
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। तो जस्ट परसों ही एक मूवी का ट्रेलर लॉन्च हुआ है, रामायण करके, और वह अभी तक इंडियन सिनेमा की सबसे महँगी प्रोजेक्ट वाली मूवी है, जो कि ₹4000 करोड़ की लागत में बनी हुई है। इस मूवी में विशेषतः राजकुमार राम की कहानी बताई गई है, जो कि उनके जन्म से लेकर विवाह तक की स्टोरी है।
साथ में मैं एक चीज़ और देख रही थी इसमें, कि इसको यह बोलकर बहुत ज़्यादा ग्लैमराइज़ किया जा रहा है कि यह 30 तारीख़ को ब्रह्म मुहूर्त में रिलीज़ की गई है, सुबह 4:15 पर। और इसमें एक और चीज़ थी कि इसको धर्म और अधर्म, मतलब versus में बताया जा रहा है कि यह उसके ऊपर है। और एक और इंटरेस्टिंग चीज़ थी कि जो सीता माता का कैरेक्टर है, जो साईं पल्लवी प्ले कर रही हैं, तो यह बोला जा रहा है कि यह सीता माता का पावन किरदार है, जो वो प्ले कर रही हैं।
तो मैं इसी पर आपसे समझना चाहती हूँ। एक और चीज़ है कि यह दो पार्ट्स में है, जो 4000 करोड़ का बना है।
आचार्य प्रशांत: ये मुझे चेतावनी दी गई थी कि जो कुछ बोल रहे हो उस पर बवाल कटेगा, तो याद रखना, रिकॉर्डिंग इन प्रोग्रेस।
कुछ नहीं, मेरे लिए यह नॉन-इश्यू है, मुझे यह ख़बर उत्तेजित ही नहीं करती। आपके लिए मुद्दा है, आपको देखनी है पिक्चर, आप जाकर देख लीजिए।
जिसके पास राम हैं, उसे किसी फ़िल्मी रामायण की ज़रूरत नहीं।
अभी कुछ दिन पहले भी एक बनाई थी।
श्रोता: आदिपुरुष।
आचार्य प्रशांत: आदिपुरुष, फिर उसमें बवाल काटा था कि हनुमान ने ऐसा क्यों बोल दिया और यह सब। पैसा कमाने के लिए विवाद भी पैदा किए जाते हैं। बातें बोली जाती हैं।
आप जो बातें बोल रही हो, यह भी आप तक मीडिया के थ्रू ही तो पहुँची होंगी। तो मीडिया ही कंट्रोवर्सी भी पैदा करती है। मीडिया को कई बार कंट्रोवर्सी पैदा करने के पैसे दिए जाते हैं, क्योंकि पिक्चर अगर कंट्रोवर्शियल होगी, तो और लोग भी देखने आएँगे।
मुझे तो अब सचमुच अरसा हो रहा है। पता नहीं कितने महीने कोई भी फ़िल्म देखे हुए, पता नहीं 2026 में कोई देखी भी है कि नहीं। एक-आध देखी होगी कोई। हॉल में जाना वैसे भी अब धीरे-धीरे मुश्किल हो रहा है, और ऐसा अभी कुछ रोमांच लगा भी नहीं कि कोई फ़िल्म ऐसी आई है कि मैं उसको देखने जाऊँ।
इस तरह की चीज़ों को एक ही जवाब होता है, क्या? कुछ नहीं। कुछ नहीं, ऐसे ही। पूछिए, "ये सब क्या चल रहा है? क्या है?" ऐसे ही है, कुछ नहीं, कोई दम नहीं, कोई बात नहीं, कोई सार नहीं। नथिंग, बबल, क्या? बबल, बच्चे होते हैं, वो बुलबुलों के पीछे भागते हैं। एक बुलबुला फूटता है दूसरा तैयार हो जाता है, और इन बुलबुलों पर जब रोशनी पड़ती है तो ऐसा लगता है इंद्रधनुष उतर आया है। देखा है कभी?
तो बस, जब तक बुलबुला है आप उसके पीछे भागोगे। हफ़्ते-दस दिन में जिसने 4000 करोड़ लगाकर पिक्चर बनाई है, उसके 8000 निकल आएँगे। आप अपनी जेब झाड़ते बैठे हो, वो अपनी जेब भरता बैठा है। हो गया, यही है। ज़िंदगी के आठ दस दिन, पंद्रह दिन और कट गए। हमें और चाहिए क्या? तरह-तरह के रंगीन बहाने, ताकि ज़िंदगी कटती जाए और हमें यह पता भी न लगे कि ज़िंदगी व्यर्थ ही जा रही है।
एक के बाद एक बहाने आते रहते हैं, अभी थोड़ी देर तक वो चलता रहा जंतर-मंतर पर। उससे मीडिया आपको बहलाता रहा। अब यह पिक्चर आ गई है, 30 तारीख़, माने यही 30 तारीख़ आने वाली?
प्रश्नकर्ता: ट्रेलर लॉन्च हुआ है।
आचार्य प्रशांत: अच्छा ट्रेलर रिलीज़ हुआ है। तो अब यह पिक्चर आएगी, फिर एक महीना उसमें कट जाएगा। पिक्चर आएगी, सब उस पर अपना कुछ बोलेंगे, कमेंट्री आएगी। आपके अड़ोसी-पड़ोसी देखकर आएँगे। महफ़िल बैठेगी, बातें करेंगे। वो कहेगा, "नहीं, वो सीन देखा था?" "नहीं, वो सीन देखा था?" ये सब बातें होंगी। कोई उस पर ट्वीट करेगा, कोई कुछ करेगा। ये सब अपना चलता रहेगा, ज़िंदगी काटने को एक और चीज़ मिल जाएगी। इसमें और क्या बोलूँ मैं?
बाक़ी, आपको वाक़ई अगर राम से प्रयोजन होता, तो आप फ़िल्मों की थोड़ी ही बात करते। "राम ब्रह्म परमारथ रूपा।"
फिर तो आप जाते न उनके पास जिन्होंने राम की बात करी है; फिर आपके लिए संत कबीर हैं, योगवासिष्ठ है। जाइए, वहाँ पर हैं राम। मौजूद हैं, अपने असली रूप में मौजूद हैं। मुझे तो बहुत अजीब लगेगा मतलब, किसी अभिनेता को देखते हुए राम के रूप में। मज़ाक कर रहे हो क्या?
पहली बात तो, जब ज्ञानियों ने चार रामों की बात करी है, तो वे साफ़ बोलते हैं कि चौथे ही राम में सार है। जो निराकार राम हैं, वही असली राम हैं। "चौथे राम में सार है, ताका करो विचार।" चौथे ही राम में सार है। लेकिन फिर वे यह भी कहते हैं कि चार राम हैं जगत में। तो यह जो पहले राम हैं, जिनको आप व्यक्ति-रूप में देखते हैं, चलो वो पहले हैं ज्ञानियों ने उनको भी स्वीकार किया।
पहली बात तो, राम कोई न व्यक्ति हैं, न व्यक्तित्व हैं। और यह बात कोई मैं नई-नवेली पहली बार नहीं बोल रहा हूँ। इतिहास की धारा में जितने ज्ञानी हुए हैं सबने यही बात बोली है कि राम को मनुष्य मत समझ लेना। इसका मतलब यह नहीं है कि वे कह रहे हैं कि राम कोई दैवीय शक्ति हैं। कह रहे हैं कि जिसको तुम सत्य कहते हो, नित्य कहते हो, आत्म कहते हो, ब्रह्म कहते हो, वो हैं राम। साधारण पुरुष तो क्या, दिव्य पुरुष भी नहीं हैं राम, ब्रह्म मात्र हैं राम। तो उनको तुम व्यक्तित्व की सीमाओं में क़ैद मत करो।
फिर राम जो हैं वो निरंतर हैं, लगातार हैं, हर युग में हैं। आप जिन राम को पर्दे पर या मंच पर अभिनीत करते हो, वो ऐतिहासिक राम हैं। वो वो राम हैं जिनका राजा दशरथ के घर जन्म हुआ था, वो कालिक राम हैं जो एक समय पर थे। पर राम तो लगातार हैं।
उस काल के राम को याद कर रहे हो, बहुत अच्छी बात है। पर ऐसा तो नहीं कि तुम इस काल के राम से बचना चाह रहे हो, इसीलिए उस काल के राम को याद कर रहे हो। राम भूलना नहीं, राम लगातार हैं। और जब मैं कह रहा हूँ, हर काल में हैं राम, तो मेरा आशय किसी व्यक्तित्व से नहीं है, क्योंकि राम तो व्यक्तित्व हैं नहीं। जो बात श्रीकृष्ण पर लागू होती है, गीता पर, वही श्रीराम पर भी लागू होती है।
अहंकार के विगलन की दिशा को ही राम कहते हैं।
"अविगत, अलख, अनादि, अनूपा। नेति-नेति कहे संत बखाना।"
अहंकार के विगलन की दिशा को ही। विगलन, नेति-नेति, उसी को तो राम कहते हैं। वो तो आप सब में मौजूद हैं।
"घट-घट रमता राम रमैया।"
अहंकार आप में है न, सब में? तो वही अहंकार एक तड़प भी रखता है कि मैं मिटूँ। वही हैं राम, असली।
आपके भीतर जो राम बैठे हैं, उन पर ध्यान दीजिए। और इस प्रश्न पर विचार करिए, कहीं ऐसा तो नहीं कि पर्दे पर कालिक राम को लाकर जो कालातीत राम हैं हम उनको भुला ही देना चाहते हों। हम यूँ कहकर कि राम वहाँ हैं, जो राम यहाँ (अपने भीतर) हैं, उनको भुला ही देना चाहते हों।
राम से दूरी क्यों? क्यों कह रहे हो, "वहाँ हैं, पर्दे पर हैं राम"? राम तो यहाँ हैं न। और यहाँ नहीं हैं तो फिर उनको वहाँ देखना काम नहीं आएगा।
और यहाँ कैसे हैं?
किसी छवि के रूप में नहीं, आपकी वेदना के रूप में, आपकी ही तड़प के रूप में। आप जो हो, आप वो होना नहीं चाहते, आपने भीतर जो अँधेरा भर रखा है, वह ख़ुद मिटने को तत्पर है। उसी वेदना को कहते हैं राम की दिशा। राम कोई व्यक्ति नहीं हैं, राम कोई मंज़िल नहीं हैं, राम कोई विषय नहीं हैं। वो जो भीतर बैठा है, "मैं, मैं" बोलता है, वो जिसको पुकार रहा है अपनी हर धड़कन के साथ, उसका नाम है राम।
हम बात कर रहे थे कि श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि चार तरह के लोग भजते हैं मुझको, आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। ठीक है? सातवाँ अध्याय, गीता। और फिर बोल रहे हैं, इन सब में मुझे वह ज्ञानी पसंद है, जो मुझसे एकनिष्ठ प्रेम करता है। ये तो पहले चार तरीके के उन्होंने बताए। कौन?
आर्त; आर्त माने जो दुखी बैठा हुआ है।
अर्थार्थी माने जिसके पास कामना है।
जिज्ञासु माने जो सिर्फ़ अभी जानना ही चाहता है।
ज्ञानी, जिसको लगता है कि वह कुछ जान गया है।
बोल रहे हैं, ये चार तरह के लोग भजते हैं, इनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है। और ज्ञानी में भी कौन-सा ज्ञानी श्रेष्ठ है? जिसने मुझे अपना विषय नहीं बनाया, जिसने मुझे अपना हृदय बनाया है। राम और श्रीकृष्ण एक हैं। आपको विषय-राम चाहिए या हृदय-राम चाहिए? हृदय-राम चाहिए। जब आप उनको कहीं बाहर स्थापित कर देते हो न, तो आप उन्हें अपना विषय बना देते हो। विषय नहीं, जो भीतर विषयता बैठी है, ये गले और इसके गलने की दिशा को ही रामत्व कहते हैं। यह जो भीतर बैठा है ये गले। और इसके गलने की उत्कंठा को, और गलने की दिशा को ही रामत्व कहते हैं।
जिनको उस रामत्व से प्रयोजन है वो क्या करेंगे इस तरह की बहुत फ़िल्में देखकर? ठीक है, लगी है थिएटर में, आपका मन करे आप देख आना, मुझे उस पर कुछ नहीं कहना है।