आचार्य प्रशांत: सवाल ये है कि किसी से सम्बन्धित हैं। किसी से जुड़े हुए हैं और जिससे जुड़े हुए हैं उससे अब किसी प्रकार की अड़चन आ रही है। अड़चन का प्रकार कुछ भी हो सकता है, इधर कुछ है, उधर कुछ हो सकता है, उधर कुछ हो सकता है। लेकिन घूम फिर कर के सवाल बस एक है रिश्ता जब उलझा हुआ हो तो करें क्या।
रिश्ता अगर उलझा हुआ पता चल रहा है तो बहुत सुंदर मौका है और साथ-ही-साथ कठिन चुनौती है — जैसे इसको देखना चाहें। साफ़ दिखाई दे जाता है इतना कि दूसरे में बदलाव की ज़रूरत है। और जब भी इस तरह के सवाल मेरे पास आते हैं, वो शुरू इसी से होते हैं कि हम दूसरे को लेकर के दुखी हैं। साफ़-साफ़ कहते हैं कि दूसरे में बदलाव चाहिए।
एक चीज़ जो हम अक्सर नहीं देख पाते हैं वो यह है कि दूसरा एक नहीं है। दूसरे के भी हज़ार चेहरे हैं, दूसरे की भी हज़ार सम्भावनाएँ है। दूसरा भी कई-कई तलों पर जीता है, होता है। आपको वो अपना कौनसा चेहरा दिखाता है वो इस पर निर्भर करता है कि आपका चेहरा कैसा है। दूसरे का अगर आपने बेरुख़ी से भरा चेहरा ही देखा है, तनाव से, उपेक्षा से भरा चेहरा ही देखा है, चिड़चिड़ाहट से भरा चेहरा ही देखा है, तो उसका सम्बन्ध कहीं-न-कहीं हमारे भी अपने पसंदीदा चेहरे से है जो हम दूसरों को दिखाते फिरते हैं।
हमें अक्सर दूसरे के व्यवहार से आपत्ति होती है। जब दूसरे के व्यवहार से आपत्ति हो तो दो बातें कह रहा हूँ, ध्यान से सुन लीजिएगा। पहली बात, दूसरे का व्यवहार बदलने की चेष्टा मत करो, दूसरे का मन ही बदलने का ध्येय रखो — यह पहली बात। दूसरी बात, दूसरे को तुम बदल नहीं सकते जब तक तुम ख़ुद न बदलो।
अक्सर दूसरा कैसी भी वृत्तियाँ पाले हुए हो हम उसके साथ गुज़ारा कर लेंगे, तब तक जब तक उसका हमारे प्रति व्यवहार किसी तरीके से काबिल-ए-बर्दाश्त रहे। हम इस गहराई में जाकर देखेंगे ही नहीं कि उसका व्यवहार उठ कहाँ से रहा है। हमें तकलीफ़ होनी शुरू तब होती है जब दूसरे का व्यवहार हमें चुभने लगता है। जब हमें, हमारी अहंता को आहत करने लगता है। तो ध्येय भी हम फिर छोटा सा ही बनाते हैं कि मेरे साथ सुलूक ठीक किया करो — इतना ही हमारा ध्येय होता है — मेरे साथ ठीक से बोला करो, मेरे साथ ठीक से चला करो, अड़ा मत करो, विरोध न किया करो इत्यादि।




