शरीर दाँव लगाकर नहीं लड़ सकते, तो अध्यात्म तुम्हारे लिए नहीं || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, रेफ़्रिजरेटर (प्रशीतक) पर आपका एक कोट (उद्धरण) मैंने लिखा हुआ देखा है। इफ़ यू कैन नॉट फाइट ऑन स्ट्रीट्स, देन स्प्रिचुअलिटी इस नॉट फॉर यू (अगर आप सड़क पर नहीं लड़ सकते, तो अध्यात्म आपके लिए नहीं है) क्या इसका मतलब डर है? वैसे इससे पहले आपने बड़े प्रोस्पेक्टिव (भावी) में जवाब दे दिया है, लेकिन अगर हम इंडिविजुएली (व्यक्तिगत रूप से) चलें, तो क्या यह डर है?
आचार्य प्रशांत: डर तो है। अब पूछिए किसका डर है। यह देह का डर है। आख़िरी डर जो है, वो देह का ही होता है। आप जो कुछ भी कर रहे होते हैं, कर आप देह के लिए ही रहे हैं, क्योंकि प्रकृति का और किसी चीज़ से कोई मतलब ही नहीं हैं। उसका मतलब बस इतने से है कि आपका डीएनए (गुणसूत्र) बचा रहे और इसका प्रचार-प्रसार होता रहे।
हम कहते हैं, “हम पैसा कमा रहे हैं, हम बहुत बड़ा घर बनाएँगे।” आप जानते है, प्रकृति की और डीएनए की भाषा में बड़े घर का क्या अर्थ होता है? क्या? देह को ज़्यादा सुरक्षा मिलेगी। तो आप जीवन भर काम इसलिए कर रहे हैं, ताकि आपका डीएनए बचा रहे। प्रकृति आपसे बहुत बड़ा काम कर रही है, करवा रही है।
आप किसी कटिंग ऐज टैक्नोलॉजी फर्म (अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी संस्थान) में काम कर रहे हैं। कितना बड़ा काम, कितना बड़ा काम! पर वो सब हो किसलिए रहा है? अंततः वो इसलिए हो रहा है, ताकि देह का प्रसार होता रहे। (अपने एक हाथ से दूसरे हाथ को छूकर बताते हुए) भैया, आप उस बड़े-से-बड़े काम को करके क्या पाएँगे? पैसा। उस पैसे से आप क्या करेंगे? देह की देखभाल।
आपको ज़िन्दगी में जितनी भी चीज़ें प्रिय हैं, अगर आप उनकी गहराई में जाएँगे, तो पाएँगे कि इसीलिए प्रिय हैं, क्योंकि वो किसी-न-किसी तरीक़े से देह को या तो सुरक्षा देती हैं या देह के प्रसार में सहायक बनती हैं। बताइए आपको क्या प्रिय है? जलेबी प्रिय है? जलेबी देह के लिए बहुत ज़रूरी है। पूछिए क्यों? क्योंकि प्रकृति को याद है कि अतीत में ऐसा खूब हुआ था कि आपको खाने के लाले पड़े थे।



