यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।
ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्म योगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग फल स्वरुप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक ५
प्रश्नकर्ता: श्रीमद्भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय ‘कर्म-सन्यास योग’ को आज पढ़ा मैंने। उसमें पाँचवें श्लोक का जो भावार्थ था कि ज्ञानयोग से जो स्थान प्राप्त होता है, जो परमगति की प्राप्ति होती है, वही प्राप्ति कर्मयोग से भी होती है।
कर्मयोग का सीधा अर्थ मुझे यह समझ में आता है कि जो भी कर्म है, उसे निःस्वार्थ भाव से, फल की आसक्ति से रहित होकर होने दिया जाए। और ज्ञानयोग का अर्थ मुझे यह समझ में आता है कि जो परमात्मा का तत्वज्ञान गुरु से मिलता है अथवा जो परमात्मा का तत्वज्ञान उपनिषदों में वर्णित है, उसके अनुसार जो अपनी स्थिति सतत शरीर में है, वह स्थिति स्वरूप में हो जाए। सांख्य का वही अर्थ समझ में आता है।
तो मेरा प्रश्न यही है कि जो स्थान ज्ञान योग से प्राप्त होता है, वही कर्मयोग से प्राप्त होता है और दोनों को एक ही समझना चाहिए। तो क्या केवल ज्ञान योग से उसकी प्राप्ति हो जाए तो कर्मयोग की आवश्यकता नहीं है? यह मेरा प्रश्न है।




