श्रोता: सर मेरा प्रश्न ये है कि किसी को चाहने से हमारी ज़िंदगी इतनी अस्त-व्यस्त क्यों हो जाती है ? असर क्यों पड़ता है हमारे जीवन पर? अक्सर नकरात्मक असर ही होता है। क्यों होता है ऐसे?
वक्ता: ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ‘कोई’ नहीं है जो तुम्हारी ज़िन्दगी में आता-जाता है| जो आता-जाता है, तुम उसको ही ज़िन्दगी बना लेते हो |
तुम यदि ये कहते कि ज़िन्दगी अपनी जगह है, कोई मेहमान की तरह आया और फिर मेहमान की तरह रह कर चला गया, तो कोई अंतर नहीं पड़ता| पर यहाँ तो होता ये है कि मेहमान आता है और फिर जब जाता है तो अपने साथ घर ही लेकर चला जाता है| अब तुम खड़े हो कि घर कहाँ गया| अरे! मेहमान ही घर लेकर चला गया|
(सभी श्रोता हँसते हैं)
अगर ज़िन्दगी अपनी जगह हो और लोग उसमें आएं-जाएं तो कोई बुराई नहीं है| आप आईये आपका स्वागत है, आप कुछ समय बाद अब आप जा रहे हैं, नमस्कार, विदा|
यहाँ तो होता ये है कि जो आता है वही ज़िन्दगी बन जाता है। क्यों गाने नहीं सुने हैं? ‘ज़िन्दगी बन गये हो तुम’!
(सभी श्रोता हँसते हैं)




