प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। अभी आपने कहा कि महिला और पुरुष दोनों समान जानवर होते हैं, पर अकसर यह देखा गया है कि जो अधिकतर लड़ाईयाँ हैं वो पुरुष वर्ग शुरू करते हैं। हम इतिहास में देखें, समाज में भी देखें, तो बहुत सारी लड़ाईयाँ अधिकतर पुरुषों के द्वारा शुरु की जाती हैं और उनमें महिलाएँ पिसती हैं। तो हम इससे क्या निष्कर्ष निकालें?
आचार्य प्रशांत: देखिए पुरुष की हिंसा, पुरुष की बेहोशी, पुरुष की पशुता, बड़ी प्रकट रहती है, अभिव्यक्त, ऑब्वियस (ज़ाहिर)। तो दिख जाता है कि पुरुष डंडा लेकर, गदा लेकर या बंदूक लेकर, या मिसाइल लेकर लड़ने निकल पड़ा – वहाँ बात छुपती नहीं है, वो बड़ा ज़बरदस्त जानवर है। वो जब लड़ाई करता है तो खुलासा हो जाता है बिलकुल, कि ये देखो हाथी नशे में है और रौंदता हुआ बढ़ रहा है।
महिला प्राकृतिक रूप से ज़रा अलग है। हिंसा वो भी बराबर की करती है, दोनों जानवर हैं। मुझे क्षमा करिएगा अगर आप मुझसे ये सुनना चाह रही हों कि, ‘नहीं, आदमी ज़्यादा बड़ा जानवर है, वो छोटी जानवर है’। नहीं, दोनों बराबर के जानवर हैं और ये प्राकृतिक नियम है। बस ये है कि महिला जो हिंसा करती है वो ज़रा सूक्ष्म होती है, वो पता नहीं चलती। और दोनों अपने–अपने स्वार्थ अनुसार हिंसा करते हैं।
पुरुष के पास ये है (बाज़ू दिखाते हुए), तो वो इससे हिंसा करता है। महिला के पास ये है नहीं, तो वो क्यों निकलेगी गदा लेकर? वो उस माध्यम से हिंसा करती है जो माध्यम उसको मिला हुआ है। पुरुष को बाहुबल, देह-बल मिला हुआ है तो वो वहाँ से हिंसा करता है; स्त्री को स्त्री-सुलभ भावनाएँ मिली हुईं हैं, युक्तियाँ मिली हुईं हैं, तरकीबें मिली हुईं हैं, तो वो उन तरकीबों के माध्यम से हिंसा करती है। इसका मतलब साफ़ है – स्त्री भी बराबर की ही हिंसक है।
देखना हो तो कभी जाकर देखिए सास-बहुओं की जो लड़ाईयाँ होती हैं – पुरुष घबरा जाएँ उस हिंसा को देख करके। और जब दहेज-वगैरह के लिए लड़कियाँ जलाई जाती हैं, उसमें क्या सासें बराबर की ज़िम्मेदार नहीं होती हैं? कई बार केरोसीन सास ने ही छिड़का होता है। कौन कह रहा है स्त्रियाँ बिलकुल एक जैसी हिंसक नहीं होतीं?




