प्रश्नकर्ता: कई बार सुना ओशो साहब से; सुनते रहते थे। लेकिन आपके सानिध्य में आने पर स्पष्टता आई कि जीव का परम के प्रति जो एक मिलने की चाह है; वो प्रेम है। तो शुरू में जैसे पत्नी के साथ; देखने गए तो देह का ही सम्बन्ध रहा, देह को ही देख कर पसंद किया। अब जब प्रेम की बात होती है; तो मुझे तो कुछ-कुछ बोध है कि प्रेम क्या है, लेकिन उनको लगता है कि धोखा हो रहा है। उनको लगता है कि, "तुम बदल गए, हाँ हम तो तुमसे प्रेम करते हैं लेकिन अब तुम नहीं करते।"
तो सवाल यह था कि दो जीव के बीच भी कोई उस-तरह का प्रेम का सम्बन्ध हो सकता है?
आचार्य प्रशांत: हो सकता है नहीं; वही इस जग में व्यवहारिक है। अच्छा सवाल है। कह रहे हैं कि, "आचार्य जी जब भी आप प्रेम की बात करते हैं तो आप अहम् का आत्मा के प्रति, मन का सत्य के प्रति प्रेम की बात करते हैं।" पर इस जगत में दृष्टव्य वस्तु, पकड़ में आने वाला पदार्थ न तो मन है, न तो आत्मा है, न अहम् है, न सत्य है। हमने तो नहीं देखा कि कभी मेज पर सत्य रखा हो, न हमने कभी यह देखा कि ज़मीन पर अहम् टहल रहा है। यहाँ तो हम जो भाषा इस्तेमाल करते हैं वो दूसरी होती है। हम कहते हैं ये आदमी है, ये औरत है, ये तौलिया है, ये कागज़ है; है न? जगत की भाषा तो ये है।
तो कह रहे हैं कि कोई लौकिक प्रेम भी होता है या नहीं होता है? या बस परमार्थिक प्रेम ही होता है आसमान की तरफ? आदमी-औरत के मध्य भी कुछ प्रेम हो सकता है या नहीं हो सकता है?
बिलकुल हो सकता है।
जगत में जब आदमी-औरत ही होते हैं; तो जगत में जो प्रेम होगा वह भी व्यक्ति से व्यक्ति का ही होगा। और इस पर ख़ूब बात हुई है। आपके सामने भी ख़ूब बात करी है, जब करी तो आपने गौर नहीं किया; पर अब अपने पर पड़ी है तो प्रश्न पूछ रहे हैं। इश्क-ए-मजाज़ी, इश्क-ए-हकीकी अपरिचित शब्द हैं आपके लिए? कितनी बार मैंने बात करी है इनकी। स्टूडियो कबीर में आपने गाया भी है न इश्क-ए-मजाज़ी, इश्क-ए-हकीकी के बारे में?




