प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, शत-शत नमन। मेरे अब तक के जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य रहा है आपका विवेक और आपका मार्गदर्शन पाना। मैं अमेरिका में एक बैंक में आईटी में काम करता हूँ और आपको कुछ तीन साल से सुन रहा हूँ। बड़ी मेहनत के बाद इस बार आ पाया हूँ कोरोना और उसके बावजूद।
मैंने आपको सुनने के पहले जीवन में कुछ ऐसी ग़लतियाँ की हैं जिनके खिलाफ़ आपने बहुत सावधान किया है और जीवन में बहुत ज़्यादा दुख झेला है। और उनमें से एक है ग़लत संगत, ग़लत विवाह जो मैंने दो हज़ार पाँच में किया था। जीवन में—-बिलकुल जैसा आप कहते हैं—-बेहोशी में एक संतान भी हुई मेरी और मैं अपनी बेटी को अब आत्मनिर्भर बनाने का पाठ सिखाता हूँ। ग़लत संगत की वजह से और ग़लत विवाह की वजह से जीवन में बहुत दुख है। घर में मेरा पत्नी के साथ क्लेश भी रहता है ।
काश! यह निर्णय लेने से पहले मैंने आपको जीवन में सुना होता तो शायद मैंने इतना दुख नहीं झेला होता। लेकिन अब यह ग़लती तो हो ही गयी। मैं बहुत पछताता हूँ, लेकिन अब इन दुखों और इन बंधनों से आज़ाद होने का कोई साफ़-साफ़ रास्ता मैं सोच नहीं पा रहा हूँ। तो मैं अब इस जीवन में मुक्त होना चाहता हूँ। जीवन मुक्त होना चाहता हूँ। तो यह जानना चाहता हूँ कि अब मैं क्या करूँ, जिससे मैं अपने जीवन के दुख और बॅंधनों से छूट सकूँ और अब आज़ाद हो सकूँ? इसलिए आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: देखिए, हम कहते हैं, वेदांत समझाता है कि बंधन को अगर त्यागना है तो उसको समझना पड़ेगा। सारा ज़ोर समझने पर होता है न। आप वास्तव में बंधन से नहीं लड़ रहे होते, बंधन को लेकर आपकी जो नासमझी है, आप उससे लड़ रहे होते हैं। जो अपने बंधन को समझ गया, वो उससे आज़ाद हो जाता है।
आपकी संगति में, आपके परिवार में, यदि कोई है जो आपको बंधन जैसे लगते हैं, तो सबसे पहले तो यह मानना पड़ेगा कि आप उन्हें समझते नहीं हैं। क्योंकि यह नियम है कि जो अपने बंधन को समझ गया उसका बंधन अब बेअसर हो जाता है। बंधन आपको पकड़ के नहीं रख सकता अगर आपने उसको एकदम जान लिया कि यह चीज़ क्या है। यह प्रकृति का कौनसा उपकरण है और किस तरह से गति करता है, अगर आपने समझ लिया तो आप उससे मुक्त हो जाते हो।




