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निडर होकर दुनिया का अनुभव कैसे करें?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
19 min
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प्रश्नकर्ता: डर जो होता है हमें हमेशा हो आउटवार्डली रखता है उसकी वजह से ये जो गहराई है यानी कि व्यवहार में एक तरह का संतुलन रहे, इधर के भी ज्ञान रहे और उधर का भी तब जा कर आप फिर एक तरफ के पूरी तरह से हो पाते हो (ऑल इन)

आचार्य प्रशांत: ऑल इन नहीं हो पाते हो, ये धारणा झूठी है! 'डर' भी तुमको पूरे तरीके से संसार का नहीं होने देता। 'डर' ही तो तुम्हें संसार का नहीं होने देता। संसार के प्रति तुम कोई भी भावना रखते हो, वो तुम्हें संसार का होने नहीं देती। तुम लोग अनुभवों की बात करते हो मैंने बार-बार कहा है कि "तुम अनुभव नहीं ले पाते; अनुभव ले पाने के लिए बड़ा खुलापन चाहिए।" तुम अनुभव में उतर ही नहीं पाते, अनुभव के प्रति तो तुम्हारे पास बड़े कवच हैं, बड़ी धारणाएँ हैं, बड़े अवरोध हैं, तुम्हें कहाँ कोई अनुभव हो पाता है?

अनुभव आता नहीं है कि तुम बिदकना शुरू कर देते हो अरे! कुछ हो जाएगा! दाग न लग जाए! आग न लग जाए! तुमने कोई अनुभव लिया है? कभी टूट के रोए हो? ऐसा रोए हो कि बिखर ही गए? थोड़ा-सा रो लेते हो, जैसे नाक बहे थोड़ी देर को। सावन बहा है कभी? हंसी, खुशी, प्रसन्नता जिसकी तलाश में रहते हो वो भी बहुत मिल जाती है तो घबरा जाते हो। थोड़ी देर में कहना शुरू कर देते हो- "बड़े बूढ़े बता गए हैं, विषयों में बहुत संलग्न मत होना!" इतनी खुशी मिल गई ना? ज़्यादा मत लेना! का बिट्टू तीन बार कर लिए? नहीं अब उठो चलो! तीन बार तक ठीक है, चौथी बार में करोगे तो भोगी कहलाओगे। तुम्हें कोई अनुभव पूरा होता है? बहुत जल्दी तुम्हारी वर्जनाएँ खड़ी हो जाती हैं।

मैं अंधाधुंध भोग की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उसकी बात कर रहा हूँ जो तुम्हें बहती हवा का भी पूरा अनुभव लेने नहीं देता। तुम खड़े हो बाजार में, तुम्हारे घुटनों बराबर कोई भिखारी बच्चा आकर तुम्हें छू जाता है, कंपन उठता है, एक लहर आती है तुमने देखा है? तुम उस लहर का कैसे गला घोटते हो? अब बच्चा गंदा है, दुर्बल है, पर बड़ा खूबसूरत है। तुम खड़े हो बाजार में, कोई भिखारी बच्चा, इतना ही है, तुम्हारे घुटनों तक आता है, आ के तुम्हें यहाँ छू गया, पांव में, उठा पाते हो उसे गोद में? बोलो? मौका था प्रेम का अनुभव लेने का, उस मौके को भुना पाते हो? बोलो?

तुम्हारे सामने कोई गायक गाता हो, कि कोई नर्तक नाचता हो, कि वक्ता बोलता हो और तुम्हारे झुर्झुरी छूटी जा रही है। तुम बिल्कुल आलोइत हुए जा रहे हो, तो भी तुम इतनी छूट देते हो अपने आपको? कि उठकर जाओ और उसके गले मिल जाओ, कि चूम लो उसको, कि उसके पांव पड़ जाओ? कोई अनुभव तुम अपने आपको होने कहाँ देते हो?

प्रेम का पल है और तुम सुध-बुध खोए दे रहे हो। तुमने देखा है? तुम कितने डरे हुए और झूठे आदमी हो! प्रेम के पलों में जब तुम्हारी सुध-बुध खो रही होती है तो तुम ज़बरदस्ती होश का स्वांग करते हो! तुम बल्कि कोशिश करते हो कि प्रेम की ख़ुमारी तुम पर पूरी न छा जाए। तुम अनुभव अपने आपको लेने कहाँ देते हो?

प्रेम के पल में कभी भी तुमने बह जाने दिया अपने आपको? नहीं! तुम पहरेदार बन कर खड़े हो गए। हुए कि नहीं हुए? तुम्हें डर लगता है कि इच्छा में पगी हुई मेरी सूरत अगर मेरे प्रेमी ने देख ली तो कहीं वह मुझे चरित्रहीन न समझ ले। इन आँखों में इस वक्त कुछ नहीं है सिर्फ़ प्यास है! प्यास है! इन आँखों को छुपाओ। दूसरे ने देख लिया कि इतनी हसरत है मुझे इतनी प्यास से तो कहीं वो हावी न हो जाए मुझ पर? तुम कहाँ कोई अनुभव लेते हो?

अपने आप से ही झूठ बोल देते हो न? कुछ है जो बहुत बुरा लगा! अपने आपको समझा देते हो नहीं ज़्यादा बुरा नहीं था ठीक है! जीत मिलती है तो तुम झूम नहीं पाते! क्यों नहीं झूम पाते? अरे! प्रतिपक्षी टीम को बुरा लग जाएगा। उल्लास में ज़रा संयम होना चाहिए! किसी का दिल नहीं दुखाना है। हार जाते हो तो चिल्ला नहीं पाते! "हार-जीत में समभाव रखना चाहिए।" संत जन बता गए हैं। हारो तो भी यूँ प्रदर्शित करो जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। तुम्हें कहाँ हार का अनुभव हुआ है? तुम्हें एक बार हार का पूरा अनुभव हो जाता उसके बाद तुम हारने से इंकार कर देते। जीवन भर हारते ही रहते हो क्यों? क्योंकि हार कभी तुम्हें छू ही नहीं पाती, तुमने अवरोध खड़े कर रखे हैं। तुम अपने आपको यह अनुभव ही नहीं करने देते कि तुम हारे, तुम यूँ मुँह बना लेते हो कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं! कुछ हुआ नहीं! कुछ भी नहीं! आत्मा के तल पर देखो तो वास्तव में कुछ हुआ नहीं वहाँ तो कभी कुछ नहीं होता, पर तुम्हारे तल पर तो बहुत कुछ हो गया, ज़मीन-आसमान एक हो गए। क्यों झूठ बोलते हो? क्यों नहीं मानते? कि तुम्हारे तल पर भूकंप आ गया! तुम हार गए! क्यों नहीं फूट-फूटकर रोते? तुम नहीं रोते।

तुम प्रेमी के सामने भी ऐसे हो जाते हो कि जैसे मुर्दा हो। शारीरिक उत्तेजना भी कहाँ पूरी होती है तुमको? उसमें भी तो ऐसे ही रहते हो जैसे मुर्दे को गुदगुदी की जा रही है। वो कितना उत्तेजित हो जाएगा? काम के, भोग के पलों में भी अपने आपको देखना? कैसे मुर्दे जैसे रहते हो पड़े हुए? संत जन बता गए हैं 'माया' बुरी बात!

तुम आए हो इस पृथ्वी पर? तुम जी रहे हो? तुम्हें कुछ पता है? चाँद का तुम पर कोई असर होता है? फूलों के साथ कभी तुम भी खिलते हो? किसी की मौत पर तुम भी मरे हो साथ? कोई प्यारा से प्यारा होता है तुम्हारा और मरता है तुम इंकार कर देते हो उसके साथ मरने में भी। एक बार तुम मर लिए होते किसी के साथ, तो जीना सीख जाते! पर तुम मरते भी नहीं। रात में तुम प्यार की कसमे खा रहे थे और सुबह वो मर गया! तुम थोड़ा-सा रो लेते हो।

प्र: उससे ज़्यादा कैसे रोयें? मतलब जितना आंसू आए….

आचार्य: अनुभव से डरते हो!

प्र: उसको कैसे ख़त्म किया जाए?

आचार्य: अनुभव से इसलिए डरते हो क्योंकि लगता है अनुभव तुम्हें मिटा देगा। श्रद्धा रखो कि कोई अनुभव तुम्हें मिटा नहीं देगा! अनुभव ऊपरी चीज़ है, ऊपरी किसी चीज़ से डरना क्या? उसे आने दो न पूरा-पूरा। ऊपरी से डर-डर के तुम ऊपरी को इतना गंभीर मसला बना देते हो कि पूछो मत!

प्र: चुनाव की बात नहीं लगती, सामर्थ्य की बात लगती है। होता ही नहीं है!

आचार्य: डरे हुए हो! मानो इस बात को! बहुत डरे हुए हो!

प्र: हो ही नहीं रहा है! पूरी व्यवस्था ही ऐसी है।

आचार्य: व्यवस्था ऐसी बना ली है। फिर इसीलिए तो साधना चाहिए होती है न? तुम से खुला जाता ही नहीं। जैसे किसी बच्चे को दशकों तक डराया गया हो अब तुम उससे मज़ाक नहीं कर सकते। जो डरे हुए बच्चे होते हैं, उनकी एक पहचान यह होती है कि तुम उनसे मज़ाक नहीं कर सकते। वो मज़ाक नहीं समझते! न उन्हें मज़ाक करना आता है न उन्हें मज़ाक समझ में आते हैं! बड़ी दयनीय हालत है! दिल पे ले लेते हैं! दिल पर लेने का अर्थ समझते हो न? गंभीरता से ले लेना, आहत हो जाना। तुम इतने आहत हो कि तुम अपने आपको आहत होने की अनुमति ही नहीं दे पाते। तुम कहते हो "इतनी तो चोट लगी हुई है; अब और चोट कैसे लगवा लें?"

आईसीयू का रोगी थोड़े ही उतरता है मुक्केबाजी की रंग में? कि दंगल के अखाड़े में? घूँसे अगर खाने हैं छाती पर? तो सबसे पहले छाती में जान होनी चाहिए। तुम्हारी छाती ही इतनी खोखली है कि तुम अखाड़े में उतरने से इंकार कर दोगे। तुम कहोगे एक दाँव पड़ा नहीं कि अस्थि-पंजर बराबर हो जाएगा। इस बात को समझना छाती जब मजबूत होती है तो तुम कहते हो आओ! मुक्के बजाएँगे भी और मुक्के खाएँगे भी। तुम्हें एक मुक्का कोई मार दे तुम बुरा मान जाते हो क्यों? छाती खोखली है।

प्र: आप जितने हो आप उतना ही अनुभव कर पाते हो!

आचार्य: बस! बहुत बढ़िया! प्यारी बात! आप इतने से हो, उससे ज़्यादा का अनुभव भी नहीं होता आपको। 'एक्सटसी' नहीं आती! बड़ा प्यारा शब्द है 'एक्सटसी' का अर्थ समझते हो क्या होता है? ऐसा भाव उठा कि हमें तोड़ गया! हम से बाहर आ गया! हम अपने आप से जैसे बाहर आ गए! इसका शाब्दिक अर्थ बिल्कुल यही है- अपने से बाहर आ जाना। अपनी जो काया बना रखी है, अपनी जो वर्ज़ना बना रखी है, ऐसा भाव उठा कि उससे बाहर आ गए! बेसुध हो गए! बेहाल हो गए! बेहोश हो गए! बेख़बर हो गए! जैसे संत गाते हैं न? "अब लगन लगी! अब लगन लगी!" लग गई!

हमें नहीं पता हम कौन हैं? तुम अपने से बाहर आ ही नहीं पाते। तुम बेसुध कभी हो ही नहीं पाते, बेहोश कभी हो ही नहीं पाते, अपने आपको कभी खो ही नहीं पाते क्यों? क्योंकि तुम्हें हर समय परवाह है अपनी इज़्ज़त की, अपनी सुरक्षा की। जैसे कोई लाजवंती हो, वह कहाँ से नाचेगी? उसको तो यही देखना है कि कहीं पल्लू तो नहीं गिर गया! ससुर जी बहुत मारेंगे! तो वैसे ही तुम नाच कहाँ पाते हो? तुम कुछ नहीं कर पाते! तुम्हारा सारा ध्यान इस पर रहता है कि पल्लू न गिर जाए, कोई देख न ले।

अनुभव करने के लिए तो एक बेख़्याली चाहिए, एक बेपरवाही चाहिए, बड़ा बेखौफ़ जिगर चाहिए। तुम में बेपरवाही कभी आती ही नहीं। तुम में हर समय यही परवाह लगी रहती है कि कौन देख रहा है? कौन मेरे बारे में क्या ख़्याल बना लेगा? कौन क्या सोच रहा है? किसी ने कोई व्यंग तो नहीं मार दिया? दिल खोखला है!

कहाँ कुछ अनुभव करोगे? संसार को अनुभव करने के लिए परमात्मा में बड़ी श्रद्धा चाहिए! भीतर बड़ी पूर्णता का भाव चाहिए या कह लो कम से कम अपूर्णता का भाव न हो! कितनी जल्दी-जल्दी तो चोटिल-घायल हो जाते हो? कभी किसी के सामने भिखारी बन पाते हो? तुरंत तुम्हें डर लगने लग जाता है हाय वो क्या सोचेगा? "हम इतने लालायित हैं!" भीतर से भले ही तुम भिक्षा माँग रहे होगे, ऊपर-ऊपर यही दिखाओगे।

मैं साधारण सी बात करता हूँ, बहुत लोग ऐसे हैं जो काम के क्षण में भी भिखारी नहीं बन पाते। उन्हें उस वक्त भी नाक ऊँची रखनी है। तुम काम भिक्षा भी माँग पाते हो? "तेरे द्वार खड़ा है देवी! ना माँगू में सोना चांदी माँगू दर्शन तेरे!" कह पाते हो? वहाँ भी तुम्हें समाज और संस्कार पकड़ लेते हैं। कहाँ अनुभव कर पाओगे? भिखारी होना भी कहाँ अनुभव कर पाओगे?

और बड़ा ऊँचा होता है वो क्षण, जब तुम पाते हो कि तुम पूरे-पूरे भिखारी हुए जा रहे हो, फिर भी भिखारी हो नहीं पा रहे। तब तुम्हें पता चलता है अपनी ऊँचाई का, अपने ऐश्वर्य, अपने वैभव का। हम इतनी याचना कर रहे हैं पर याचक तब भी नहीं हो पा रहे। तुम याचना से डरते हो! तुम्हें लगता है याचना करी तो याचक हो जाएँगे और करो पूरी-पूरी याचना तब तुम्हें एहसास होगा कि बाहर-बाहर पूरे भिखारी हो गए, तब भी भीतर कुछ होता है जिस की बादशाहत में कमी नहीं आती! अब बनी बात! ये तो मज़ेदार बात है! अब हमें भीख माँगने से कौन रोक सकता है? अब माँगेंगे भीख क्योंकि भीतर कुछ है जो बाहर की घटनाओं के कारण अपने सिंहासन से उतरेगा नहीं। वह बादशाह, बादशाह ही रहेगा। अब माँगेंगे भीख। तुम कहोगे नहीं!

शिविरों में आते हो, यहाँ लोगों को किरदार दिए जाते हैं। कहते हैं चलो रोल प्ले करो थोड़ा, सिर्फ़ अभिनय, खुल्ला अभिनय! जाहिर बात है अभिनय हो रहा है, सबको पता है। उनमें आप किसी इज़्ज़तदार आदमी को कहिए "तू ज़रा खुजली वाला कुत्ता बन जा।" उन्हें अड़चन हो जाती है। नहीं! देखो हम खुजली वाला कुत्ता तो नहीं बनेंगे। तुम क्या अनुभव करोगे?

परमात्मा को सूअर बनने से कोई ऐतराज़ नहीं है, परमात्मा ही तो सूअर बन के नाली में लोट रहा है! तुम्हें कह दिया जाए सूअर बन जाओ, या कह दिया जाए "ज़रा थोड़ी देर को मिट्टी में लोट जाओ यहाँ बाहर।" अभी देखना तुम कैसे नहीं! साहब हम तो कुलीन लोग हैं न? संभ्रांत हैं! अरे! भद्र पुरुष हैं, सूकर नाहि! परमात्मा को कोई ऐतराज़ नहीं है वो सूअर भी है, नाला भी है। तुम्हें बड़ा ऐतराज़ है! लिया है कभी नाले का अनुभव? लोटे हो? भद्र पुरुष हो! राय चौधरी हो! कैसे लोटोगे?

अब भूख लग रही होगी! लेकिन बोल नहीं पाओगे कि "थम जाइए महाराज! खाने भी दीजिए!" बड़ी अड़चन है! संस्कार आड़े आ रहे हैं। जिस किसी को भी देखो और अपने आपसे भी सवाल यही पूछा करो "तुम जो हो, यदि तुम वो न हो, तो भी क्या तुम वो रहोगे, जो तुम हो?" बस यह सवाल पूछा करो! "तुम जो हो यदि वो तुम ना रहो... समझा कर बोलता हूँ" तुम जो दिखते हो, तुम यदि उसके विपरीत हो जाओ, तो भी क्या तुम वही रहोगे जो तुम हो? यदि हाँ! तो तुम असली आदमी हो! नहीं तो तुम स्वांग मचा रहे हो! भगो यहाँ से!

तुम दाढ़ी में दिखते हो, तुम कुर्ते में दिखते हो। दाढ़ी चली गई, कुर्ता चला गया उसके बाद भी क्या तुम बचोगे? तुम वही रहोगे जो तुम हो? तुम हो अगर, तो असली हो! और अगर दाढ़ी और कुर्ता तुम्हारी अनिवार्यता बन गया है, उसके बिना तुम मिट ही जाते हो तो समझ लो तुम वो हो नहीं।

तुम बड़ी सती-विदुषी बनकर घूमती हो, सफेद साड़ी! ये उतर गई सफेद साड़ी, तो भी क्या बचोगी तुम? इस सफेद साड़ी के बिना भी यदि तुम वो रही आओ जो तुम हो, तब तो तुम असली हो, नहीं तो बड़ी नकली हो! इसको कहते हैं आतमस्थ होना! अगर सब चला जाए मेरा, खड़ा हूँ मैं, मन छूटा, दौलत छूटी, इज्जत छूटी, धारणाएँ छूटी, सब छूटा उसके बाद भी मैं शेष हूँ! तब तो मैं हूँ और सब छूटा और सब के साथ मैं भी छूट गया तो मैं बड़ा नकली हूँ! यही सवाल पूछा करो! "जो तुम हो, तुम वो न रहो, तो भी क्या तुम हो?"

इससे बड़ी ताकत, बड़ी हिम्मत आती है। तुम छीन लो जो तुम्हें छीनना है, सब छीनने के बाद भी हम तो वही रहेंगे जो हम हैं! अब तुम कहते हो कि उतरे हम संसार में! मज़े लूटेंगे! जीतने के लिए उतरे हैं क्योंकि हार भी गए तो क्या छिन जाना है? हम तो सब जाने के बाद भी आधारभूत रहेंगे! शेष रहेंगे! यह निःशेषता 'सार्थक जीवन' के लिए बड़ी ज़रूरी है! खुल के खेलेंगे! जीवन 'डेड रबर' है! जीता हुआ है पहले ही, अब क्या करने आए हैं हम? खुलके खेलने आए हैं। चार मैचों की श्रृंखला थी 3-0 से उसी दिन आगे थे, जिस दिन पैदा हुए थे! जीवन चौथा मैच है 'तुरीय', आनंदभाव से खेलेंगे। जीते तो जीते, हारे भी तो हमारा क्या बिगड़ गया? कुछ दाँव पर नहीं लगा है! कुछ नहीं छिनने का! न पा सकते हो न गवाँ सकते हो

क्यों इतने गंभीर हो? क्या चाहिए? खाने में देर हो रही है? रिदम (10 वर्षीय शिविर प्रतिभागी) गंभीर नहीं है आप कैसे गंभीर हैं? मुँह ऐसा हो कि रिदम जैसा कि रसगुल्ला दिखाई पड़े गाल में बैठा ही हुआ है, ऐसे भक्का गाल होने चाहिए! एक रसगुल्ला इधर एक इधर अब रसगुल्ला मिले न मिले क्या अंतर पड़ता है? हमारे गाल ऐसे हैं कि एक रसगुल्ला यहाँ बैठा है एक यहाँ! मिठास भीतर है, पोषण भीतर है।

प्र: तुरीय क्या है?

आचार्य: तुरीय यही है! तीन अवस्थाएँ वो हैं जो आती जाती रहती हैं। अभी जगे हो, अभी सो जाओगे, सो जाओगे सपने लोगे, थोड़ी देर में सपना भी उठ जाएगा। तो ये आती-जाती रहती हैं। 'तुरीय' माने ये कि कुछ ऐसा हो- जो न आता हो न जाता हो। ये नहीं कि सपने के साथ तुम भी उठ गए। ये नहीं कि तुम अपने ही सपने के पात्र हो, सपना लो भी तो तुम सपने के दृष्टा रहो, सपने में एक चरित्र नहीं। सपने में तुम एक चरित्र भी बनो तो भी तुम उस चरित्र के दृष्टा रहो। डायरेक्टर-एक्टर! कोई नाटक हो रहा है उसमें तुम अभिनेता भी हो और निर्देशक भी हो। कई बार तुम्हें अपने ही सपने में कोई किरदार अदा करना पड़ता है ठीक है! कर लो। लेकिन कोई बात नहीं हम वो भी हैं जो उस किरदार को देख रहे हैं। ये तुरीय की बात है।

सारी बातें घूम फिर के इसी पे हैं- कोई पक्का सहारा है तुम्हारे पास कि नहीं है? या झड़ी हुई बूँद हो?

वो जो पक्का सहारा है उसी को परमात्मा कहते हैं। वही समस्त आध्यात्मिकता का ध्येय है। आंधियाँ चल रही हो, तूफान चल रहे हो तुम्हारी आँखे सहज हो, ठहरी हुई हो, हमारा कुछ उखड़ नहीं रहा!

भूकंप आए हुए हो तुम कह रहे हो "कुछ है भीतर जो हिल नहीं रहा" और बड़े नाटकीय तौर पर नहीं कह रहे हो कि सर पर अलमारी गिर रही है कि पत्थर गिर रहा है और तुम कह रहे हो कि हमारा कुछ हिल नहीं रहा। अरे! अभी खोपड़ा चकनाचूर हो जाएगा!

नाटक मत करो, ये बड़ी सूक्ष्म बात होती है कि जैसे तुम बचने के लिए दौड़ भी रहे हो तो भी भीतर कुछ है जो दौड़ नहीं रहा है। दौड़ने की मनाही नहीं है! भीतर की बात को बाहर पर आरोपित मत कर देना कि गुरु जी ने बताया था कि भूकंप में भी स्थिर रहना होता है तो अब भूकंप आ गया है और ऊपर से देख रहे हो की अलमारी गिरी गिरी गिरी अपने ऊपर गिर ही रही है और कह रहे हो गुरु जी ने कहा है भूकंप बाहर-बाहर है हिलना नहीं है और सर फुड़वा बैठे। सर फुड़वाने का नाम नहीं है आध्यात्मिकता! अलमारी जब गिरती हो, जान बचा के दौड़ो! दौड़ते वक्त भी कुछ ऐसा रहे जो डर-डर के नहीं दौड़ रहा। दौड़ते वक्त भी कुछ ऐसा रहे जो मानो दौड़ने पर हँसता हो। बड़ी से बड़ी आफ़त में भी जब तुम हर तरीके से प्राण बचाने के उपाय कर रहे हो, चेहरे पर हवाइयाँ उड़ी हुई हैं, तब भी कोई गहरी तरीके से झाँके आँखों में तो कहे कि ये आँखें डरी तो हैं पर पूरी तरह नहीं डरी हैं!

प्र: मैं इस चीज़ को समझना चाह रहा हूँ कि यह अवस्था तो 'इनडिफरेंस' में भी आ सकती है। आप जड़ हो जाओ तब भी आपको।

आचार्य: तो तुम पूरे तरीके से फिर 'इनडिफरेंस' में घुस गए! पूरे तरीके से उसने भी नहीं घुसना है। जीवन में ऐसी स्थितियाँ सकती हैं जब तुम उदासीन रहो, जब बहुत चीज़ों की उपेक्षा करो पर कुछ ऐसा भीतर होना चाहिए जिसको उपेक्षा भी नहीं करनी है। वो बस 'अस्पर्शित' है! उसे कुछ लेना ही देना नहीं है उसे इतना भी लेना देना नहीं है कि वो उपेक्षा करे। उपेक्षा करने वाला कौन है? मन! मन कर रहा है उपेक्षा। कोई और है भीतर, जो उपेक्षा करने में भी रुचि नहीं रखता। डर हो, हर्ष हो या उपेक्षा हो! ये सब मन के माहौल हैं।

आध्यात्मिकता कोई उपेक्षा का नाम थोड़े ही है। उपेक्षा तो मन की लहर है। संयोगवश बहुत लोग विरक्त हो जाते हैं। कोई तुम्हें धोखा देकर भाग गया हो, दो-चार दिन तुम विरक्त रहते हो, तब बड़े उदासीन रहोगे जग के प्रति, कुछ नहीं चाहिए! ना माँ खाना ले जा! ये तुम में कोई सन्यास थोड़े ही उतर आया है? ये तो लहर है अभी आई है अभी चली जाएगी।

अध्यात्म किसका नाम है? खूब लहराने का या न लहराने का?

दोनों का एक साथ!

सागर जैसे रहो! ऊपर ऊपर खूब लहराओ! भीतर-भीतर ज़रा भी नहीं! दोनों एक साथ!

कोई ऊपर-ऊपर देखे तो कहे "बाप रे! बड़ा क्रियाशील आदमी है, हर समय कुछ ना कुछ करते ही रहता है। क्या गति है इसकी? हवा सा बहता है!"

और कोई भीतर झाँक कर देखे तो कहे "ये तो महासमुद्र है! इसकी गहराइयों में तो कोई कंपन ही नहीं!"

कोई ऊपर-ऊपर देखे तो कहे "ये तो बोलता ही रहता है! बोलता ही रहता है! चुप ही नहीं होता!

भीतर झाँके तो कहे "बाबा! सिर्फ़ मौन गूँज रहा था, कोई आवाज़ नहीं थी!"

दोनों एक साथ!

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