संसारी के लिए संसार, आत्मस्थ के लिए आत्मा || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा सवाल गीता के दूसरे अध्याय से है। उसमें सत्रहवें श्लोक में श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि आत्मा से संसार संचालित होता है, अर्जुन को समझाते हैं।
आचार्य: कौनसा श्लोक कह रहे हैं? रुकिए, खोलने दीजिए।
प्र: सत्रहवाँ श्लोक है दूसरे अध्याय का।
आचार्य: ठीक है। ‘संचालित’ नहीं कहा है, ‘व्याप्त’ कहा है।
प्र: व्याप्त, ‘आत्मा से संसार व्याप्त है।‘ तो लेकिन जैसे कल भी हम बात कर रहे थे कि सारा खेल प्रकृति का और माया का है। तो माया संसार को चलाती है या फिर आत्मा से संसार चलता है, इसमें...
आचार्य: ‘मम् माया।’ माया किसकी है? दो सत्य थोड़े ही होते हैं! सारा संसार माया का है, और माया किसकी है, मायापति कौन है?
प्र: श्री कृष्ण।
आचार्य: तो माया संसार को चला रही है, इसी बात को शास्त्रीय तौर पर ऐसे भी कहा जा सकता है कि आत्मा संसार को चला रही है। पर वो बात पूरी तरह सही नहीं होगी, पूछो क्यों? क्योंकि संसार चल भी रहा है ये बात माया को ही प्रतीत होती है। आत्मा अचर है, और आत्मा अकर्ता है; तो आत्मा न चलती है, न चलाती है। आत्मा अचर है, माने आत्मा चलती नहीं, और आत्मा अकर्ता है, माने आत्मा कुछ चलाती नहीं; तो संसार को कहाँ से चला देगी! ये भ्रम कि आत्मा के अतिरिक्त भी कुछ है जिसका नाम संसार है, इसी को तो माया कहते हैं।



