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विवाह के बाद पछतावा || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, शत-शत नमन। मेरे अब तक के जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य रहा है आपका विवेक और आपका मार्गदर्शन पाना। मैं अमेरिका में एक बैंक में आईटी में काम करता हूँ और आपको कुछ तीन साल से सुन रहा हूँ। बड़ी मेहनत के बाद इस बार आ पाया हूँ कोरोना और उसके बावजूद।

मैंने आपको सुनने के पहले जीवन में कुछ ऐसी ग़लतियाँ की हैं जिनके खिलाफ़ आपने बहुत सावधान किया है और जीवन में बहुत ज़्यादा दुख झेला है। और उनमें से एक है ग़लत संगत, ग़लत विवाह जो मैंने दो हज़ार पाँच में किया था। जीवन में—-बिलकुल जैसा आप कहते हैं—-बेहोशी में एक संतान भी हुई मेरी और मैं अपनी बेटी को अब आत्मनिर्भर बनाने का पाठ सिखाता हूँ। ग़लत संगत की वजह से और ग़लत विवाह की वजह से जीवन में बहुत दुख है। घर में मेरा पत्नी के साथ क्लेश भी रहता है ।

काश! यह निर्णय लेने से पहले मैंने आपको जीवन में सुना होता तो शायद मैंने इतना दुख नहीं झेला होता। लेकिन अब यह ग़लती तो हो ही गयी। मैं बहुत पछताता हूँ, लेकिन अब इन दुखों और इन बंधनों से आज़ाद होने का कोई साफ़-साफ़ रास्ता मैं सोच नहीं पा रहा हूँ। तो मैं अब इस जीवन में मुक्त होना चाहता हूँ। जीवन मुक्त होना चाहता हूँ। तो यह जानना चाहता हूँ कि अब मैं क्या करूँ, जिससे मैं अपने जीवन के दुख और बॅंधनों से छूट सकूँ और अब आज़ाद हो सकूँ? इसलिए आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: देखिए, हम कहते हैं, वेदांत समझाता है कि बंधन को अगर त्यागना है तो उसको समझना पड़ेगा। सारा ज़ोर समझने पर होता है न। आप वास्तव में बंधन से नहीं लड़ रहे होते, बंधन को लेकर आपकी जो नासमझी है, आप उससे लड़ रहे होते हैं। जो अपने बंधन को समझ गया, वो उससे आज़ाद हो जाता है।

आपकी संगति में, आपके परिवार में, यदि कोई है जो आपको बंधन जैसे लगते हैं, तो सबसे पहले तो यह मानना पड़ेगा कि आप उन्हें समझते नहीं हैं। क्योंकि यह नियम है कि जो अपने बंधन को समझ गया उसका बंधन अब बेअसर हो जाता है। बंधन आपको पकड़ के नहीं रख सकता अगर आपने उसको एकदम जान लिया कि यह चीज़ क्या है। यह प्रकृति का कौनसा उपकरण है और किस तरह से गति करता है, अगर आपने समझ लिया तो आप उससे मुक्त हो जाते हो।

आपने विवाह करा था तब आप एक अलग व्यक्ति थे, आपको अब लग रहा है कि बंधन था। आप अभी भी बहुत हद तक वही व्यक्ति हैं जिसने वो बंधन चुना था। हाँ, अब आप आंशिक रूप से जगने लगे हैं, आपको समझ में आने लगा है कि कहीं पर कुछ चूक हुई। लेकिन पूरे तरीक़े से आप अभी भी नहीं समझे हैं, क्योंकि पूरा समझना माने पूरी आज़ादी होता है। अगर पूरी तरह समझ रहे होते तो आज़ाद हो गए होते।

जिस व्यक्ति की आप बात कर रहे हैं, जिन व्यक्तियों की आप बात कर रहे हो, आपको उनको समझना होगा। आप जब उनको समझेंगे, आप बदल जाएँगे। गौर से समझिए पहले। आप अभी कौन हैं? जो नहीं समझते। ठीक? आप अगर समझने लगेंगे, तो आप…? बदल जाएँगे। आप अभी कौन हैं? जो आप नहीं समझते। आप नहीं समझते मैं कौन हूँ, जो मैं नहीं समझता। “मैं वो हूँ जो समझता नहीं।” आप समझने लगेंगे, तो आप बदल जाएँगे।

जो व्यक्ति है सामने, जो आपकी परेशानी का कारण है, वो किसको परेशान कर पा रहा है? आपको। माने जो आप अभी हैं। अभी आप कौन हैं? जो नहीं समझते। तो वो किन को परेशान कर पा रहे हैं? जो नहीं समझता। वो एक व्यक्ति है जो नहीं समझता उसको परेशान किया जा सकता है। जो नहीं समझता उसे परेशान किया जा सकता है। जो समझने लग गया, वो व्यक्ति दूसरा हो जाएगा; उसे परेशान करना सम्भव नहीं होगा।

लेकिन आप दूसरे व्यक्ति हो जाएँ, इसके लिए आपको शुरुआत जानने-समझने से करनी होगी और वो मुश्किल होगा। क्योंकि प्रकृति का कोई ज़ोर रहा होगा न, जिसके कारण आपने गठबॅंधन किया; वो ज़ोर अभी भी है। नासमझी का एक जादू चला होगा, वो जादू अभी भी पूरी तरह हट नहीं गया है। उसको जैसे-जैसे हटाते जाएँगे, वैसे-वैसे आप वो व्यक्ति रहेंगे ही नहीं, जिसको परेशान किया जा सके, जिसको तनाव दिया जा सके।

ये है (तौलिया), मुझे इसे टाँगना है। इसे टाँगने के लिए या तो यह मौजूद होना चाहिए (माईक से जुड़े रॉड पर टाँगते हुए), टाँग दिया। या यह मौज़ूद होना चाहिए, यहाँ टाँग दिया (किसी दूसरी जगह)। इसे बहुत पसंद है टॅंगना, इसका नाम ही है टॅंगना। अब मैं टॅंगने की इसकी वृत्ति से लड़ाई करूँ या समझ जाऊँ? याद रखो, वृत्ति किसकी है? इसकी है, इसे टॅंगना है (तौलिए को)। पर मैं समझ तो सकता हूँ न कि इसकी टॅंगने की वृत्ति है।

इसे अगर अपने मुताबिक़ टँगने के लिए कोई जगह या उपकरण मिल गया तो यह तो टँग जाएगी तौलिया। और इसकी वृत्ति को बदलना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल है। क्योंकि यह व्यक्ति दूसरा है, इसका तो अपना आत्म निर्णय होगा कि इसको बदलना है या नहीं बदलना है। तो मैं क्या करूँ इसको टँगने से रोकने के लिए? क्या करूँ? इसकी वृत्ति यही है कि यह तो टँगेगी । मैं क्या करूँ? जल्दी बोलिए!

प्र: समझ जाएँ कि इसकी वृत्ति टँगने की है।

आचार्य: यह आप हैं (माईक की रॉड), यह भी आप हैं (दूसरी वस्तु)। आप वो मत रहिए न जो आप सदा से रहे हैं। आप हट जाइए। आप उपलब्ध हैं टॅंगने के लिए, तो आप पर टॅंगा जाता है। मैं शारीरिक रूप से उपलब्ध होने की बात नहीं कर रहा। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप घर छोड़ के भाग जाएँ, कुछ और। क्योंकि आप पर टॅंगा भी शारीरिक रूप से नहीं जा रहा। आप पर मानसिक रूप से टंगा जा रहा है। आप मानसिक रूप से अपनेआप को उपलब्ध मत रखिए, कौन टँगेगा फिर आप पर?

लेकिन उसके लिए पहले आपको इसको समझना पड़ेगा (तौलिए को)। और इसको आप तब तक नहीं समझ सकते जब तक आप इससे अपना परिचय, अपनी पहचान जोड़े हुए हैं। जब तक इससे आपके प्रकृतिगत रूमानी ख़्वाब और यादें जुड़ी हुई हैं, तब तक आप इसको नहीं समझ पाएँगे। यही वजह होती है कि बाप, बेटे को नहीं समझ पाता। माँ, बेटी को नहीं समझ पाती और पति, पत्नी को नहीं समझ सकता। क्योंकि आपने पत्नी से शादी करी ही नहीं होती है, आपने एक रूमानी सपने से शादी करी होती है।

वास्तव में, पत्नी बेचारी की कोई ग़लती ही नहीं है। वो सपना आपको मिलता है फ़िल्मों से और लोक संस्कृति से। वो सपना आपको मिल गया, उस सपने ने आपको प्रेम में डाल दिया। प्रेम में आप पहले ही पड़ गए, क्योंकि एक सपना आपको दे दिया है। दो हज़ार पाँच में शादी हुई, उन्नीस-सौ-पिचानवें में ‘डीडीएलजे’ (एक फ़िल्म का नाम) आयी थी, उसने पहले से आपको सपना दे रखा था, बहुत पहले से सपना है। सपना है, पर सपने के लिए विषय नहीं था, तो हम फिर विषय खोजते हैं। और वो जो विषय है, उस बेचारे की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है कि वो हमारा सपना पूरा करे। आप समझ पा रहे हैं मैं क्या बोल रहा हूँ?

मेरे पास एक सपना है, वो सपना मुझे फिल्मों ने दिया है—सबको वहीं से आते हैं—-और वो सपना मिल गया है कि ऐसी ज़िन्दगी होगी, ऐसी एक लड़की होगी, ऐसा-ऐसा होगा, ऐसा-ऐसा होगा। वो सपना पहले से है, उस सपने में बस एक कमी है—सपना बिलकुल पूरा है—लड़की कहीं नहीं है उसमें। तो फिर हम शादी करते हैं या कुछ भी प्रेम-प्रसंग। अब वो जो लड़की या लड़का हम अपने जीवन में लेकर के आ रहे हैं, उसने कोई लिखित वादा तो करा नहीं है कि मैं तुम्हारे सपने को हक़ीक़त में बदल दूँगी। तो फिर जो भी हमारे साथी होते हैं, उनसे हमें निराशा होती है और फिर अनबन होती है।

क्योंकि कोई भी व्यक्ति आपके सपनों को पूरा तो कर नहीं सकता। वो सपने ही बड़े अजीब हैं, उन्हें कोई नहीं पूरा कर सकता। और पहले तो सिर्फ़ वो वाली पिक्चर होती थी जो सिनेमा हॉल में देखी जाती थी, अब तो कई-कई तरीक़े की होती हैं और उन सबसे सपने आते हैं—अच्छा ऐसा होगा, अच्छा ऐसा होगा! वो एक जादू था जो चला था, उस जादू से बाहर आना है। उस व्यक्ति को साफ़-साफ़ समझना है। उस व्यक्ति को न समझने में हमारा बड़ा क्षुद्र स्वार्थ है, क्योंकि अगर उसको समझ गए तो सपने टूटते हैं।

आप गौर से देखिएगा, जो भी पत्नियाँ अपने पतियों से निराश होती हैं या पति अपने पत्नियों से निराश होते हैं, वो कभी यह नहीं कहते कि 'मेरे सपने झूठे थे'। वो कहते हैं, “मेरे सपने टूटे थे"। निराशा इस बात की होनी चाहिए कि 'सपना झूठा था', लेकिन मुझे आकर बताया जाता है कि निराशा इस बात की है कि 'सपना टूटा था'।

सपना अगर टूटा था, तो दोष किसका है? तोड़ने वाले का। “वो नालायक है, उसने मेरा सपना तोड़ दिया।” सपना अगर झूठा था, तो दोष किसका है? सपना लेने वाले का। वो दोष हम लेना नहीं चाहते अपने ऊपर। अपने ऊपर हम दोष लेना नहीं चाहते, तो हम बस इतना कह देते हैं, “अरे! मुझे तो बड़ी निराशा हुई। अरे देखो! धोखा हो गया, धोखा हो गया।”

तुमसे कहा किसने था कि तुम पहले तो सपने बनाओ फिर जाकर किसी को उठा लाओ! और जिसको उठाते हो उसको कभी साफ़-साफ़ कोई नहीं बताता कि किन सपनों को पूरा करने के लिए उठाया जा रहा है। इतनी भी ईमानदारी रख लें यदि हम कि विवाह से पहले सामने वाले को बता दें कि 'देखो, इस-इस तरीक़े के मेरे अरमान हैं, और इसलिए मैं तुमको घर ला रहा हूँ'। पलक झपकते सामने वाला ग़ायब होगा। आप बस बता दीजिए कि आपके किस-किस तरीक़े के अरमान हैं। वो हम छुपा के रखते हैं, हमको पता होता है बता ही नहीं सकते, इतने ज़लील अरमान हैं कैसे बता दें!

वो अरमान सब हम खोलते हैं बाद में, धीरे-धीरे करके। और हम खोलते ही नहीं, हम पर भी खोले जाते हैं, क्योंकि सामने वाले व्यक्ति के भी वैसे ही बराबर के अरमान हैं। हम शादी के बीस-चालीस साल बाद भी जो हमारा साथी होता है उसको बिलकुल जानते नहीं, क्योंकि उसको जान गए तो मानना पड़ेगा कि यह व्यक्ति तो मेरे सपनों को कभी पूरा कर ही नहीं सकता था। क्योंकि कोई नहीं बना है किसी दूसरे के सपनों को पूरा करने के लिए, किसी की ज़िंदगी इस मक़्सद के लिए थोड़ी होती है।

तो कहने को हो सकता है कि विवाह चालीस साल का पुराना है। अस्सी-अस्सी साल के दंपत्ति होते हैं, एक-दूसरे को बिलकुल नहीं जानते। पड़ोसी जानता होगा, आप अपने पति को नहीं जानते होंगे। दुर्योधन को दुनिया पूरी जानती थी कि कौन है ये, धृतराष्ट्र के लिए वो सुयोधन ही रहा। अंत तक सुयोधन रहा—बड़ा अच्छा, छोटू बच्चा मेरा।

जिससे आपका बहुत निकट, देह का रिश्ता बन जाए उसको जानना असम्भव हो जाता है, क्योंकि उसको जानने से चोट लगती है। जो आपके बहुत क़रीब के लोग होते हैं न, आपने उस व्यक्ति से रिश्ता कभी बनाया नहीं होता न, उसकी एक छवि से रिश्ता बनाया होता है जिस छवि का सम्बन्ध आपके अरमानों से हो; और अरमान आए हैं फ़िल्मों से। समझ में आ रही है बात?

अभी भी शुरुआत करिए! वो व्यक्ति कौन है उसको तो जानिए। इसको (तौलिये को) जान जाइए, आप इससे मुक्त हो जाएँगे। बोध में ही मुक्ति है। लेकिन उसको जैसे-जैसे आप जानते जाएँगे, वैसे-वैसे आपको स्वीकार करना पड़ेगा कि जीवन बड़ी मूढ़ता में गुज़ारा है। आप कहेंगे, “यह मैंने किया क्या?” और फिर आपका जो क्रोध है, वो एक हद तक करुणा में भी बदलेगा। अभी आपके भीतर एक क्रोध भी है। करुणा फिर यह होगी कि मुझे ही नहीं धोखा हुआ, इस बेचारी को भी बराबर का धोखा हुआ है। मैं अपने अरमान पूरे करने के लिए इसको, ये अपने अरमान पूरे करने के लिए..। दोनों के ही पूरे नहीं हो सकते, किसी के नहीं पूरे हो सकते।

यह जो गठबॅंधन होते हैं यह होते ही बड़े गड़बड़ हैं। ताज़्जुब तो यह है कि कुछ दिनों तक भी चल कैसे जाते हैं! लोग कहते हैं, “अरे देखिए, बड़ा गड़बड़ ज़माना आ गया है, एक खतरनाक बात हो रही है। क्या? आजकल शादियों में क्लेश बहुत है। मैं सोचता हूँ, बोल दूँ कि ज़्यादा खतरनाक बात यह है कि जिनके यहाँ क्लेश नहीं हैं, यह तुमने कर कैसे लिया असंभव? क्योंकि यह हो ही नहीं सकता!

यह क्या है कृष्ण-सुदामा की दोस्ती है? क्या है यह? यह कृष्ण अर्जुन की संगति है? तुम एक व्यक्ति को अपने जीवन में लेकर आ रहे हो, मूलतः अपनी शारीरिक और सामाजिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए, यह रिश्ता कैसे चल सकता है? चल ही नहीं सकता! तुम एक विपरीत लिंगी को उठा लाए हो, कारण क्या है? सैक्स (काम क्रीड़ा) और सिक्योरिटी (सुरक्षा)। कैसे चल जाएगा यह रिश्ता? नियम है, नहीं चल सकता!

यह बात आप जितनी जल्दी-से-जल्दी समझ लें, उतनी जल्दी पत्नी को लेकर के जो आपको निराशा है या जो आक्रोश है, वो ठंडा पड़ जाएगा। क्योंकि धोखा आपको ही नहीं धोखा दोनों को हुआ है। और धोखा न आपने उनको दिया है, न उन्होंने आपको दिया है। धोखा आप दोनों को माया ने दिया है—जिसको मैं यहाँ फ़िल्मों के नाम से संबोधित कर रहा हूँ।

भारत में पौने तीन साल का होता नहीं है बच्चा, उसको ये बिलकुल समझ में आ जाता है कि ज़िंदगी सिर्फ़ एक लक्ष्य के लिए है— कोई लड़की पकड़ लो, कोई लड़का पकड़ लो। आप रेस्टोरेंट में खाना खाने जाएँ, वहाँ फ़िल्मी गीत बज रहा होता है। आप एयरपोर्ट पर जाएँ, वहाँ फ़िल्मी गीत बज रहा है। आप कुछ भी कर लें, मामला फ़िल्मी होता है। अभी चुनाव हुए थे पाँच राज्यों में, वहाँ पर जितने उम्मीदवार थे, वे अपना प्रचार भी फ़िल्मी गीतों पर कर रहे थे।

भारत में कुछ ऐसा है जो फ़िल्मी न हो? तो हमारी पूरी ज़िंदगी ही फ़िल्मी है और फ़िल्मों ने हमें बताया है कि तुम इसलिए जी रहे हो, ताकि तुम विपरीत लिंग का कोई पकड़ लो और उसके बाद अरमान पूरे करो। आप पैदा किसलिए हुए हो? शादी करने के लिए। आप क्यों पैदा हुए हो बताओ न? फ़िल्मों ने क्या सिखाया है तुम्हें?

मैं बार-बार फ़िल्मों की बात अनायास ही नहीं कर रहा, हमारे सपने वहीं से आ रहे हैं। आप गौर से देखिएगा, दुनिया में कोई देश उतना फ़िल्मी नहीं है जितना हिंदुस्तान। यह बात अब इतनी दूर तक जा चुकी है कि चुनाव कौन जीतेगा यह भी फ़िल्मों पर निर्भर कर रहा है। राजनेता और राजनीतिक दल कोशिश कर-कर के फ़िल्में बनवा रहे हैं, फिल्मों की फंडिंग कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि एक फ़िल्म अगर चल गयी, निशाने पर लग गयी, तो वो पूरे राष्ट्र का मूड (मनोदशा) बदल देगी—एक तरफ़ को भेज देगी पूरे राष्ट्र को। फ़िल्में निर्धारित कर रही हैं कि आपका अगला प्रधानमंत्री कौन होगा।

समझ में आ रही है बात?

तो सीधे-सीधे देख लीजिए कि दोनों को धोखा हो गया। जैसे दो लोग हों, दोनों को ही खूब नशा करा दिया गया हो और नशे में दोनों ने एक-दूसरे को पीट दिया। अब जब थोड़ा होश आने लगे, थोड़ी-थोड़ी उतर रही है अभी पूरी नहीं उतरी है—-जब थोड़ा होश आने लगे तो क्या करें, एक दूसरे को और पीटें? या अब होश आ रहा है तो यह समझें कि यह तो ऐसा नहीं कि हम तुम्हारे गुनहगार हैं और तुम हमारे। हम दोनों का ही गुनहगार वो है जिसने हम दोनों को ही नशा करा दिया- उसी को माया, उसी को अविद्या कहते हैं, उसी को प्रकृति कहते हैं।

उनको समझिए! उनको समझिए! उनको समझिए, उनका भी व्यवहार जिसके प्रति है बस उसी के प्रति है। आप वो व्यक्ति रहेंगे ही नहीं, जिसके साथ एक तरह का व्यवहार किया जा सके, तो उनका व्यवहार अपनेआप बदल जाएगा। बदल जाएगा कि नहीं बदल जाएगा?

टॉम एंड जेरी आता है तो उसमें कई बार रहता है कि वो जो बिल्ली है, वो बिल्ली जाती है तो दीवार के पीछे से उसे बस पूँछ दिख रही होती है। तो उसको लगता है चूहे की पूँछ है—पतली-सी कुछ कर रखी होती है—उसको लगता है चूहे की पूँछ है। तो वह ऐसे हथौड़ा उठाती है कि इसको तो पूँछ पर देकर मारूँ। और बस वो हथौड़ा मारने ही वाली होती है कि उसमें एक कुत्ता भी होता है बड़ा-सा, तभी वो कुत्ता निकल आता है। वो चूहे की पूँछ थी ही नहीं, वो कुत्ते का कुछ मामला था। वो कुत्ता निकल आता है तो वो भाग जाती है।

तो बिल्ली भी पीटने को तैयार है, किसको? चूहे को। बिल्ली को पता चल जाए कि अब चूहा, चूहा है ही नहीं, कुत्ता बन गया, तो बिल्ली आएगी पीटने? इतना तो टॉम एंड जेरी वाले भी जानते हैं। समझ रहे हैं बात को?

तो आत्म परिवर्तन के अलावा कोई तरीका नहीं। और आत्म परिवर्तन हिंसा की, बदला लेने की नीयत से नहीं होना चाहिए। मैं फिर आपको याद दिला रहा हूँ, धोखा दोनों को हुआ है। अगर वो यहाँ मौजूद होतीं, तो लगभग ऐसी ही कहानी कुछ उनकी होती या इससे कुछ बहुत अलग भी हो सकती थी, मैं जानता नहीं। पर उनकी भी कहानी में कहीं-न-कहीं यह भाव ज़रूर होता कि क़िस्मत ने दगा दिया है, ग़लत हुआ मेरे साथ। यही कहा जाता है, “तुम वो इंसान हो ही नहीं जो दस साल पहले थे"।

दस साल पहले तुमने इंसान से थोड़ी शादी की थी, हीरो से की थी। इंसान से कौन शादी करता है? किसी बंदे ने आज तक किसी बंदी से शादी करी है? कभी नहीं। इसीलिए तो इतना छुपा के रखा जाता है अपने परिचय को, अपने व्यक्तित्व को। सबकुछ खुल जाए, तो गठबॅंधन होगा ही नहीं।

मुझे नहीं मालूम कि मैंने जो कहा उससे आपकी कुछ मदद हो सकती है या नहीं। आमतौर पर मैं जो भी कहता हूँ, उससे किसी की कोई मदद नहीं होती। इस मुद्दे पर तो मैं किसी की मदद कर ही नहीं पाता। बड़ा गहन, गंभीर मुद्दा है यह, लेकिन फिर भी मैं कोशिश करता रहता हूँ क्या पता किसी की मदद हो जाए।

आपको पूछना होगा जब भी आपको कष्ट होता हो किसी भी घरेलू स्थिति में, “इन्होंने जो भी किया उससे मुझे कष्ट हुआ क्यों?” जैसे ही आप पकड़ेंगे उसको जिसको कष्ट हुआ, 'कि मेरे भीतर कौन बैठा है जिसे इनके व्यवहार से कष्ट होता है', जैसे ही आप उसको पकड़ेंगे जिसको कष्ट होता है, आप पाएँगे वो वही व्यक्ति है जो सर्वप्रथम विवाह करने को आतुर था। और उसको कष्ट ही इसी बात का है कि 'देखो, मैं इतने अरमानों से लेकर आया था और अब ये मुझे दुख देती है'।

आप वो व्यक्ति मत रहिए! आप बदल रहे हैं, आपका स्वागत है। आप और आगे बढ़ते रहिए! बदलने से मेरा अर्थ बेवफ़ाई नहीं है। मेरा आशय ऊँचाई के संदर्भ में है। बदलाव अध्यात्म में बेवफ़ाई नहीं ऊँचाई लेकर आता है। तो यह नहीं कह रहे कि 'आप ये थे आप ये हो जाइए'। हम यह नहीं कह रहे, "आप एक ही तल पर इधर से उधर हो जाइए"। हम कह रहे हैं, “आप ऊँचे उठ जाइए”, इसको बदलाव कहते हैं अध्यात्म में। तो संदर्भ ऊँचाई का है, आरोह का है।

देखिए, मैं ख़ुद संतुष्ट नहीं हो पा रहा हूँ मैंने जो बोला है अभी। मैं कैसे समझूँ कि….। मुझे तो एक बात पता है नियम है, नियम— जितने मज़े मारोगे उतनी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। और चूँकि हम देहाभिमानी लोग हैं, तो सबसे ज़्यादा हमने जो जीवन में सुख लिया होता है वो देह का ही लिया होता है। अब जिस व्यक्ति से आपने देह का इतना सुख लिया है, उससे उसी अनुपात में अब दुख तो मिलेगा न! अब वो नियम है द्वैत का, कार्य-कारण का नियम है—कर्मफल मिलेगा। मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ, मैं उस नियम को तो नहीं तोड़ सकता। हाँ, आप यह ज़रूर कर सकते हैं कि आगे अपने लिए और कर्मफल न तैयार करें।

मैं पूछा करता हूँ लोगों से, मैं कहता हूँ, “अब तुमको तकलीफ़ हो रही है अपने पति से, पत्नी से, प्रेमी, प्रेमिका, किसी से, अब मेरे पास आ रहे हो। जब उसके साथ मज़े लूट रहे थे तब मैं याद आया था?” तब तो धोखे से भी अगर कोई मेरा नाम ले ले या कहीं से वीडियो चल रहा हो, आवाज़ पड़ जाए तो और जान बचा कर भागते होगे कि मूड ख़राब कर देगा। जिस हिसाब से तुमने मज़े लूटे हैं अब उसी हिसाब से क़ीमत भी चुकाओ न!

लेकिन जो सुख पाया उसकी कोई चर्चा करने नहीं आता। मैं चाहता भी नहीं तुम करो, मन बहुत ख़राब हो जाएगा। (श्रोतागण हँसते हैं) लेकिन फिर जब दाम देने पड़ते हैं तब लगता है, “हाय! यह क्या हो रहा हमारे साथ, यह क्या हो रहा है, यह तो अन्याय हो गया, अन्याय हो गया।”

अन्याय क्या हो गया, तुम्हें क्या लगा था तुम बहुत बड़े गुणी हो, ज्ञानी हो, पुण्यात्मा हो कि तुमको अस्तित्व इतना सुख दे रहा है? वो तुमको सुख नहीं दे रहा था, वो तुमको कर्ज़ दे रहा था, और अब वो उसको सूद समेत…। और तुम कह रहे हो, "इतना ब्याज़ लग गया। अरे! यह क्या हो गया, यह क्या हो गया"? वो तुमको लोन (ऋण) दिया जा रहा है। वो सब जिसको हम बोलते हैं न नॉर्मल मैरिटल प्लेजर्स, दाम्पत्य जीवन के साधारण सुख—संभोग का सुख, गर्भ का सुख, नया-नया बच्चा छोटू पैदा हुआ है उसको खेलने का, इतराने का सुख—वो सब आपको किसी ने सुख दे नहीं दिया है, वो आपको एक रक़म है जो कर्ज़ पर दी गई है और आप उसका भोग कर सकते हैं।

ठीक वैसे जैसे बहुत लोग बैंकों से कर्ज़ उठा करके मज़े लूट लेते हैं। दो साल, पाँच साल मज़े लूट लिए फिर क्या होता है? फिर बैंक वाले खड़े हो जाते हैं कि इतना ब्याज बन गया है, अब ज़रा लौटाओ। तब लगता है, “यह क्या हो गया, यह क्यों हो रहा है?”

जब सुख का क्षण सामने आए, तो इतना अगर आप कर सकते हों तो कर लीजिएगा! अपनेआप को साफ़ बता दीजिएगा कि 'जितना भी सुख लूट रहा हूँ, इससे थोड़ा ज़्यादा ही दुख भोगना पड़ेगा इस सुख के एवज़ में'।

स्कॉट एमपेक हैं ‘द रोड लेस् ट्रेवल्ड’ के ऑथर (लेखक)। तो वो बड़े पहुँचे हुए मनोचिकित्सक रहे हैं। और वो कहते हैं कि दुनिया में मानसिक रोगों का सबसे बड़ा कारण विवाह है। मनोरोग का विवाह से बड़ा कारण दुनिया में नहीं है। और जब तक विवाह की संस्था वैसी ही रहेगी जैसी है, तब तक हर आदमी मानसिक रूप से बीमार रहेगा। पर जब सब नया-नया होता है उस वक़्त तो मज़े आते हैं। उस वक़्त समझ में ही नहीं आता कि यह जो कर रहे हो अभी इसका कितना बड़ा दाम चुकाना है आगे।

अभी यही कर सकते हो कि वो इंसान मत रहो जिसने भूल करी थी। ठीक है! कर्मफल उसी को भुगतना पड़ता है जिसने कर्म करा था। तुम वो व्यक्ति रहो ही मत जिसने कर्म करा था — सिर्फ़ इसी तरीके से बच सकते हो। नहीं तो इतना बड़ा पहाड़ खड़ा कर दिया है कर्म का, उसका फल तो अब आएगा न सिर पर टूटने!

और सुख को लेकर के सबको सावधान कह रहा हूँ—बहुत सतर्क रहो। हमको प्रकृति मुफ़्त सुख लूटने के लिए नहीं पैदा करती। हम इतने बड़े कोई ज्ञानी, गुणी, तपस्वी नहीं हैं। न अपनेआप को यह समझा लीजिएगा कि हमने पिछले जन्म में बहुत पुण्य किए थे, इसलिए इस जन्म में हमें मुफ़्त के सुख लूटने को मिल रहे हैं। ठीक तब जब आपको थोड़ा-सा सुख दिया जा रहा होता है, माया मुस्करा रही होती है कि ले ले बेटा, थोड़ा-सा सुख ले ले। अब इसी सुख के कारण तुझे दूना दुख दूँगी। तो सुख से सावधान! बहुत सावधान!

मैं आपको कठिनाई की ओर ही भेज रहा हूँ, लेकिन कोई चारा नहीं है। यही एक रास्ता है और कुछ भी नहीं।

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