हमारा होश छीन नहीं लिया जाता, हम बेहोशी को चुनते हैं || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: प्रकृति के हर कण की उसी अनंत की यात्रा है, कोई धीरे चल रहा है, कोई तेज़ चल रहा है। जो नदी के बीच है वो सबसे तेज़ चल रहा है। हर कोई अपनी सामर्थ्य अनुसार धारा को चुनकर बह रहा है। ज़िन्दा हो तो चलना हो ही रहा है, यात्रा हो रही है।
बड़ी मेहनत करके बीच धारा में आता हूँ परन्तु कुछ देर यात्रा करने के बाद फेंक दिया जाता हूँ। उस वक़्त बड़ा अनाथ अनुभव करता हूँ, जैसे परमात्मा ने अपनी गोद से बाहर फेंक दिया है। ‘ओऽम्’ का उच्चारण करके या भक्तिपूर्ण कविता पढ़कर, सुनकर, लिखकर पुनः उसकी धारा में आता हूँ परन्तु पुनः बाहर फेंक दिया जाता हूँ। जब तक ध्यान परमात्मा की तरफ़ होता है तो बीच धारा में बहता महसूस करता हूँ। जैसे ही ध्यान सांसारिक कर्म की ओर जाता है, सांसारिक चमक-दमक की ओर जाता है, पुनः बाहर फेंक दिया जाता हूँ। जैसे पहाड़ से गिरने जैसा लगता है। ख़ुद को नारकीय स्थिति में पाता हूँ।
तो मेरा सवाल है कि संसार में रहते हुए ध्यान सिर्फ़ उसी की ओर कैसे रहे और संसार की कोई माया अपनी ओर न खींचे? यदि माया और दमित वृत्तियों से किसी तरह बच भी जाऊँ, तो शारीरिक ज़रूरत भूख-प्यास से कैसे बचूँ? परमात्मा से तो ध्यान हट ही जाता है। शरीर ही बाधा बन रहा है। यात्रा कैसे करूँ? परमात्मा का रस प्यारा लगता है। परन्तु किसी पल कौतूहल वश, ऊब के कारण सांसारिक वृत्तियों में रस लेते ही परमात्मा से कब अलग हो जाता हूँ पता ही नहीं चलता। अंततः ख़ुद को नदी किनारे किसी गड्ढे में पाता हूँ।
यह मेरी दशा है, आचार्य जी। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: एक सूची बनाइए, किन-किन मौकों पर आप धारा से बाहर फेंक दिये जाते हैं। लम्बी सूची बनाइए। जितनी बार दिखाई दे कि धारा से बाहर फेंके गये, सूची बनाइए। क्या हुआ था? किस चीज़ ने आपको बाहर खींच लिया? सूची बीस, चालीस, पचास, साठ विषयों तक जाए। और फिर ज़रा उस सूची का निरीक्षण करिए। उनमें जिन विषयों की बहुलता पाइए उनको अलग से लिखिये। अंततः कुछ तीन-पाँच-सात ऐसे विषय पाएँगे आप जिनके प्रभाव में आप ध्यान और शान्ति की धारा से विलग हो जाते हैं।



