वक्ता: तो क्या बात उठाई है अरुण (श्रोता को इंगित करते हुए) ने? कि एक समय पर काम कर रहा होता हूँ, तो उसमें एक गति होती है, एक मोमेंटम होता है। फिर स्थिति बदल जाती है और वो जो पूरा उसमें वेग होता है काम के पीछे, वो जितना ज़ोर होता है, वो सब ख़त्म हो जाता है। क्या किया जाए? क्या किया जाए का सवाल तो बाद में आएगा, पहले तो अरुण, ये देख लें कि ये हो क्या रहा? फिर शायद स्पष्ट हो जाएगा कि क्या करना है।
मन कई तलों पर काम करता है। जो सबसे सतही तल होता है, वो विचार का तल होता है, और विचार के तल पर जो कुछ है, वो तुरंत आने जाने वाला है। बाहर की घटना से प्रभावित हो कर के तुरंत ही मन में कुछ ख्याल उठ सकता है। और जैसे ही जो घटना थी बाहर, वो नहीं रहेगी, तो वैसे ही वो विचार भी नहीं रहेगा। या ये कहें कि उस विचार की अपेक्षा कोई नया विचार आ जाएगा क्योंकि नई घटना आ जाएगी। ये मन का सबसे सतही तल है। इसको ऐसे समझ लो, जैसे समुद्र है। समुद्र की सतह पर बड़ी लहरें उठने लग जाती हैं, जब हवा चलती है। समुद्र की गहराई जानते हो खूब होती है। पर उसकी भी सतह हिलने लग जाती है, उसकी सतह पर तरंगे उठने लग जाती हैं, जब हवा चलती है। वैसे ही हमारा मन है, समुद्र की तरह। सबसे सतही तल है विचार का, बाहर कुछ बदला, बाहर की हवाएँ बदलीं और मन में तरंगें आ गई। इन तरंगों में कोई ख़ास ज़ोर नहीं होता। हवाएँ रुकेंगी या हवाओं की दिशा बदलेगी, तो ये तरंगे भी बदल जाएँगी। इनमें कोई ख़ास जान नहीं होती।
उन तरंगो से नीचे-नीचे समुद्र में तुम जानते होगे कि कर्रेंट्स चलती हैं। वो सतह पर ही नहीं होती हैं, वो गहराई पर भी चल रही होती हैं। सतह पर तो पता लगती ही हैं, पर मात्र सतह पर नहीं होती, वो गहराई पर चल रही होती हैं। उनमें ज़्यादा जान होती है। वो लगातार चलती रहती हैं और बाहरी प्रभावों से वो ज़्यादा प्रभावित नहीं होती। होती हैं, जब मौसम बदलता है, जब तापमान बदलते हैं, तो वो तरंगें भी बदल जाती हैं, कर्रेंट्स भी बदल जाती हैं। लेकिन उनमें एक स्थिरता होती है। उनके अपने प्राण होते हैं। बाहर दिन हो कि रात हो, सतह-सतह पर तुम पानी छप-छप कर लो, उससे सतह के नीचे जो धार बह रही है, जो कर्रेंट्स बह रही है, उस पर अंतर नहीं पड़ता है। सही बात तो ये है कि कई बार समुद्र ठंडा होता है और नीचे धार बह रही होती है, वो गर्म होती है। तुमने हॉट ओशियन कर्रेंट और *कोल्ड ओशन कर्रेंट*सुना होगा। समुद्र ठंडा है और नीचे , उसके भीतर जो धार बह रही है, वो गर्म है। लंदन का जो बंदरगाह है, वो काम ही इसलिए कर पाता है क्योंकि वहा पर एक गर्म धारा बह रही होती है नीचे। तो इस कारण जब चारों ओर बर्फ़ जमी होती है, तब भी लंदन के बंदरगाह पर बर्फ़ नहीं जमती। सोचो उस धारा में कितनी ताकत है कि चारों तरफ बर्फ़ ही बर्फ़ है, पर वो फिर भी गर्म है और ऐसी गर्म है कि वो बंदरगाह को जमने नहीं दे रही है। आ रही है बात समझ में?




