मानव इतिहास में प्रवासन कोई असामान्य घटना नहीं, बल्कि प्रकृति की स्वाभाविक गति है। लेकिन हर प्रवास एक जैसा नहीं होता। सुरक्षा, रोज़गार, शिक्षा या जलवायु संकट से मजबूर होकर जाना जीवन की आवश्यकता हो सकता है, जबकि अधिक उपभोग और पूर्णता की तलाश में जाना अहंकार की गति हो सकती है। इसलिए न अंधा स्वागत उचित है, न अंधा विरोध। विवेकपूर्ण जाँच, मानवीय संवेदना और दोनों पक्षों की जिम्मेदारी ही सही मार्ग है।
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Originally published in Navbharat Times on 9 August '26
मनुष्य केवल उस मिट्टी से बँधे रहने के लिए नहीं बना है जहाँ उसका जन्म हुआ। गति प्रकृति है; वह स्वाभाविक है और मानचित्र पर खींची गई किसी भी सीमा से कहीं पुरानी है। किसी प्रवासी पक्षी को महाद्वीप पार करते देखकर हमारे भीतर विस्मय जागता है। लेकिन जब वही प्रवृत्ति दो पैरों पर चलने वाले, कंधे पर झोला लटकाए मनुष्य के रूप में सामने आती है, तो वही भावना संदेह, यहाँ तक कि उपहास में बदल जाती है। ऐसा क्यों?
पक्षियों पर भी प्रतिबंध क्यों न लगा दिया जाए? इस झील या उस खेत में बिना बुलाए आने पर उन्हें डाँटा क्यों न जाए? वे आते हैं क्योंकि प्रकृति इसी तरह गतिशील है। और मनुष्य को भी केवल उसी गाँव तक सीमित रहने के लिए नहीं बनाया गया जहाँ उसका जन्म हुआ। जुलाई के अंत में लगभग साठ हज़ार लोग मोरक्को और स्पेन के छोटे-से एन्क्लेव सेउटा की सीमा पर लगी बाड़ पर टूट पड़े। उसे पार करने की कोशिश में सत्तर से अधिक लोग मारे गए। हर जगह इन दृश्यों को ‘घेराबंदी’ के रूप में देखा गया। ‘घेराबंदी’ कहना आसान है, लेकिन सही नहीं। कुछ ही दिनों में उन साठ हज़ार लोगों में से लगभग सभी लौटकर अपनी इच्छा से मोरक्को चले गए; दो हज़ार से भी कम लोग वहाँ रुके।




