आश्वस्ति होती है। क्या? तर्क। दे दिए जाएँ आपको अकाट्य प्रमाण, आप मान लोगे कि आपने पिछले हफ़्ते किसी की हत्या करी थी। आप ऐसे कहोगे, "लगता तो नहीं है, पर अब सारे सबूत हैं तो करा ही होगा।"

हम बड़े बेभरोसे के लोग हैं, हमारे पाँव के नीचे ज़मीन ही नहीं है। दिल नहीं है न हमारा; मन है बस। उसे समझा-बुझाकर कुछ भी राज़ी किया सकता है। ये टीवी और किस लिए है? आपको राज़ी करने के लिए ही तो है। इसको पता है कि दिल तो है नहीं आपके पास, और मन को तमाम तरह के प्रलोभनों से और चकाचौंध से, और बातों से और आवाज़ों से राज़ी किया जा सकता है, तो आपको राज़ी कर लेता है।

दिल राज़ी नहीं होता क्योंकि वो अँधा, बहरा, गूंगा होता है। न वो कुछ बोलता है, न सुनता है, तुम उस तक पहुँच ही नहीं सकते। मन तक पहुँचने के लिए तो बड़े द्वार हैं, ये तमाम (इन्द्रियाँ) द्वार हैं, इनसे घुस जाओ अंदर, मन तक पहुँच जाओगे। दिल तक पहुँचने का कोई द्वार नहीं होता, ये ऐसा नगर है जहाँ तक पहुँचने का कोई द्वार नहीं। तो इस पर फिर कोई कब्ज़ा भी नहीं कर सकता। आप ह्रदय से जीते नहीं, आप मन से जीते हो इसीलिए यहाँ पर कब्ज़ा हो जाता है।

प्र४: दीवाली का जब से माहौल बना है, तब से उपनिषद् समागम के सत्र में शामिल होना और मुश्किल हो गया है। जब से ये शृंखला शुरू हुई थी, तब से ही कुछ आन्तरिक बाधा सी थी। पर जब से ये त्योहारों का मौसम आया है, तब से तो बड़ा मुश्किल है। तो कृपया प्रकाश डालें।

आचार्य: प्रकाश क्या डालूँ, प्रकाश-ही-प्रकाश है! इतनी मोमबत्तियाँ हैं, इतनी झालरें, इतने दिए, घर जगमग हैं, मैं क्या प्रकाश डालूँ?

जैसे हमारे त्यौहार होते हैं, जिन तरीकों से हम उन्हें मनाते हैं, उनमें सब कुछ कुत्सित, गर्हित और नारकीय होता है। वो हमारी चेतना को और ज़्यादा तामसिक बना देते हैं। हमारे सबसे भद्दे चेहरे हमारे त्यौहारों में निकल कर आते हैं। बड़ा दुर्भाग्य है हमारा कि भगवान के नाम पर जो कुछ भी करते हैं, उसमें भगवत्ता ज़रा भी नहीं होती।

अब अगर आपके चारों ओर वही सब माहौल बन रहा होगा, और बनता ही है। समाज, कुटुंब, परिवार, सब मिल करके वो माहौल रचते हैं। तो आपको बड़ी दिक़्क़त हो रही होगी मेरी बातें सुनने में।

कहाँ तो टीवी आपको लगातार बता रहा होगा कि दीवाली पर खुशियाँ घर लाइए, और ये आदमी (ख़ुद की ओर इशारा करते हुए) बैठा हुआ है कुर्ता पहनकर, वो आपसे कह रहा है कि “खुशियाँ?” तो झंझट हो गया न, आप फँस गईं। अब या तो टीवी बंद करो या मुझे बंद करो। टीवी तुम बंद कर नहीं पाओगे क्योंकि घर में बहुत लोग हैं जो तुम्हें टीवी बंद करने नहीं देंगे। तो एक ही विकल्प है कि मुझे बंद कर दो। देर-सवेर तुम्हें मुझे तुम्हें बंद करना ही पड़ेगा।

"क्या चल रहा है घर में आजकल? धनतेरस आ रही है। क्या खरीदने का इरादा है?" और यहाँ ये सफ़ेद दाढ़ी तुम्हें बता रहा है कि, "क्या खरीदोगे तुम! खरीदने से बेहतर है बिक जाओ।" बड़ी दिक़्क़त हो जाएगी न हार खरीदने में। हो गई न दिक़्क़त? और नयी-नयी चीज़ें लानी होती हैं दीवाली पर घर। क्वांटम मैकेनिक्स पर आधारित नयी वॉशिंग मशीन बनी है (तभी एक ड्रिल मशीन की आवाज़ आती है), ये देखो! वो तुम्हें घर लानी है और आफ़त हुई जा रही है - ‘कैसे करें?’

नयी गाड़ी उतरी है बाज़ार में और डिस्काउंट (छूट) भी मिल रहा है। ऑडी के बिलकुल ताज़ा-तरीन मॉडल की टेस्टिंग चल रही है। दीवाली पर ही लॉन्च होगा। और यहाँ कबीर के भजन गाये जाते हैं, 'चार कहार मोर पालकी उठावे’। यहाँ इस गाड़ी को चलाया जा रहा है। चार पहिए वाली गाड़ी नहीं है ये, जानते हो कौन सी गाड़ी है? चार आदमी लेकर चलते हैं, उस गाड़ी की बात होती है यहाँ। अब बड़ी दिक़्क़त है।

यहाँ पर घर में खुशी-खुशी का माहौल है। सब खुश हैं, पूरा परिवार जश्न मना रहा है नयी ऑडी का। और इधर आते हैं तो पता चलता है कि पिया ने चार कहार भेजे हैं बुलाने के लिए। और कहारों के टायर भी नहीं लगे हैं। धीरे-धीरे वो रेंग रहे हैं, पता नहीं कहाँ ले जा रहे हैं।

ये सब घर में न भी हो रहा हो तो पड़ोस में तो हो ही रहा है न, लग गयी हैं न झालरें? हो रहा है न खुशी का नंगा नाच? हर कोई दिखाना चाह रहा है न आपको कि कितना खुश है वो कि आज राम घर लौटे थे? ‘ माय गॉड! राम! राम!’, पूरा हिंदुस्तान पगला जाता है, इतनी खुशी फैलती है कि राम घर लौटे थे।

(व्यंग करते हुए) देखिए न, सालभर सबका जीवन कितना राममय रहता है, तो दीवाली पर तो हर्ष स्वभाविक है कि राम घर लौटे थे! और जब तक वनवास में थे तब तक लोग उपवास कर रहे थे, तो अब जब वो घर लौटे हैं तो मिठाइयों के दौर चल रहे हैं। क्यों? अगर राम के घर लौटने पर तुम इतने पकवान पका रहे हो, तो जब राम वनवास कर रहे थे तो तुम उपवास भी कर रहे होओगे? पर नहीं, एक बहता हुआ झूठ है जो पीढ़ियों से बहता हुआ चला आ रहा है और तुम्हें उसे बहाए रखना है। बहाओ!

इस पूरे तमाशे का राम से कुछ लेना-देना है? राम का लेना-देना जानती हो किससे है? राम का लेना-देना हमसे है, हमसे—हमारे हाथ में है योगवासिष्ठ, हम बात कर रहे हैं कि वशिष्ठ ने क्या कहा राम से—दीवाली हम मना रहे हैं, ये है दिवाली। अब चुनो तुम तुम्हें कौन सी दीवाली मनानी है। वो वाली, झालर, चीनी झालर, सस्ती, मिठाई वाली, गुझिया वाली, टीवी वाली, एलजी और व्हिर्लपूल वाली, ऑडी वाली या योगवासिष्ठ वाली? कौन से राम चाहिए तुम्हें, बोलो?

मैं कितना भी चिल्ला लूँ, करोगे वही तुम जो पीढ़ियों से करते आए हो। मैं कोई पहला हूँ जो तुमसे बोल रहा है? न पहला हूँ, न आख़िरी हूँ। मेरे जैसे बहुत आए थे, मेरे बाद भी आते रहेंगे। दुनिया को वही करना है जो वो करेगी, दीवालियाँ ऐसे ही मनेंगी। कोई नहीं समझेगा राम का मर्म। कोई नहीं पूछना चाहेगा कि राम वास्तव में हैं कौन। लोग रावण जलाएँगे, लोग पटाखे बजाएँगे।

उन्नीस तारीख की दीवाली है। मैंने उस दिन भी स्टूडियो कबीर का सत्र रखा था। हम मिलते शाम को और दुनिया जब शोर में, और धुएँ में, प्रपंच में और माया में मशगूल होती, उस वक़्त हम कबीर गाते, उस वक़्त हम कबीर के राम को गाते, वो होती है दीवाली। वो सत्र स्थगित करना पड़ा क्योंकि लोगों के घर हैं। लोगों को घर वाली दीवाली मनानी है, लोगों को बर्फ़ी और हल्दीराम वाली दीवाली मनानी है।

अगर कोई एक दिन होता है न साल का जिस दिन राम झुँझला जाते होंगे, जिस दिन रावण जीत जाता है, तो वो दिन दीवाली का है। हम जिताते हैं रावण को। दशहरे के दिन भी रावण जीतता है, जैसा दशहरा हम मनाते हैं। और दीवाली के दिन राम निर्वासित होते हैं, जैसी दीवाली हम मनाते हैं। कोई बात नहीं, मनाओ। राम को क्या फ़र्क़ पड़ता है!

प्र५: मेरी आध्यात्मिक यात्रा में कई गुरु मुझे मिले जिन्होंने मुझे कुछ ज्ञान दिया। उनमें से एक थे जिनके साथ में आठ साल जुड़ा रहा और उनकी कई प्रकार से सेवा की। परन्तु बाद में उनके कपटपूर्ण आचरण को देखते हुए छोड़ना पड़ा। तो मैं पूछना चाहता हूँ कि उनको छोड़ना क्या मेरी आध्यात्मिक उन्नति का द्योतक है? और मेरे जीवन में ऐसे गुरु का आगमन क्या अर्थ रखता है? कृपया बताएँ।

आचार्य: तुम किसी के साथ जुड़ते हो और जिसके साथ जुड़ते हो, उसी को गुरु बना लेते हो क्योंकि अब वो तुम्हारे ऊपर है। तुम जुड़ने गए थे, वो जुड़ने नहीं आया था। तुम गरज़मन्द थे, तुम प्रार्थी थे, तो तुम गए और जुड़ गए। तुम जिससे जुड़ गए, वही तुम्हारा गुरु हो गया। तो तुम किसी के साथ आठ साल जुड़े रहे।

किसके साथ जुड़ता है आदमी? जैसी आदमी की प्रीत होती है, जैसी आदमी की इच्छा होती है, जैसी आदमी की वृत्ति होती है, वैसे ही वो कहीं जा करके जुड़ जाता है। मक्खी किससे जुड़ती है जाकर? गुड़ से। भँवरा किससे जुड़ता है जाकर? फूल से। जो मिथकीय पपीहा होता है, वो किससे जुड़ता है रात में? चाँद से।

तो आप जैसे थे, वैसा ही कोई आपने खोज लिया अपनी वृत्ति अनुसार और उससे आप जुड़ गए। वो व्यक्ति था तो आपने उसको गुरु का नाम दे दिया। आप किसी और से जुड़े होते तो आप उसे गुरु का नाम नहीं देते, फिर आप कहते कि, “मैं इस लक्ष्य के पीछे था, मैं इस प्रकार के उपक्रम में था, मैं ऐसा जीवन जी रहा था, मैं ये चाह रहा था।”

पर हर किसी ने जीवन में किसी-न-किसी चीज़ को पकड़ रखा है। चाहे किसी इंसान को, चाहे किसी अभियान को, चाहे किसी विचार को, चाहे किसी इच्छा को। जिसको ही आप पकड़ लेते हो, फिर कह रहा हूँ, वो आप पर हावी हो जाता है क्योंकि आप निर्भर हो, आप आश्रित हो। आप गये थे उसका सहारा लेने। और फिर वो आपकी जीवन दिशा को निर्धारित करने लग जाता है।

आप कह रहे हैं कि आपने जिसको पकड़ा, उनकी कई प्रकार से सेवा की। वो तो आपको करनी ही थी। तुम जिसके आश्रित होने जा रहे हो, जो तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति कर रहा है, वो अगर तुमसे कुछ शुल्क माँगेगा, कुछ सेवा माँगेगा, तो क्या तुम उसे नहीं दोगे? कैसे इनकार कर पाओगे? गरज़ तुम्हारी है। तो ये ज़ाहिर ही है कि तुम्हें कीमत अदा करनी थी जो कि तुमने की।

फिर आगे कह रहे हो कि उनके कपटपूर्ण आचरण को देखते हुए उनको छोड़ना पड़ा। वो भी हमेशा ही होता है। कोई इच्छा सदा के लिए थोड़े ही होती है। जिस भी इच्छा के बहुत पास चले जाओ, कुछ ही समय में वो छूटती है और कुछ और खड़ा हो जाता है। कोई ऐसा व्यक्ति बताना जिसने जीवन-भर एक ही इच्छा पाल रखी हो? जीवन-भर हटा दो, दिन-भर भी क्या तुम्हें एक ही इच्छा रहती है?

आभूषण की दुकान के सामने से निकलते हो, आभूषण की इच्छा आ जाती है; स्त्री के सामने से निकलते हो, स्त्री की इच्छा आ जाती है; नेता के सामने से निकलते हो, इज़्ज़त की इच्छा आ जाती है। कोई इच्छा लगातार बनी तो रहती नहीं। इसी तरीके से जीवन में भी जिससे तुम इच्छा-वश संलग्न हुए हो, वो व्यक्ति लगातार बना नहीं रहेगा, उसको छूटना ही था।

आज कह रहे हो कि कपटपूर्ण आचरण देखकर छोड़ दिया। कपटपूर्ण आचरण देखकर नहीं छोड़ा होता तो मात्र ऊबकर छोड़ देते, पर छोड़ना तो था ही। तो यहाँ पर आपकी कहानी पूरी होती है। अब सवाल मेरा है - इस छोड़ने में गुणवत्ता क्या है? दो बातें हो सकती हैं। एक तो यह कि एक इच्छा छोड़ी क्योंकि दूसरी आ गयी, ज़्यादा मोहक, ज़्यादा आकर्षक। और दूसरी बात होती है कि इच्छा छूटी क्योंकि इच्छा ही छूट गई, इच्छा मात्र छूट गई।

एक छोड़ना होता है जहाँ इच्छा का एक प्रकार छूटा, इच्छा का एक विषय छूटा—वहाँ कुछ नहीं छूटा, वहाँ मक्खी गुड़ के एक ढेले से उठ करके दूसरे पर बैठ जाएगी। और दूसरा किस्सा यह होता है कि मक्खी ने गुड़ नहीं छोड़ा, मक्खी का मक्खीत्व ही छूट गया—अब वो मक्षिका रही ही नहीं, अब कोई गुड़ का ढेला उसे नहीं खींच पाएगा।

तो कैसे छोड़ा है इन गुरुदेव को? ऐसे छोड़ा है कि अब दूसरी दुकान तक जाने की तैयारी में हैं या ऐसे छोड़ा है कि अपने भीतर की उस वृत्ति को ही छोड़ दिया जो इच्छा-वश दुकानें ढूँढती थी? इच्छा-वश दुकान ढूँढने का अर्थ होता है, “मैं राजा हूँ, मैं अपने अनुसार गुरु को तलाशूँगा।”

अब अगले के साथ क्या व्यवहार करने का इरादा है? अगला कैसे तलाशने का इरादा है? अपने अनुसार, कि जैसे आदमी जाता है न दुकान पर कि 'मेरी क्या आवश्यकता है?' उसके अनुसार दुकान ढूँढता है? या सिर झुकाने का इरादा है कि “मैं नहीं ढूँढ रहा दुकान, अब जो ढूँढने वाला है, उसको मौका दूँगा कि तू आ, मुझे ढूँढ ले, मेरी खोज तो व्यर्थ गयी। तू खोज ले मुझे। मैंने तो खोजा तो ऐसों को ही खोजा जिनके साथ अभी आठ साल गुज़ार कर आया हूँ।”

तो अब सिर झुकाया है और अब जो होगा, उसको होने देंगे। अपने अनुसार नहीं जाँचेंगे-परखेंगे; अपने अनुसार नहीं निष्कर्ष निकालेंगे।

मेरे सवाल का जवाब दीजिएगा। छोड़ने के बाद क्या? छोड़ने में गुणवत्ता क्या? एक जाल से निकलकर दूसरे जाल में फँसना है, या अब अन्ततः आज़ादी चाहिए?

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