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जो जितना निर्भर दूसरों पर, वो उतना चिंतित अपनी छवि को लेकर
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, किसी बात को कहने में डर रहता है कि दूसरे क्या सोचेंगे।

आचार्य प्रशांत: ठीक है, तो दूसरे जो कुछ भी सोच रहे हैं, वो तो उनकी खोपड़ी में हो रहा है। दूसरों की सोच का जो भी असर हो रहा है वो तो उन्हीं की खोपड़ी पर होगा न? तुम क्यों डर रहे हो?

प्रश्नकर्ता: मैं ये सोचता हूँ कि वो ग़लत न सोचें।

आचार्य प्रशांत: उनकी खोपड़ी के अंदर क्या चल रहा है इससे तुम्हें क्या मतलब है?

प्रश्नकर्ता: अपनी इमेज (छवि) को लेकर डर रहता है कि कहीं वो ग़लत न हो जाए।

आचार्य प्रशांत: अच्छा, इमेज हो गई ग़लत, फ़िर क्या होगा?

प्रश्नकर्ता: इसी चीज़ का डर रहता है।

आचार्य प्रशांत: तो इससे क्या हो जाएगा, तुम्हारा नुक़सान ही क्या है?

प्रश्नकर्ता: नुक़सान तो कुछ नहीं है।

आचार्य प्रशांत: नहीं, नुक़सान होगा वरना तुम डरते नहीं। तुम चाहते हो दूसरे के मन में तुम्हारी छवि अच्छी बनी रहे, और तुम्हें लगता है जब कि तुम्हारी छवि ख़राब हो रही है तो तुम डर जाते हो—तो निश्चित रूप से छवि के बिगड़ने से तुम्हें कुछ तो नुक़सान दिख रहा है। क्या नुक़सान दिख रहा है? चलो, बताओ।

प्रश्नकर्ता: उस नुक़सान से कहीं असफल न हो जाएँ।

आचार्य प्रशांत: दूसरे के मन में तुम्हारी छवि बिगड़ गई तो तुम असफल कैसे हो गए?

प्रश्नकर्ता: ये सोच रहती है दिमाग में।

आचार्य प्रशांत: नहीं, क्यों रहती है? वो तो स्पष्ट है कि सोच रहती है, हम उसके ज़रा भीतर जाना चाहते हैं कि बात क्या है। बाज़ारों में विज्ञापन होते हैं, हर उत्पाद अपनी अच्छी छवि बनाकर रखना चाहता है ग्राहक के मन में, है न? तो किसी के मन में अपनी अच्छी छवि बनाने की फ़िक्र तुम्हें होती ही कब है? कब डर जाते हो तुम अपनी छवि के ख़राब होने से? बोलो।

प्रश्नकर्ता: ये लालच रहता है कि इनसे कुछ मिलेगा।

आचार्य प्रशांत: या बिकने को तैयार बैठे हो। बिकने को तैयार बैठे हो तो उसके मन में अपनी ऊँची छवि रखना चाहते हो। जितनी तुम्हारी ऊँची छवि होगी, उतने तुम्हारे ऊँचे दाम लगाएगा वो, कि “वाह! क्या चीज़ है। चालीस लाख एक, चालीस लाख दो, चालीस लाख तीन।” जिसको बिकना हो, वही अपनी छवि को लेकर इतना सावधान, इतना व्याकुल रहता है। जो बाज़ारू नहीं है, वो क्यों डरेगा कि उसके बारे में किसने क्या सोचा?

अब ये तो बात दूसरी दिशा में चली गई। जो बिकना चाहता है वो तो दूसरे के मन में अपनी वो छवि बनाना चाहता है जो बिलकुल झूठी है, ठीक? वो तो दूसरे को ठगना चाहता है न? वो अपनी ऊँची-से-ऊँची, सुंदर-से-सुंदर, आकर्षक-से-आकर्षक छवि बनाएगा दूसरे के मन में। अपनेआप को ऐसा प्रस्तुत करेगा जैसा वो है ही नहीं। तो ये तो दूसरे को ठगने की कोशिश हुई। और जब नहीं ठग पाते तो डर जाते हैं कि “अरे, ठगना चाहते थे, ठग नहीं पाए”। ये हमारा डर तो उस चोर का डर है जो सेंध मार रहा है। उसे कोई डराने नहीं आ रहा, वो डरा इस बात से हुआ है कि अगर दूसरे को लूट रहे हैं, ये बात ज़ाहिर हो गई, तो पिटेंगे बहुत। क्या उस चोर को कोई डराने आ रहा है? बोलो।

जब तुम कहीं चोरी करने जाते हो तो डरे होते हो या नहीं? क्या इसका अर्थ ये है कि दूसरा आकर तुम पर अत्याचार कर रहा है और तुम्हें डरा रहा है, भयभीत कर रहा है, शोषण कर रहा है तुम्हारा? चोर से ज़्यादा कोई डरा हुआ नहीं होता—कहीं ऐसा तो नहीं कि चोर ही डरा हुआ होता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि डर द्योतक ही है इस बात का कि तुम दूसरे को ठगना चाहते हो और इसीलिए काँप रहे हो कि कहीं पकड़े न जाएँ?

जब तक दूसरों पर आश्रित रहोगे, जब तक दूसरों से कुछ पाने की उम्मीद रहेगी, तब तक दूसरों के मन में अपनी छवि को लेकर चिंतित भी रहोगे। जो जितना दूसरों पर-निर्भर है, वो अपनी छवि के लिए उतना ही सतर्क होगा। जिसको दूसरे से जितना ज़्यादा चाहिए, वो उतना ज़्यादा परेशान हो जाएगा दूसरे के मन में अपनी छवि ख़राब होती देखकर।

दूसरे पर निर्भरता, दूसरे पर आश्रयता से उठता है छवि ख़राब होने का डर।

कमज़ोरी की बात है, जो जितना कमज़ोर, वो दूसरों पर उतना निर्भर। जो दूसरे पर जितना निर्भर, वो उतना ज़्यादा चाहेगा कि दूसरा उसके बारे में अच्छी-अच्छी बातें ही सोचे।

तुम्हारा तो सब काम ही दूसरे से चलना है, तो तुम्हारे लिए आवश्यक हो गया न कि दूसरा तुमको भला समझे, तुम्हारे बारे में अच्छा सोचे। जिसका काम दूसरों से नहीं चलना, वो इस बात की परवाह क्यों करेगा कि दूसरा उसके बारे में क्या सोच रहा है? तुम्हारा काम दूसरों से क्यों चलता है? बोलो तो। तुम्हारे चेहरे पर दुर्बलता क्यों लिखी हुई है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये बचपन से ही रहा है और अब और ज़्यादा बढ़ गया है।

आचार्य प्रशांत: अब तुम बच्चे नहीं हो, अभी भी तुम दूसरों पर आश्रित क्यों हो? क्या उम्र हो गई तुम्हारी?

प्रश्नकर्ता: २५ साल।

आचार्य प्रशांत: २५ साल का होकर अब दूसरों पर क्या निर्भरता है? मजबूरी क्या है?

प्रश्नकर्ता: कुछ नहीं।

आचार्य प्रशांत: ऐसा तो नहीं है। दूसरों से ले रहे हो कुछ तभी डर रहे हो दूसरों से। क्या मजबूरी है कि दूसरों पर आश्रित हो?

प्रश्नकर्ता: मजबूरी तो ये सोच है कि इज़्ज़त दूसरों से पाना चाहते हैं।

आचार्य प्रशांत: न, हम इज़्ज़त वगैरह के बड़े कदरदान होते ही नहीं हैं। इज़्ज़त से हमें जो मिल रहा होता है, हमें उसकी कामना होती है। दूसरे तुम्हें इज़्ज़त देते हों और इज़्ज़त से तुम्हें कुछ मिल न रहा हो तो तुम कहोगे कि अपनी इज़्ज़त अपनी जेब में रखो। हमें चाहिए ही नहीं तुम्हारे द्वारा सम्मान। सम्मान हमें पसंद है क्योंकि सम्मान हमें कई तरीक़े के लाभ दिलाता है। लाभ रहित सम्मान मिल रहा हो तो तुम नहीं लोगे। उस सम्मान का आकर्षण बिलकुल कम हो जाएगा। बात को समझो।

बहुत लोग बोलते हैं कि हमें इज़्ज़त बहुत प्यारी है। किसी को भी इज़्ज़त नहीं प्यारी होती, इज़्ज़त से जो लाभ हो रहा होता है वो प्यारा होता है। बताओ कौन-सा लाभ है जिसके पीछे भाग रहे हो। तुमने ये देखा है कि जिसको तुम इज़्ज़त देते हो, उसे फ़िर लाभ देना भी शुरू कर देते हो, देखा है न? और तुमने ये भी देखा है कि जिसकी इज़्ज़त गिर जाती है, उसको जो भौतिक लाभ हो रहे होते हैं, वो भी रुक जाते हैं। ये देखा है कि नहीं? असली बात भौतिक लाभों की है, किन्हीं पदार्थों के लालच में हो। वो पदार्थ इज़्ज़त के पीछे-पीछे बंधे चले आते हैं इसलिए तुम इज़्ज़त की बात करते हो। बताओ किस चीज़ का लालच है?

प्रश्नकर्ता: लालच तो इज़्ज़त का ही है।

आचार्य प्रशांत: न, इज़्ज़त के पीछे क्या है जो मिल रहा है तुम्हें? कुछ तो होगा—रुपया, पैसा, रोटी, घर, सर पर छत, भविष्य का आश्वासन, अन्य किन्हीं भौतिक इच्छाओं की पूर्ति, ये आशा कि अगर समाज में इज़्ज़तदार रहेंगे तो अच्छी पत्नी मिल जाएगी—कुछ-न-कुछ भौतिक लालच ज़रूर बांध रखा है।

प्रश्नकर्ता: कई लालच जुड़े हैं। कोई एक नहीं है।

आचार्य प्रशांत: जैसे?

प्रश्नकर्ता: जैसे कि जो पत्नी वाला बता रहे हो आप, उसके अलावा माँ-बाप भी सब अच्छा समझें।

आचार्य प्रशांत: क्यों समझें? भौतिक चीज़ क्या है वो बताओ, मटेरियल ग्रीड क्या है उसकी बात करो—असली चीज़ वहीं होती है।

प्रश्नकर्ता: पता नहीं चल रहा, आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: सब पता है, न पता होता तो डरते क्यों? जिसको नहीं पता होगा कि उसकी छाती पर साँप लोट रहा है, वो डरेगा क्या साँप से? तुम सो रहे हो, साँप गुज़र गया, डर जाते हो? सब पता है तभी तो डरते हो।

जिसने इतनी बड़ी विवशता पाल रखी हो कि उसको पत्नी ही तभी मिलेगी जब समाज के लोग उसकी इज़्ज़त करें तो वो तो समाज से डर के ही रहेगा न!

तो तुम्हें कौन डरा रहा है, कौन दबा रहा है? प्रेम का अभाव। तुम में इतना प्रेम नहीं, इतना पौरुष नहीं कि तुम कहो कि समाज की मध्यस्थता से नहीं चाहिए पत्नी। पुरुष हैं, प्रेम करेंगे, ले आएँगे। समाज से भीख थोड़े ही माँगेगे कि लड़की दे दो। और तुम्हारी कामवासना, तुम ये भी नहीं कहते कि हम अगर अपने बूते नहीं ला सकते हैं लड़की तो चलो नहीं ही लाएंगे—कामवासना भी फनफनती है। जितना वासना फनफानाएगी, उतना तुम जाकर समाज के ठेकेदारों के पाँव पकड़ लोगे, क्योंकि वही तुमको फिर लड़की दिलवाएंगे—विवाह तो वहीं करवाएंगे न!

लड़के जब घर में जवान हो जाते हैं, और विवाह की, माने वासना की खुजली उठती है, तो दादा और ताऊ के प्रति सम्मान से भर जाते हैं बिलकुल। रोज़ जाते हैं रात में ददा के पास तेल लेकर के, उनकी सोते वक़्त मालिश करेंगे। ददा समझ जाते हैं कि लड़का अब बेकाबू हो रहा है, रातों को तेल लेकर घूमता है।

नकली है न ये सम्मान? भौतिक, पार्थिव, लाभ के प्यासे हो। और जिस दिन मिल गई पत्नी, उस दिन रात में दो बजे ददा प्यास से मार रहे हों, कितना भी चिल्लाएं, तुम बिस्तर काहे को छोड़ोगे? इसी तरीक़े से रोटी और छत। जब पच्चीस के होकर भी आश्रित बने हुए हो कि किसी और की रोटी तोड़ोगे, किसी और के दिए हुए घर में रहोगे, तो जिसकी दी हुई रोटी खा रहे हो, जिसके घर में रह रहे हो, उसकी नज़रों में अपनी छवि तो उज्ज्वल रखनी पड़ेगी न। क्योंकि छवि अगर उज्जवल नहीं रखी तो रोटी रुक जाएगी, छत छूट जाएगी।

दुर्बलता सबसे बड़ा दोष है। और वो भी जब जवान आदमी में दुर्बलता दिखे, तो उससे विकृत और कुरूप दृश्य तो कोई होता ही नहीं। क्या बिगाड़ लेगा कोई तुम्हारा भई? और इतना दब-दब के, इतना डरकर जी के पा क्या रहे हो? जो कुछ भी पा रहे हो, वो बड़ा महँगा है, लुट रहे हो।

प्रश्नकर्ता: इससे खिंचाव और तनाव रहता है दिमाग में हर दम, हर समय।

आचार्य प्रशांत:

ये तनाव कीमत है जो तुम भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए अदा कर रहे हो।

और तुमको देखकर लगता नहीं कि भौतिक सुख भी तुम्हें कुछ बहुत मिल रहा है। दो वक़्त की रोटी मिल रही होगी, कुछ कपड़े मिल रहे होंगे, सोने को एक बिस्तर, रहने को एक कमरा, सिर छुपाने को एक छत—इससे ज़्यादा तुम्हें कुछ मिल भी नहीं रहा होगा। पर इतना भर मुफ़्त में पाने के लिए तुमने अपने जीवन को दुर्बलता, तनाव, सबसे भर लिया है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, समझ में आता है पर दूर नहीं होती।

आचार्य प्रशांत: वो दूर तभी होगी जब तुम कहो कि मरना भला है ग़ुलामी की रोटी तोड़ने से। जब तुम कह दो कि कुँवारा जीना भला है इस तरह का ब्याह आयोजित करने से। थोड़ी ख़ुद्दारी दिखाओ।

नौकरी करते हो तो तनख्वाह भी मिलती होगी। तो वो सब क्या बचा-बचा के रखना है? उसके बूते क्यों नहीं जीते?

प्रश्नकर्ता: शादी भी हो गई है।

आचार्य प्रशांत: अब और करनी है?

प्रश्नकर्ता: नहीं। वो तो आपने उदाहरण पूछा था, वैसे बताया था।

आचार्य प्रशांत: अभी क्या चाहिए जिसके लिए डरे हुए हो?

प्रश्नकर्ता: कुछ नहीं।

आचार्य प्रशांत: भक! जिसको कुछ नहीं चाहिए होता वो आज़ाद हो जाता है, पूर्णतया निर्भीक। जो इतना डर रहा है, उसे बहुत कुछ चाहिए है अभी। क्या चाहिए?

प्रश्नकर्ता: चाहिए तो नहीं लेकिन जो ‘अच्छे’ की सोच है, वो ही निकल नहीं रही दिमाग से।

आचार्य प्रशांत: न, बात सोच की है ही नहीं। बात सीधे-सीधे भौतिक वस्तुओं की है, भौतिक सुखों की है। या तो कुछ सुख हैं जो तुम्हें चाहिए, या कुछ सुख हैं जो मिले हुए हैं और तुम नहीं चाहते कि वो छिन जाएँ। या तो कुछ पाने का लालच है, या फ़िर कुछ पकड़े रहने की कामना। और जो चीज़ है वो पूर्णतया भौतिक ही होगी। कोई ऐसी भौतिक चीज़ है जो तुम्हें लग रहा है कि दूसरों से ही मिल रही है और दूसरे अगर खुश नहीं रहे तो वो चीज़ छिन जाएगी। वो कौन-सी चीज़ है बताओ?

प्रश्नकर्ता: नौकरी, इज़्ज़त, रिश्ते।

आचार्य प्रशांत: इज़्ज़त फ़िर मत बोलो। आख़िरी चीज़ इज़्ज़त नहीं है, इज़्ज़त से जो मिल रहा है वो बताओ। और वो कोई भौतिक चीज़ होती है।

प्रश्नकर्ता: रिश्ते।

आचार्य प्रशांत: रिश्तों से क्या मिल रहा है? भौतिक वस्तु का नाम लो।

देखो रिश्ते या तो प्रेम के होते हैं या पदार्थ के। प्रेम का अगर होगा रिश्ता तो उसमें डर इतना रहेगा नहीं। और डर इतना है, इसका मतलब रिश्ता है ही लालच का। अब लालच तो किसी चीज़ का ही होता है। भले ही तुम ये कहो कि तुम्हें इज़्ज़त का लालच है। इज़्ज़त का लालच भी अंततः किसी वस्तु का ही लालच होता है।

प्रश्नकर्ता: वो चीज़ मिलती भी नहीं है।

आचार्य प्रशांत: कौन-सी चीज़?

प्रश्नकर्ता: जिसका लालच है।

आचार्य प्रशांत: किसका?

प्रश्नकर्ता: वो खुद को भी पता नहीं चलता।

आचार्य प्रशांत: अरे, ऐसा नहीं है, बताना नहीं चाह रहे।

बेटा, हम ऐसी मजबूर ज़िंदगियाँ जीते हैं जिसमें हमारे पास जो कुछ भी भौतिक रूप से होता है वो सब कुछ दूसरों के रहमों-कर्म पर आश्रित होता है। बहुत लोग तो ऐसे हैं जिनकी अगर समाज में इज़्ज़त गिर जाए तो उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर चली जाएगी। और होता भी है। बहुत लोग तो ऐसे हैं जिनकी अगर समाज में इज़्ज़त न रहे तो उन्हें घर खाली करना पड़ेगा। अब बताओ, वो समाज की नज़रों में अपनी छवि ठीक रखना चाहेंगे या नहीं? बोलो।

तुम्हारे जीवन में जो कुछ होता है, जब वो असली नहीं होता, आत्मिक नहीं होता, तो तुम हमेशा डरे-डरे घूमते हो क्योंकि जो है वो छिन सकता है।

समाधान—ऐसी चीज़ों से तौबा कर लो जो छिन सकती हैं। जिसको बचाने की इतनी बड़ी क़ीमत अदा करनी पड़ती हो, उसको बचाओ ही मत। ज़िंदगी में कुछ ऐसा लेकर के आओ जो छिन नहीं सकता, फ़िर दूसरों का मुँह नहीं देखना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता: ये चीज़ पता भी नहीं चलती।

आचार्य प्रशांत: तो जितनी चीज़ें हैं तुम्हारे पास, समझ लो कि वही चीज़ें दूसरों पर आश्रित हैं। जो कुछ तुम्हारे जीवन में भौतिक रूप से मौजूद है, समझ लो वही तुम्हारे दुःख का, तनाव का कारण है। उसी को बचाने के लिए ही तो लगे हुए हो।

वो जो आख़िरी चीज़ है, जो दूसरों पर आश्रित होती है, उसका नाम है ‘अहम’। वो दूसरों के सहारे के बिना चल ही नहीं सकती। अहम कमज़ोर है, लंगड़ा है—उसे लाठी चाहिए होती है, किसी का सहारा चाहिए होता है। अकेला वो नहीं चल सकता और सहारा उसे हमेशा किसी भौतिक वस्तु का, व्यक्ति का ही चाहिए। इसीलिए तो अहम अपने चारों ओर व्यक्ति जुटाता है, वस्तुएँ इकट्ठी करता है।

प्रश्नकर्ता: व्यक्तियों से वो डरता भी है।

आचार्य प्रशांत: हाँ, डरेगा ही कि कहीं चले न जाएँ। अहम कहता है कि मैं इनपर आश्रित हूँ, अगर ये चले गए तो मैं तो गिर ही जाऊँगा न? तुम किसी का सहारा लेकर खड़े हो और वो व्यक्ति कहे “मैं जा रहा हूँ”, तुम तो डर जाओगे। तुम किसी रस्सी पर अटके हुए हो और कोई कहे रस्सी काट रहा हूँ, कितना डरोगे? लटकना बंद करो। ये भरोसा करो कि बिना लटके भी जिया जा सकता है। तुम्हें न कोई सीढ़ी चाहिए, न कोई रस्सी चाहिए—तुम स्वतंत्र हो, तुम आज़ाद हो, ग़ुलामी अनिवार्यता नहीं है।

थोड़ा प्रयोग तो करके देखो, जिन बातों को, जिन लोगों को, जिन वस्तुओं को तुम अपने लिए बहुत ज़रूरी समझते हो, थोड़ा-सा उनसे हटकर देखो—कष्ट होगा, लेकिन मिट नहीं जाओगे तुम, तुम बने रहोगे। और जितना हटोगे, उतना ज़्यादा आज़ाद बने रहोगे। आज़ादी के लिए कुछ कष्ट झेलना पड़े तो ठीक है, वो कष्ट भी शुरू-शुरू में ही होता है ज़्यादा, क्योंकि पुरानी आदत है, वो टूटती है तो थोड़ी तकलीफ़ होती है। एक बार झेल जाओ, आगे तकलीफ़ भी कम हो जाती है, बंद हो जाती है, आज़ादी का आनंद मिलने लगता है।

प्रश्नकर्ता: करने की कोशिश करता हूँ लेकिन एक डर रहता है कि मैं कर भी पाउँगा या नहीं।

आचार्य प्रशांत: तो कर लो। अच्छी सोच है, कोशिश करनी चाहिए। ये तो बढ़िया बात है।

प्रश्नकर्ता: लेकिन होता नहीं है।

आचार्य प्रशांत: अब नहीं होता तो इस सोच से कहो कि नहीं होता तो बार-बार क्यों लौटकर आती है?

प्रश्नकर्ता: करना चाहता हूँ, लेकिन विचारों में फिर फँस जाता हूँ।

आचार्य प्रशांत: अब ये बात तुम गोल-गोल घुमा रहे हो। आगे नहीं जा रही है। “करना चाहता हूँ”, “होता है”, “सोचता हूँ”—अब ये बात कहीं को नहीं जा रही है। ‘करने’ पर यकीन रखो, ‘बात’ करने पर नहीं। “हम करते हैं, बहुत करते हैं, आचार्य जी”—क्या करते हैं?

बात। हम बात करते हैं!

कुछ करके दिखाओ, इतनी बातें बनाने से कुछ नहीं होगा। सोच में ये होता है, वहाँ ये होता है, ऐसा होता है, वैसा होता है—ज़ंजीरों को न हिंदी भाषा चाहिए, न अंग्रेज़ी भाषा चाहिए, इतनी बातें मत बनाओ। उन्हें हथोड़े की भाषा चाहिए। हथोड़े की भाषा में बात करो। इतनी हिंदी बोलोगे, कुछ नहीं होगा। जवान आदमी को और कोई भाषा आए-न-आए, हथोड़े की भाषा आनी चाहिए। जी आप कौन-सी भाषा बोलते हैं? “मैं हथौड़ा बोलता हूँ”। जिसको हथौड़ा बोलना नहीं आता, वो अपने बंधनों से बात-चीत ही करता रह जाएगा। बंधनों के सामने गीत गाएगा, भजन सुनाएगा, श्लोक बताएगा, उससे बंधन नहीं टूटते। बंधनों से कौन-सी भाषा में बात करनी पड़ती है? हथोड़े की।

तो हिंदी-अंग्रेज़ी बंद करो, बहुत हुआ। करके दिखाओ कुछ।

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