
काहू से नहि राखिये, काहू विधि की चाह। परम संतोषी हूजिये, रहिये बेपरवाह।।
~ संत चरणदास
आचार्य प्रशांत: सवाल इसमें है कि अगर सत्य की चाह बनी रहती है, पढ़ने की चाह बनी रहती है, तो ये भी तो एक तरह की परवाह है न? अभी बेपरवाही तो आई नहीं?…
The Bhagavad Gita is often accused of supporting caste and misogyny through selective quotations that ignore context, grammar, and the text's central teachings. A closer reading shows that its emphasis is on inner qualities, conscious action, and spiritual equality rather than birth-based hierarchy or gender discrimination. Misinterpretations arise when isolated verses are detached from their broader meaning, while the Gita consistently points toward self-knowledge, freedom from ego, and the universal possibility of liberation for every human being.

Yoga is action without attachment. Yoga is to refuse everything that keeps you little and limited. To live without a reason, to love without a cause, to act without greed and desire, that is Yoga. Total purposelessness is Yoga. Yoga is freedom from all whys.

Love is great. Love is necessary. Love is beautiful.
But what is love?
For most of us, love is the greatest excitement and comfort—and also the greatest suffering. Whether love has become a problem or something you cherish the most in your life, please go deeper into the matter. Know…

Spirituality is about belonging to existence. Not belonging to a narrow household, or caste or ideology. All these are boundaries. So, wherever there are boundaries, there is violence. Wherever there are boundaries, there is also the fear of being small, powerless, limited. The really non-violent one is at home, everywhere and in every situation. Non-violence is not about following duties. Non-violence is an action in clarity and love. That alone is non-violence.

Questioner: When I do something my parents don’t approve of, they scold me. But sometimes the matter goes too far and I get offended, and then I refrain from talking back to them; I fear that if I say something, I will end up hurting them. But then, if I…

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल भावनाओं को पहचानने पर है। कुछ चार साल पहले मैंने एक वर्कशॉप अटेंड की थी, जिसका नाम था ‘सेक्रेड फेमिनिन'। उसमें कुछ ऐसी बातें सामने आईं थी जो कि मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी।
उसमें एक स्टेटमेंट थी- ‘इमोशन इस द एज ऑफ़ वैकफुलनेस। उस टीचिंग…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, स्वधर्म क्या है? क्या स्वधर्म का पालन करते हुए आजीविका चलायी जा सकती है?
आचार्य प्रशांत: स्वधर्म का कोई सम्बन्ध आपके रोटी-पानी के जुगाड़ से नहीं है, कि ये ऑक्युपेशन (व्यवसाय) कि वो ऑक्युपेशन। आप जिसको वर्क (काम) बोलते हैं, वो और क्या होता है? आजीविका का…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है…

आचार्य प्रशांत: ध्यान की एक विधि। उत्सुकता आयी थी कि ध्यान की एक विधि दी जाए। तो आपमें से जो लोग उसके बारे में जानना चाहें, वो समझें।
शून्य-स्मरण। शून्य-स्मरण – जो कुछ भी बहुत आवश्यक और ज़रूरी लगता हो, जो कुछ भी नितांत क़रीबी, आवश्यक प्रतीत होता हो, उसको…

Acharya Prashant: Desire means that you are not alright with yourself and you want something else to happen, correct? So, we are anyway not living for ourselves. We are rather living to change ourselves. And are these not two very different things? If you are living for yourself as you…

प्रश्नकर्ता १: आचार्य जी, प्रणाम। आज गुरु पूर्णिमा का पावन अवसर है। आपसे आज तक मिला तो नहीं हूंँ, लेकिन आपके वीडियोस व्याख्यान ही मेरे लिए गुरु समान हैं। सबसे पहले धन्यवाद!
श्री गुरुगीता में आया है —
"शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन। लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यग्गुरुमेव समाश्रयेत्।।"
यदि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे कर्म में कोई विश्वास नहीं है, भक्ति में कोई श्रद्धा नहीं है। मुझे धर्म की कोई समझ नहीं है, तो परमात्मा की कृपा मुझ पर होगी या नहीं? परमात्मा से मेरा कभी साक्षात्कार होगा?
आचार्य प्रशांत: तो अभी जैसे भी हो तुम, उससे अगर संतुष्ट ही…

The character of Radha is not present in any of the Upanishads, obviously, not in the Vedas. It is not sufficiently present even in the Puranas. With respect to the character of Sri Krishna, there are two Puranas mainly. There is the Shrimad Bhagavad Puran and there is the Harivansh Puran. These two are dedicated to Sri Krishna. Even in these two, Radha is scarcely mentioned. Read more....

Questioner: I have a question on an excerpt from you.
“Aloneness is not about being free of others and living without others. Aloneness is to live without oneself. Aloneness does not have much to do with the so-called others; aloneness has everything to do with the one called oneself.”
I’d…

प्रश्नकर्ता: ग्रैटिट्यूड एंड ब्लिस (आभार और आनन्द) के स्टेट (अवस्था) में हमेशा कैसे रहें?
आचार्य प्रशांत: ग्रैटिट्यूड तो तभी आएगा जब दिखायी देगा कि क्या-क्या ख़तरे हो सकते थे, कहाँ-कहाँ फँस सकते थे, कितना आसान था किसी गड्ढे में गिर जाना, किसी जाल में फँस जाना, और बच गये।
वो…

Acharya Prashant: Everybody in his own personal way is seeking fulfillment and that is love. If you are young you may seek fulfillment in somebody's body, if you are middle-aged you may seek fulfillment in wealth and prestige, if you are old you may seek fulfillment in security and property…

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…

आचार्य प्रशांत डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपनेआप को बहुत मजबूर अनुभव न करो। और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अन्धी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक्क़त नहीं है, अगर वो अन्धी न हों। जो कामना आपको अन्धेरे…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अंकिता रावत है। सर, जैसे कि मन हमेशा चीज़ों की ओर आकर्षित होता है तो आकर्षित का मतलब होता है कि हमें वहाँ खुशी मिलेगी, हम उसके पीछे भागते हैं और वो और अन्त में हमें दुख ही होता है, मतलब खुशी और दुख का…

प्रश्नकर्ता: सर, सुबह जब मैं आया था और बैठा था गंगा किनारे। तो जो लोग घूमने आये थे, अभी भी जैसे हैं, तो लोग चिल्लाते क्यों हैं? जैसे मैंने भी अपने पर ध्यान दिया है, मैं भी बहुत चिल्लाता हूँ। तो ये चिल्लाहट क्यों है? कोई अभिव्यक्ति होती है?
आचार्य…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं आपको पिछले दो सालों से सुन रहा हूँ। ये मेरा पहला सत्र है। तो पिछले काफ़ी टाइम से में तनाव में रहा। सत्र में आने से पहले काफ़ी चीज़ों, आपके सारे पुराने वीडियोज़ में देख रहा था। तो उसमें आपने ये कहा था कि अपनेआप…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारतीय दर्शन में वेदों के आधार पर आस्तिक और नास्तिक का विभाजन किया गया। उसमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन को नास्तिक बोल दिया गया; जिसमें से मुख्यत: बौद्ध और जैन धर्म ने वेदों की सत्ता को माना नहीं, इस वजह से उसमें वर्गीकरण किया गया।
तो…

प्रश्नकर्ता: विशुद्ध चक्र की साधना करता था और एक दिन ऐसा लगा जैसे पार जा ही रहा हूँ, पर मन ने डराकर वापस कर दिया। फिर हिम्मत बाँधकर कोशिश की लेकिन वो मौक़ा दोबारा नहीं मिला। फिर शादी हुई और बाद में कोई दुर्घटना भी हुई जिसकी वजह से घुटने…

आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं…

The word for a Guru does not really exist in the English language. So, they have borrowed Guru itself, Guru. But they have borrowed the word Guru and rather misunderstood it and misapplied it. So, anybody who seems to be an expert at anything, can be justifiably called a Guru in the English language. Now that's not the proper usage in spirituality or in Sanskrit.

Questioner (Q): Good afternoon, Sir. I have a doubt. In the market, there are a number of Bhagavad Gitas available. Somebody told me that there are eighty varieties of the Gita. Even though the slokas are the same, from what I have seen, the explanation was not making sense. In…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दीक्षा में पढ़ते हुए जो पहला श्लोक था, “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते,” तो इसमें पूर्ण का क्या मतलब है?
आचार्य प्रशांत: जिसकी तुम्हें तलाश है।
प्र: पूर्ण किससे पूर्ण है?
आचार्य: पूर्ण किसी से पूर्ण नहीं होता। पूर्ण मात्र पूर्ण होता है।
प्र: क्या उसमें संसार…

आपसे अलग करने के लिए है ये जन्म, दुनिया, संसार। और आपको संघर्ष करना है। आपको कहना है — "नहीं, नहीं, प्रेम की बात है। मेरा मुझसे प्रेम।

जो सबसे अच्छे काम होते हैं उस पर दुनिया कभी इज़्ज़त नहीं देती। दुनिया इज़्ज़त बस उन कामों को देती है जो दुनियादारी के होते हैं। दुनिया जैसे ही काम करो, दुनिया द्वारा स्वीकृत काम करो, दुनियादारी में ही तुम भी लोटने लग जाओ, तो दुनिया इज़्ज़त देगी। सचमुच जो ऊँचे काम होते हैं, उसकी तो कभी इज़्ज़त मिलेगी ही नहीं। तो जो इज़्ज़त के बहुत प्यासे हैं वो फिर कभी सचमुच ऊँचे और अच्छे काम कर भी नहीं पाएँगे। ज़िंदगी में सचमुच अगर कोई काबिल-ए-तारीफ़ काम करना है, कोई मौलिक काम करना है, तो इज़्ज़त की चाह के साथ नहीं करा जा सकता।

प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी, आपसे जुड़ा था। तब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरी साथ श्रीमती जी भी आई हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था तब…

मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं आपको काफ़ी समय से सुन रहा हूँ, और आपको सुनने के बाद आपसे खुश नहीं हूँ। जब से मैंने आपको सुनना शुरू किया है, तब से मेरा पूरा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। (दर्शकों की हँसी और तालियाँ)
मैं पहले जैसा जीवन जीता था और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रकृति और पुरुष को समझाने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: पुरुष-प्रकृति की जो अवधारणा है, मूलतः वो सांख्य योग से आयी है। लेकिन जिस तरीके से ‘पुरुष' शब्द का प्रयोग फिर आध्यात्मिक साहित्य में हुआ है, वो आवश्यक नहीं है कि सांख्य योग के अनुसार ही हो।…

प्रश्नकर्ता मेरे को पता है कि मैं नशा करता हूँ और वो एक सर्टेन टाइम (निश्चित समय) पर आता है। शाम हो जाती है तब मन उधर को पूरा खिंचा चला आता है। वो जो मज़ा देता है मैं उसको छोड़ भी नहीं पाता और मैं कहीं भी कोई भी…

#तुम 'कूल' कैसे हो गए?
प्रश्नकर्ता: सर आप 'कूल' लोगों का एकदम बाजा बजा देते हो। तो सवाल मेरा यह है कि आप कूल लोगों की इतनी बजाते क्यों हैं? उनकी इतनी बेइज्जती क्यों करते हैं?
आचार्य प्रशांत: 'कूल' माने क्या? 'कूल' के आध्यात्मिक अर्थ हो सकते हैं। कृष्ण अर्जुन…

प्रश्नकर्ता: सर (महोदय), ये मेरा प्रश्न अपमानित करने के लिए नहीं है। तो जब आप कहते हैं कि— हमने शुरू में ही बात की थी कि फ़ियर ऑफ होल्डिंग नॉलेज, और ये सब— तो जब आप हमें ये सब सिखा रहे हैं तो क्या ये आपका एक तरह से…

कुरबाणु कीता तिसै विटहु, जिनि मोहु मीठा लाइआ ॥ – गुरु नानक
आचार्य प्रशांत: “कुरबाणु कीता तिसै विटहु, जिनि मोहु मीठा लाइआ” – मैं उस पर कुरबान जाता हूँ जिसने मोह को मीठा बना दिया है।
मोह हमेशा कड़वा होता है। मोह का अर्थ है अपने से बाहर किसी से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कभी दहेज जैसी कुप्रथा के ऊपर कुछ क्यों नहीं बोलते?
आचार्य प्रशांत: विचार नहीं आया कि इस पर भी अलग से कुछ बोला जाना चाहिए। संबंधों पर खूब बोला है, प्रेम पर बोला है, माया पर बोला है, लालच पर बोला है, झूठ पर बोला है।…

तोहि मोहि लगन लगाय रे फ़कीरवा तोहि मोहि लगन लगाय रे फ़कीरवा सोबत ही मैं अपने मंदिर में सबद बान मार जगाये रे फ़कीरवा डूबत ही मैं भव के सागर में बहियाँ पकर समुझाये रे फ़कीरवा एकै बचन बचन नहीं दूजा तुम मोसे बंध छुड़ाये रे फ़कीरवा कहै कबीर सुनो…

प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी, जब कोई कामना बहुत हावी हो जाती है तो उससे मिलने वाले तात्कालिक सुख के अलावा कुछ नहीं दिखता। लेकिन उस कामना को पूरी करने के बाद ग्लानि अनुभव होती है। जब चुनाव करना होता है, तब छोटे सुख की तरफ़ खिंच जाते हैं। उस…

Acharya Prashant: If you look at knowledge that man has gathered in various fields, you will easily see that all of man’s knowledge is related to man’s desire. Man does not try to gain knowledge in fields that have absolutely no connection with man’s fundamental desires.
Man desires, man gets…

Acharya Prashant: Observing the daily ordinary actions of the mind, that is the only way. Observing it as an impartial observer. There is no other method that is going to work because all other methods are ‘isolations.’ The method does something to life. The method excludes life; the method…

आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपका स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतिहास में ये भी देखा गया है कि धर्म परिवर्तन भी सबसे ज़्यादा भारतीयों का या स्पसिफिक्ली (विशेष रूप से) कहूँ तो हिन्दुओं का ही ज़्यादा हुआ है; तो उस पर भी मैं आपसे कुछ स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतनी आसानी से…