निष्कामकर्म बिना आत्मज्ञान के संभव नहीं || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पिछले तीन वर्षों से आपको सुन रहा हूँ, और श्रीमद्भगवद्गीता के विषय पर भी काफ़ी सुना है। काफ़ी स्पष्टता मिली है। भगवान! अब जैसे आपकी सीखों में एक बात मैंने एकदम लगातार देखी है तीन वर्षों से। आप ये कहते हैं कि जो चल रहा है तुम्हारे जीवन में, तुम जो कर रहे हो उसको देखो। तुम्हारा ज्ञान कुछ काम नहीं आना। ज्ञान तभी काम आएगा जब तुम अपने जीवन में उसे उतार लोगे। भगवान ने गीता में एक जगह पर कहा है:
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ।।३.३७।।
जैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है, वैसे ही, हे अर्जुन! ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३७
तो मैं ये जानना चाहता हूँ कि ज्ञान कैसे काम नहीं आएगा? क्योंकि ज्ञान तो हर जगह काम आ ही रहा है, मैं ये भी देखता हुआ चल रहा हूँ।
दूसरी एक और बात मैं क्षमा के साथ पूछना चाहूँगा आपसे, कि जैसे वेदान्त अपना इष्ट ग्रंथ भी है और उपनिषदों का जो मूल सिद्धांत है, वो तो ब्रह्मवाद ही है। शंकराचार्य जी में और भगवान बुद्ध में जो मतभेद था – भगवान बुद्ध ने किसी अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया, लेकिन शंकराचार्य जी ने कहा कि बौद्ध जिस शून्यता में चले जाते हैं, उस शून्य को जानने वाला मौजूद है कोई।



