प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जिन कामों में बँधे हुए हैं, उनसे कैसे छूटें? छोड़ने में भी डर लगता है।
आचार्य प्रशांत: छूटने का डर है या छूटने के बाद जो परिणाम होंगे उनका डर है?
तो तुम जिसको छोड़ रहे हो उसके छूटने का डर नहीं है, उसके छूटने के कारण तुम्हारा जो और कुछ छूटेगा, उसका डर है। ऐसी सी बात है कि दो बच्चे खेल रहे हैं बैडमिंटन पर रैकेट और शटल दोनों एक बच्चे की है। जिसकी है वो हैं बेईमान। पर तुम उसे छोड़ नहीं सकते क्योंकि वो छूटा तो रैकेट और शटल भी छूटेगा। फिर जिसको छोड़ रहे हो उसको छोड़ने का डर है या छोड़ने के अंजामों का डर है? किसका डर है?
श्रोता: छोड़ने के अंजामों का।
आचार्य: हो गया न! गेट योर ओन रैकेट, बेबी। कोई और डर की बात नहीं है। पढ़े-लिखे हो, जवान हो, कोई तुम्हारा क्या लेकर चला जाएगा? कुछ भी करके रोज़ी-रोटी कमा लोगे। खुला देश है, खुली अर्थव्यवस्था है, क्या डर रहे हो? और इतने अमीर लगते नहीं कि तुम्हारे पास हेलीकॉप्टर है तो कोई और तुम्हारा हेलीकॉप्टर छीन ले जाएगा। जितना तुमको चाहिए अपने निर्वाह के लिए उतना तो तुम्हें हासिल हो ही जाएगा। किस बात से डर रहे हो?
दो ही तरह की होती हैं निर्भरताएँ — भौतिक और मानसिक। मटेरियल और साइकोलॉजिकल। मटेरियल का तो कोई आधार है ही नहीं, अब मानसिक बता दो, मानसिक रूप से क्या है?




