प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शत-शत नमन। मैं अष्टावक्र गीता भाष्य में आपसे जुड़ा हुआ हूँ। श्री अष्टावक्र जी, अध्याय दो के श्लोक नंबर सोलह में कहते हैं कि द्वैत ही दुख का मूल है और अद्वैत ज्ञान के अलावा इसका कोई इलाज नहीं है।
"द्वैत ही दुख का मूल है," ऐसा क्यों कहा गया है? इस पर थोड़ी स्पष्टता दीजिए।
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम् ।। दृश्यमेतन्मृषा सर्वं एकोऽहं चिद्रसोऽमलः ।।२.१६।।
द्वैत ही दुख का मूल है और सिवाय अद्वैत ज्ञान के उसकी कोई दवा नहीं है। पूरा दृश्यमान जगत मिथ्या है, और मैं एक चिदानन्दस्वरूप और निर्मल ही यह हूँ।
~ अष्टावक्र गीता, प्रकरण २, श्लोक १६
आचार्य प्रशांत: द्वैत क्या है! कई तरीक़े से द्वैत की व्याख्या करी गयी है, परिभाषित किया गया है। लेकिन अगर हमारा मन द्वैत में जी रहा है, तो उसका अर्थ क्या है। और मन के लिए द्वैत के अर्थ और अंज़ाम क्या होते हैं, हम उसी पर ज़्यादा ध्यान देंगे अभी।
अगर हम समझना चाहते हैं कि — जैसा आपने कहा कि द्वैत दुख का मूल है, ऋषि अष्टावक्र को उद्धृत करते हुए। तो दुख तो मन के लिए होता है न। मन दुख का अनुभव करता है। तो मन के लिए द्वैत क्या होता है, ये हम समझना चाहेंगे।




