तपोभिः क्षीणपापानां शान्तानां वीतरागिणाम्। मुमुक्षूणामपेक्ष्योऽयमात्मबोधो विधीयते ॥ १॥
तपों के अभ्यास द्वारा जिन लोगों के पाप क्षीण हो गए हैं, जिनके चित्त शान्ति और राग-द्वेष या आसक्तियों से रहित हो गए हैं, ऐसे मोक्ष प्राप्ति की तीव्र इच्छा रखनेवाले साधकों के लिए 'आत्मबोध' नामक इस ग्रन्थ की रचना की जा रही है।
~ आत्मबोध, श्लोक १
प्रश्नकर्ता: जिस व्यक्ति को अध्यात्म के बारे में अभी पता नहीं है, या जो अध्यात्म की राह पर नहीं है, उसके लिए प्रथम स्टेप या प्रथम पग क्या हो? उसको कैसे समझ में आए कि अध्यात्म की राह जो है वही एकमात्र राह है?
आचार्य प्रशांत: ये पूछ रहे हो कि अध्यात्म की राह कहाँ से शुरू हो, कैसे शुरू हो, ये नहीं पूछ रहे कि किसके लिए शुरू हो; और वही महत्वपूर्ण बात है तुम्हारे लिए।
किसके लिए शुरू हो? जिसे आवश्यकता हो उसके लिए शुरू हो। आवश्यकता नहीं है तो न कोई मंज़िल है, न कोई मार्ग है। और आवश्यकता है – ये बात जताई नहीं जा सकती, वो तो तुम्हें अनुभव होनी चाहिए।
कुछ भीतर की व्यग्रताएँ ऐसी होतीं हैं जो कुछ करके मिट जातीं हैं, कुछ ऐसी होतीं हैं जो कुछ पाकर मिट जातीं हैं, कुछ ऐसी होतीं हैं जो कुछ जानकर मिट जातीं हैं; कुछ ऐसी होतीं हैं जो न करने से मिटतीं हैं, न पाने से मिटतीं हैं, न जानने से मिटतीं हैं। जिनके जीवन में ऐसी व्यग्रताएँ आ गईं हों, उन्हें कुछ उपाय तो खोजना पड़ेगा न? वही अध्यात्म है।







