निष्कामकर्मयोग ही यज्ञ है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:| यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव: ।।१४।।
अन्न से समस्त भूत (जीव-प्राणि) उत्पन्न होते हैं और मेघों से अन्न उत्पन्न होता है, यज्ञ से मेघ होता है और यज्ञ कर्म से होता है।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, तीसरा अध्याय, कर्मयोग, श्लोक १४
आचार्य प्रशांत: बहुत श्लोक ऐसे हैं वेदान्त साहित्य में – सब उपनिषदों में, और भगवद्गीता में भी – जिनमें अगर गहरे गोता न मारा जाए, जिनको अगर बहुत ही ध्यान और वेदान्तयुक्त दृष्टि से न पढ़ा जाए तो उनके अर्थ का अनर्थ हो जाएगा।
श्लोक सतह पर सरल लगेगा, उसका भाव और अर्थ बिलकुल सहज लगेगा और पाठक, साधक आसानी से इस भ्रम में आ जाएगा कि उसने अर्थ को ग्रहण कर लिया है, कि उसने श्लोक के मर्म को पकड़ लिया है। क्योंकि बात ऊपरी तौर पर प्रकटतयः लगेगी ही इतनी आसान; कोई कारण नहीं दिखेगा, कोई संदेह नहीं उठेगा कि श्लोक में और गहरे प्रवेश करने की आवश्यकता है।
प्रस्तुत श्लोक उन्हीं श्लोकों में से एक है।
क्या बात हो रही है? हम निष्कामकर्म योग की बात कर रहे हैं। और निष्कामकर्मयोग के लिए ही दूसरे अध्याय में और फिर वर्तमान अध्याय में श्रीकृष्ण एक प्रतीक देते हैं, एक उपमा खड़ी करते हैं। किसकी? यज्ञ की। निष्कामकर्मयोग को ही जैसे वो एक दूसरे नाम से पुकारने लग जाते हैं। ये बात हमने पिछले श्लोकों में देख ली है। निष्कामकर्मयोग को ही कहने लग जाते हैं ‘यज्ञ’।



