प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे आपने बताया कि पहले आप मूल दर्द से आँखें चार कीजिए। तो मैं समझता हूँ कि जो अपूर्ण अहम् है, आप उसकी ओर इशारा कर रहे थे। तो वो दिखता ही कुछ संयोगवश परिस्थितियों में है, वैसे दिखता नहीं है। तो ऐसा क्या किया जाए कि उन संयोगों पर निर्भर न रहना पड़े, उसको हम हर समय देखते रहें और कुछ कर पायें उसके बारे में।
आचार्य प्रशांत: जो ये फुटकर दर्द हैं, छुटभैये दर्द इनको सामने बैठा करके इनका इंटरव्यू (साक्षात्कार) ले लिया करो। सीधा साक्षात्कार। ठीक है? बोलो कि तुम बहुत शोर मचा रहे हो, तुम कह रहे हो, ‘अरे! अरे! अरे! दर्द हो रहा है, हम ही बहुत बड़े हैं, ये हो गया, वो हो गया।’ बोलो, ‘मान लो हम तुम्हारा उपचार कर भी दें, उससे तुम तो चले जाओगे, लेकिन दर्द चला जाएगा क्या?’
अगर बातचीत ईमानदारी से हो रही है तो तुम्हें जवाब मिलेगा, नहीं। तो ये छोटा दर्द था, इसने तुम्हें क्या जवाब दिया? ये कह रहा है, ‘मैं अगर चला भी गया तो दर्द नहीं जाएगा।’ इसका अर्थ क्या हुआ?
प्र: मूल दर्द है।
आचार्य: मूल दर्द तो कुछ और है, इस छोटे वाले के जाने पर भी वो क़ायम रह जाना है। जैसे ही यह बात दिखायी देगी, वैसे ही कहोगे कि अरे बाबा, जब तेरे जाने पर भी मूल दर्द तो क़ायम रह जाना है तो मैं तुझे भगाने में, तुझसे उलझने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ करूँ ही क्यों!
काम वो करो न जिसके पूरा हो जाने पर लाभ होता हो। ये छोटा दर्द है, क्या? कि बाल झड़ रहे हैं। ये समस्या मैंने अगर सुलझा भी दी, तो क्या ज़िन्दगी मेरी भयमुक्त हो जाएगी, कष्टमुक्त हो जाएगी? नहीं हो रही न! इसको मैंने जीत भी लिया तो लाभ मुझे कुछ होने नहीं वाला, तो बताओ मैं इसे जीतने में श्रम लगाऊँ क्या? कहो।







