भारत में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर बन रहे हैं, और चर्चा मेगावाट, पानी, कोयले और मंज़ूरियों की हो रही है। ये कीमतें वास्तविक हैं, लेकिन गहरा प्रश्न यह है कि इतनी कंप्यूटिंग शक्ति किस काम में लगेगी। इसकी बहुत-सी माँग हमारी अपनी बेचैनी से आती है, एक और मनोरंजन, एक और उपलब्धि की चाह से, और डिजिटल कंपनियाँ इसी असुरक्षा से कमाई करना सीख गई हैं। मशीनें कितनी बुद्धिमान हो गई हैं, इसका उत्सव मनाने से पहले क्या हम ईमानदारी से देख सकते हैं कि उन्हें आदेश कौन दे रहा है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Navbharat Times on 1 November '26
भारत में आज इतने बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर बनाने की घोषणाएं हो रही हैं कि कुछ साल पहले तक इसकी कल्पना भी मुश्किल थी। हर नई घोषणा में हज़ारों करोड़ के निवेश, सैकड़ों मेगावाट की क्षमता, रोज़गार के अवसरों और AI की वैश्विक दौड़ में भारत के आगे बढ़ने की बातें होती हैं। मशीनें पहले से बड़ी, तेज़ और अधिक सक्षम होती जा रही हैं। लेकिन इस सारे उत्साह में एक असुविधाजनक प्रश्न दब जाता है। इन मशीनों को निर्देश कौन देगा और इनसे क्या काम करवाया जाएगा? किसी भ्रमित व्यक्ति के हाथ में पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली साधन आ जाए, तो क्या वह साधन उसे समझदार बना देगा? या उसके भ्रम को ही पहले से कहीं अधिक ताकत मिल जाएगी?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में डेटा सेंटरों की स्थापित क्षमता 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर 1.57 गीगावाट पहुँच गई। ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (CEEW) के एक अध्ययन का अनुमान है कि 2030 तक यह क्षमता 4.5 से 6.5 गीगावाट हो सकती है। यह भविष्य का अनुमान है, अभी स्थापित हो चुकी क्षमता नहीं। लेकिन विस्तार की दिशा स्पष्ट है। चिकित्सा, शोध, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं के लिए भारत को आधुनिक कंप्यूटिंग सुविधाएँ चाहिए। तकनीकी कमज़ोरी कोई गुण नहीं है। मगर मेगावाट से बिजली की क्षमता का पता चलता है, उससे यह नहीं पता चलता कि उस बिजली से कराया जाने वाला काम कितना सार्थक है। हम बड़ी तत्परता से हिसाब लगाते हैं कि मशीनें क्या-क्या कर सकती हैं, लेकिन यह जाँचने की फ़ुर्सत कम ही निकालते हैं कि उनसे काम करवाना कौन चाहता है और क्यों।




