प्रश्नकर्ता: शरीर और संसार की नश्वरता को जानने के बाद भी मन सांसारिक मूल्यों में, सांसारिक सुखों में क्यों लिप्त रहता है? क्या कुछ ऐसा है जिसे आत्मा जान ले? कोई ऐसा अनुभव है जो आत्मा को हो सके जिससे वो सांसारिकता से अलिप्त हो जाए?
आचार्य प्रशांत: जिसे तुम नश्वरता कह रहे हो, जिसे तुम नैश्वर्य कह रहे हो, वही ऐश्वर्य है। ऐश्वर्य मतलब समझते हो? ऐश्वर्य मतलब भरापन। ईश्वर से सम्बन्ध है ऐश्वर्य का। जिसे तुम संसार कह रहे हो, सत्य उसके अलावा कुछ नहीं है।
समझना पड़ेगा इस बात को।
एक तथ्य है कि शरीर को चले जाना है कि जीवन मरणधर्मा है कि शरीर-संसार इनमें कुछ भी शाश्वत नहीं है। ये तथ्य है। इससे निष्कर्ष क्या निकाल लिया तुमने? इससे निष्कर्ष ये निकाल लिया कि संसार का बहिष्कार करो, इससे निष्कर्ष ये निकाल लिया कि शरीर त्याज्य है।
लिप्तता से तकलीफ़ है तुमको। लिप्तता समझते हो न? आसक्ति। अपने ऊपर कुछ लेपित कर लेना। अपने ऊपर लेप का आवरण चढ़ा लेना यही लिप्तता है। क्यों चढ़ा लेता है अपने ऊपर कोई आवरण? क्यों लिप्त हो जाता है? क्यों और की माँग करता है? क्यों कहता है कि जो है वो काफ़ी नहीं? आसक्ति का अर्थ ही यही है कि ‘इतना सा हूँ मैं किसी और चीज़ से जुड़ जाऊँ। एक गठबंधन हो जाये।’ क्यों कहता है मन कि ‘कुछ और मिल जाये, कहीं लिप्त हो जाऊँ, कहीं आसक्त हो जाऊँ, कुछ आवरण चढ़ा लूँ अपने ऊपर?’ क्यों ऐसी इच्छा करता है?
वो ऐसी इच्छा करता ही इसीलिए है क्योंकि डरा हुआ है, सहमा है कि मिट जाएगा। जिसको वो अपने ऊपर लेप की तरह चढ़ा रहा है, ये कपड़े भी लेप हैं न। जो कुछ भी वो अपने ऊपर धारण कर रहा है, वो कर ही इसीलिए रहा है क्योंकि अपना होना उसे नाकाफ़ी लगता है, अपने होने में उसे सुरक्षा भी नहीं दिखती। कहता है जितना हूँ उतना तो मिट जायेगा, कुछ और पकड़ लूँ जो मिटे न। उससे जुड़ जाऊँ जो मिटने से सुरक्षा दे सके मुझे। जो मेरी नश्वरता से मुक्ति दिला सके मुझे।




