प्रेम चाहिए - ऐसा जो कभी तृप्त न हो || आचार्य प्रशांत, दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, हम बहुत ऐसे व्यक्तियों को सुनते हैं जो हमें सच ज्ञान की बात बताते हैं, परन्तु फिर भी एक जो आन्तरिक क्रांति है जिसकी आप बात करते हैं कि एक आन्तरिक क्रांति ज़रूरी है बदलाव के लिए, वास्तविक बदलाव के लिए, वो चाहकर भी नहीं हो पाती।
जिस प्रकार से दुर्योधन भी द्वापर युग में गुरुकुल गया, उसने भी वेदों का अध्ययन किया, शास्त्रों का अध्ययन किया, गुरुओं की संगति में रहा, फिर भी वो दुर्योधन ही बना, हम सब उसकी निन्दा करते हैं। उसी जगह पर युधिष्ठिर भी गये पर उनका चरित्र आज हम देखते हैं।
तो ऐसी कौनसी चीज़ है जो उस आन्तरिक क्रांति लाने के लिए ज़रूरी होती है? हममें से क्यों ऐसा कोई नहीं है जो आचार्य जी जैसा, आपके जैसा सोच पाता हो?
आचार्य प्रशांत: प्रेम चाहिए। प्रेम एक गहरी असन्तुष्टि होता है। प्रेम कभी सन्तुष्ट हो पाता है? क्योंकि उसमें पूर्ण प्राप्ति तो होती नहीं। एक असन्तुष्टि चाहिए होती है। सब में चाहिए, ख़ासकर युवा लोगों में तो चाहिए ही चाहिए कि जल्दी से तर कर न बैठ जाओ।
एक बच्चा है, वो देखता है कि कोई साइकिल चलाता हुआ जा रहा है। और कोई साइकिल चलाता हुआ जा रहा है, ये एक छोटे बच्चे के लिए बड़ी अद्भुत बात हो सकती है, हो सकती है न? एक साइकिल ही है पर बच्चे के लिए अद्भुत बात हो सकती है। अब एक बच्चा है जो इसी बात से सन्तुष्ट हो गया कि उसने किसी को देख लिया साइकिल चलाते हुए। क्या ये स्वयं कभी साइकिल चला पाएगा? जो बच्चा दूसरे को साइकिल चलाते देख करके सन्तुष्ट हो गया, क्या वो ख़ुद कभी साइकिल चला पाएगा?
और आप किसी को साइकिल चलाते देखें, इसके आप पर दो तरह के प्रभाव हो सकते हैं। एक, आप कह दें, ‘मैंने देख लिया किसी को साइकिल चलाते हुए, अद्भुत आनंद आया, मज़ा आ गया। क्या चला रहा था! एक पाँव इधर, एक पाँव उधर!’ या कि कई लोग कैंची चलाते हैं न, वो देख करके और गज़ब!



