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ममता नहीं, महत्ता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: भगवान श्री नमन। जो अभी चर्चा हो रही थी, कि ‘निर्मम’, ‘निराशी’, और ‘युध्यस्व’, ‘विगतज्वर’, तो जो वर्तमान अध्यात्म में चला था कि विषय भी हैं और हम अंदर से बदल जाएँगे, इसमें भी मेरा एक भ्रम बचा हुआ है, कि सम्बन्ध तो विषय से है, तो विषय को हटाएँगे तो फिर मानसिक – ममता मन में है, उसने विषय को पकड़ा हुआ है – और हमने अगर निर्मम किया, तो सम्बन्ध बदलेगा या फिर विषय ही हट जाएगा?

आचार्य प्रशांत: नहीं, थोड़ा और व्यावहारिक होकर सोचते हैं। अगर मुझे चाहिए ही नहीं तो मेरी मेज़ पर ये सारी चीज़ें पड़ी क्यों रहेंगी, और कब तक पड़ी रहेंगी? और पड़ी रहेंगी भी तो ऐसे कि जैसे अतीत का एक गतिवेग है। तो पड़ी हुई हैं, पुराना मोमेंटम (संवेग) समझ लीजिए। नहीं तो जिस चीज़ से मुझे ममता नहीं, वो चीज़ विषय बनकर मेरे जीवन में भी कब तक मौजूद रह जाएगी?

भई, आपके घरों में बहुत सारी चीज़ें होतीं हैं, उन्हीं को विषय कहते हैं न? सत्तर चीज़ें होतीं हैं – कपड़े-लत्ते, गुलदस्ता, पंखा, फ्रिज, ये, वो, पचास चीज़ें – वो चीज़ें घर में यूँ ही पड़ी हुईं हैं या आप उनको लेकर के आए हैं और अपनी ऊर्जा से उनको साफ़ करते हैं, मरम्मत देते हैं और उनको रखे रहते हैं? बताइए! तो जब आपका उनसे नाता नहीं रह जाता तो वो चीज़ें भी या तो बस पड़ी रहतीं हैं आपके लिए महत्वहीन होकर के, जब तक कि उनका आप कह सकते हैं कि जो प्रारब्ध-काल है वो बीत नहीं जाता, या फिर आप उन चीज़ों को हटा ही देते हैं।

प्र: जो मैं समझ रहा था, आचार्य जी, वो ये था कि जैसे कोई वस्तु है, उसको मैंने उसकी उपयोगिता से ज़्यादा मूल्य दे दिया – ये ममता हो गया।

आचार्य: बहुत बढ़िया!

कम या ज़्यादा नहीं, आयाम क्या है? कोई वस्तु है जो आपको उस आयाम में ले जाती है, तो उस वस्तु की उस आयाम जितनी ही उपयोगिता है; फिर तो उसको बहुत महत्व देना है, और वो महत्व फिर ममता नहीं कहलाता। वो महत्व है, ममत्व नहीं है फिर। ‘मह’ और ‘मम्’ में अंतर समझिए! ‘मह’ माने होता है बड़ा, और ‘मम्’ माने होता है मेरा। तो अपने जीवन में वो वस्तुएँ रखिए जिनका महत्व है, जो आपको बड़प्पन की ओर ले जाएँगी, वो वस्तुएँ मत रखिए जिनसे ममत्व है।

अब इसी श्रृंखला में जब संत आए भक्तिकाल के, तो उन्होंने इसमें एक बड़ी मीठी चीज़ जोड़ दी, इसको एक बड़ी मीठी फिरकी दे दी। वो बोले, ‘ममता तो नहीं छूटेगी, तो हम क्या करेंगे? जिसका महत्व है उसी से ममत्व कर लेंगे।‘ तो उन्होंने फिर अपने भगवान बनाए और भगवान से ममता कर ली। बोले, ‘ममता तो छूट ही नहीं रही, तो जिसका महत्व है उसी से ममता करे लेते हैं।‘

तो फिर सूरदास हो गए या तुलसीदास हो गए; उन्होंने, देखा है, परमात्मा को लेकर के कितनी मीठी बातें बोलीं हैं? वो एक तरह से चीज़ व्यावहारिक भी है। बोले, ‘भीतर की जो वृत्ति है, जो जुड़ना चाहती है, जो हाथ लगाना चाहती है, जो गले मिलना चाहती है, जो गोद लेना चाहती है, वो तो कहीं जा नहीं रही, वो तो है ही है। तो करें क्या? ये भी दिख रहा है लेकिन, कि वो जिन विषयों की तरफ़ जातीं हैं वो विषय ऊटपटांग हैं।‘ तो उन्होंने कहा कि जो परम है, हम उसी को विषय बना लेंगे ममता का, हम राम से ही प्रीत कर लेंगे।

अब मीराबाई क्या कर रहीं हैं? कह रही हैं, ‘कृष्ण पति हैं।‘ उन्होंने एक बहुत व्यावहारिक बात समझी है। बोलीं, ‘मैं स्त्री हूँ और मेरे भीतर ये है प्यास कि कोई साथी होना चाहिए, पति होना चाहिए। लेकिन मैं ये भी जानती हूँ भली-भाँति – ज्ञान है, बुद्धि है, विवेक है – कि ये जो साधारण तौर पर किसी का हाथ थामा जाता है, इसमें गड़बड़ होती है। भुगत भी चुकी हूँ, मैं स्वयं ही भुगत चुकी हूँ।‘ तो बोलीं, ‘पति तो बनाना है, तो कृष्ण को बना लूँगी।‘ अब लोग कहें, ‘कृष्ण को पति कैसे बनाओगी, कृष्ण सशरीर तो थे ही नहीं!‘

ये लेकिन मानसिक प्रयोग है एक तरह का, और सफल प्रयोग है। ममता भी किसके साथ जोड़ दी?

प्र: जो कृष्ण की ओर ले जाए।

आचार्य: हाँ, जो ऊँचे-से-ऊँचा है, ममता भी उसी से जोड़ दी।

मैं अभी पहले दिन कहा रहा था न कि ममता को छोड़ दो, प्रेम भी छोड़ दो, तुम्हें ईर्ष्या भी करनी है तो राम से करो, बुद्ध से करो। आपके भीतर जितने भी तरह के आवेग आते हैं, उनका विषय सर्वोच्च को बना लीजिए। संगत तो मिल गई न! सोच तो रहे ही थे; अब कुछ भी, क्रोध में ही भरकर सोच रहे हो, तो क्रोध भी किस पर करो? जो सर्वोच्च विषय है उसी पर क्रोध कर लो, कम-से-कम बुरी संगत से तो बच गए। गुस्सा कर लो – ‘अभी क्रोध बहुत है’ – चलो क्रोध के ही तार से सही, तुम जुड़े तो रह गए; टूट मत जाना बस!

प्र: जो चीज़ ममता के तहत जीवन में है, उसको पहले अज्ञान के कारण मैंने ये मान रखा था कि वो मुझे उच्च की तरफ़ ले जाए, मतलब जो भी अज्ञान में था। तो जब समझ बढ़ी तो उस वस्तु से वो सम्बन्ध बदल गया, मानसिक। तो उसकी जो युटिलिटी (उपयोगिता) है, वो उस तरह हो सकती है या पूरी हट जाएगी?

आचार्य: ऋण!

मैं कुछ सोच रहा हूँ, मैं कुछ कर रहा हूँ, मैं कैसा भी व्यक्ति हूँ, कल्पना कर लीजिए मैं नशे में हूँ। मैं नशे में हूँ, मैं कोई चीज़ अपने घर ले आया हूँ, खरीद ली है और किश्तें बाँध दीं हैं अगले बीस साल की। सुबह मेरा नशा उतर गया, मैं किश्तें देना बंद कर सकता हूँ क्या?

ऋण!

तो कुछ ऋण होते हैं जो चुकाने पड़ते हैं; आपका कितना भी आध्यात्मिक जागरण हो जाए, आप उऋण नहीं हो जाएँगे। तो उदाहरण के लिए, मातृ-ऋण, पितृ-ऋण। और भी तरह के आप जो बंधन स्वीकार कर लेते हैं जीवन में, अगर वहाँ ऋण अभी शेष है, तो उसको तो चुकाइए।

उदाहरण समझ में आ रहा है?

तुम नशे में थे, तुम कोई चीज़ खरीद लाए हो और किश्तों पर खरीद लाए हो, बीस साल तक चुकानी हैं किश्तें। सुबह नशा उतर गया, क्या बोलोगे कि वो काम तो नशे में किया था, उस काम का अब कोई मूल्य नहीं? और मान लो जो तुमने चीज़ खरीदी है वो ऐसी खरीदी है कि तुमने उसका उपभोग भी कर लिया। कोई होगी ऐसी चीज़ कि उपभोग कर लिया और बीस साल किश्त है; कर तो लिया न, तो अब किश्तें चुकाओ, उसका कोई समाधान नहीं है, अब किश्तें चुकाते-चुकाते जो यात्रा करनी है वो करो।

और इस प्रक्रिया में याद रखिएगा कि दोष उस विषय का नहीं है; तो ऋण चुकाने की प्रक्रिया में कहीं आप मन खट्टा विषय की ओर से न कर लें। ये जो आप ऋण चुका रहे हैं, ये आपके अपने शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। आपने स्वयं जो ग़लती करी थी, आप उसका एक तरह से भुगतान कर रहे हैं, निपटारा कर रहे हैं, इसमें विषय ने कोई ग़लती नहीं कर दी है।

प्र२: आचार्य जी प्रणाम। जैसे ये ‘निर्मम’ वाली बात है, तो निर्मम होने में बुद्धि तक तो समझ में आता है, लेकिन जब वो क्षण आता है जिसमें ममता ऐसा तर्क देती है कि अभी संभावना शेष है...

आचार्य: संभावना तभी तो शेष है जब आप निर्मम हो पाएँ। आप निर्मम नहीं हो पा रहे तो संभावना तो मर जाएगी न? संभावना माने बेहतरी की संभावना न? ममता का जो विषय है, उसकी बेहतरी ही तो चाहतीं हैं न आप?

प्र२: जी।

आचार्य: हाँ, तो बेहतरी की संभावना तभी तो होगी जब आप निर्ममता दिखाएँगी; ममता दिखा-दिखाकर तो बेहतरी का गला घुटा जा रहा है।

प्र२: ये मोह है जो बार-बार ऐसा तर्क देता है।

आचार्य: मोह के साथ आप जानते हैं ख़तरनाक बात क्या है? बड़ा स्वार्थी होता है; इतना स्वार्थी कि वो उसकी भी परवाह नहीं करता जिससे मोह है।

प्र२: अपना मन कहीं इस बात के साथ खड़ा होता है कि हाँ, निर्मम होना सही है, लेकिन बाकी...

आचार्य: निर्मम होना सही है, सिर्फ़ आपके लिए नहीं, उसके लिए भी जिसके लिए निर्मम होना है आपको।

प्र२: लेकिन बाकी के जो सराउंडिंग (बाहरी वातावरण) हैं, वो सब यही तर्क देते हैं कि नहीं, इसमें नुकसान हो जाएगा।

आचार्य: एक की आवाज़ सुननी होती है – या तो कृष्ण की सुन लीजिए या ये इतने सारे सब ग्वालिये-दूधिये घूम रहे हैं, इनकी सुन लीजिए। सौ आवाज़ें सुनकर के तो बस वो नक्कारखाना बन जाएगा दिमाग का, कुछ सुनाई नहीं देगा।

निर्मम होना – अगर आप किसी चैतन्य विषय, किसी व्यक्ति की बात कर रहे हैं, तो ये अच्छे से समझिए – निर्मम होना सिर्फ़ आपके लिए ही नहीं अच्छा है, उस व्यक्ति के लिए भी बराबर का अच्छा है; क्योंकि आप जिसको अपनी ममता का या मोह का विषय बनाते हैं, आप उसके प्रति भी बड़े हिंसक और क्रूर हो जाते हैं। ये बात सुनने में अजीब लगेगी। उदाहरण के लिए, माँ की तो बच्चे से ममता होती है, तो क्या माँ बच्चे के लिए क्रूर हो जाती है?

बिलकुल हो जाती है।

ये (चाय का कप) मेरे काम आ रहा है, तो मेरा इससे क्या हो गया? या मैं इसके (कप) साथ बहुत दिन से हूँ, तो मेरा इससे क्या हो गया? मोह हो गया। अब इस (कप) पर आईआईएम अहमदाबाद का लोगो बना हुआ है, ये वहीं से मिला था मुझको, तो मेरा इससे बड़ा मोह हो गया, मेरी अतीत की इससे स्मृतियाँ जुड़ी हुईं हैं। अब मान लीजिए इसमें (कप में) चेतना है, ये कोई जीवित व्यक्ति है, और एक दिन ये कहता है कि ‘भाई साहब! मेरी भी ज़िंदगी है, मैं कुछ कर लूँ, मुझे भी इधर-उधर जाना है, जाने दो, कुछ करने दो।‘ तो मैं क्या करूँगा? मैं इसको ऐसे धर-दबोचूँगा – ‘कहाँ जा रहा है तू? कहीं नहीं जाना है!’

मोह और ममता अपने विषय के प्रति भी हिंसक और असंवेदनशील हो जाते हैं। तो आप अगर किसी के प्रति निर्मम हो रहीं हैं तो उसका भी कल्याण ही कर रहीं हैं। इसीलिए निर्ममता और प्रेम एकसाथ चलते हैं। सुनने में अजीब लगेगा। ‘हमने तो यही सुना है कि ममता और प्रेम साथ चलते हैं।’ ग़लत बात! निर्ममता और प्रेम एकसाथ चलते हैं। जब आप निर्मम हो जाते हैं तब प्रेम प्रदर्शित होता है, तब प्रेम सामने आता है। जब आप ममता से भरे हैं, तब तो बस हिंसा है।

समझ में आ रही है बात?

वास्तव में जो हमारी मोह-ममता के विषय होते हैं न, वो हमारे लिए ऐसे ही बस प्याले बन जाते हैं; हम उनको जीवित मानते भी कहाँ हैं! विषय का अर्थ ही है कि तुम उसमें अब चेतना नहीं देख पा रहे। अगर ध्यान से समझें तो जिसको आपने अपनी चेतना का विषय बनाया, उसमें अब आप चेतना नहीं देख पाओगे। आपकी चेतना का विषय अगर कोई व्यक्ति भी बन गया है, तो वो अब आपके लिए जड़ है, अचेतन है। फिर तो हिंसा होगी न? ऐसा क्यों होता है कि जिसको हम अपनी चेतना का विषय बनाते हैं वो हमारे लिए चैतन्य नहीं रह सकता? इसलिए क्योंकि आपकी चेतना किसी को विषय बनाती ही है अपने हितों की पूर्ति के लिए।

हमारी चेतना कैसी है? हम क्या बोलते हैं बार-बार?

श्रोतागण: अतृप्त।

आचार्य: अतृप्त। तो वो किसी को भी विषय क्यों बनाएगी? तृप्ति के लिए। जिसको तृप्ति के लिए तुम विषय बना रहे हो, तुम उसका कल्याण थोड़े ही सोचोगे, तुम तो अपनी तृप्ति की सोचोगे। तो इसीलिए मोह और ममता बड़े क्रूर होते हैं। ममता जितनी क्रूरता कर सकती है, उसकी कोई इंतिहा नहीं है।

प्र३: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी, मैंने आपका कुछ कोट (उक्ति) पढ़ा था रिनंसिएशन (त्याग) के ऊपर, जिसमें उसका मतलब कुछ ऐसा था कि रिनंसिएसन इज़ नॉट अ डूइंग, इट्स अ हैपेनिंग (त्याग करने की चीज़ नहीं है, वो हो जाता है), या फिर इट ड्रॉप्स (गिर जाता है)। मैंने भी अपने जीवन में ये पाया कि जैसे-जैसे हम सत्य के रास्ते पर चलते गए, वैसे-वैसे चीज़ें अपनेआप छूटती गईं, न तो उसके तरफ़ आकर्षण रहा, और वो चीज़ें धीरे-धीरे निकलती गईं अपने रास्ते से।

आज हम सीख रहे हैं कृष्ण से कि वो विषय को हटाने की बात कर रहे हैं। तो इसमें क्या हम ये समझें कि वो व्यक्ति पर निर्भर करता है कि किसी को ये विधि…?

आचार्य: नहीं, विषय को हटाने की बात नहीं है; ज़ोर लगाकर हटाना नहीं पड़ता, ज़ोर लगाकर पकड़ना पड़ता है। विषय को हटाने से मतलब है – तुम पकड़ना छोड़ दो। सक्रिय रूप से जाकर, धक्का मारकर हटाना नहीं है।

समझ में आ रही है बात?

तो इसमें कोई सकारात्मक क्रियाशीलता नहीं चाहिए, कि विषय बैठा हुआ है और तुम विषय को मुक्का मार रहे हो – ‘निकल यहाँ से’। विषय को मुक्का मारने की ज़रूरत ही नहीं, क्योंकि विषय थोड़े ही आता है आपसे चिपकने के लिए, आप जाते हो विषय से चिपकने के लिए। विषय को दूर नहीं भगाना है, आप चिपकना बंद कर दो, विषय अपनी जगह पड़ा रहेगा। आप उससे अपनेआप ही फिर दूर हो जाओगे, या सही सम्बन्ध रख लोगे।

अहंकार अपनी करतूत नहीं स्वीकार करता, बाकी हर चीज़ों का वो कर्ता बनता है। हम ये देखते ही नहीं हैं कि विषय का कोई दोष नहीं है। कौनसा विषय उठकर आया था और आपकी हथेली से चिपक गया था? कभी हुआ है ऐसा? विषयों का पीछा हमने करा है, विषयों को ज़ोर लगाकर मुट्ठी में हमने भींच रखा है। कोई चीज़ आपने मुट्ठी में भींच रखी हो, तो उसको छोड़ने के लिए कितना श्रम करना पड़ता है?

आपने कोई चीज़ ऐसे ज़ोर लगाकर पकड़ रखी है, उसको छोड़ने के लिए बताइए कितनी सारी मेहनत करनी पड़ेगी? कितनी करनी पड़ेगी? कुछ भी नहीं करना पड़ती। क्योंकि जिसको पकड़ रखा है वो कब कह रहा था कि मुझे पकड़कर रखो? वो तो तुमने जान लगा रखी है ज़बरदस्ती; ज़रा-सी अपनी ढील शिथिल करो, फिर देखो क्या होता है। आप अपनी ढील शिथिल करिए, जो आवश्यक नहीं है वो अपनेआप सही स्थान पर आ जाएगा, वो उस स्थान पर आ जाएगा जहाँ फिर उसका महत्व है; अभी वो उस स्थान पर है जहाँ उसका ममत्व है।

प्र४: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मैं शायद कन्फ्यूज़ हो रहा हूँ, मैं शायद ठीक से समझ नहीं पाया। जब हम श्वेताश्वतर उपनिषद् पढ़ रहे थे, तब भी ममत्व की बात आयी थी। ये शब्द नहीं था – ‘ममत्व’। तो तब आपने समझाया था कि विषय की बात नहीं है, जो हमारा रिश्ता है वो हमें तोड़ना है। और जो उदाहरण मुझे याद आ रहा है...

आचार्य: मुझे कुछ याद नहीं मैंने क्या कहा था। अभी जो बात कही उसको समझो, बस। मैं तो दिनभर बोलता हूँ – कभी इधर से, कभी उधर से – सौ तरीकों से बोलता हूँ। अगर तुम मेरी कोई पीछे की बात पकड़े हो, तो इसका मतलब उस बात का मर्म तुम जान नहीं पाए। उस बात को पकड़ रहे थे सिद्धांत की तरह, और फिर अब उससे इसकी तुलना कर रहे हो तो फिर फँसोगे। और ये भी आवश्यक नहीं है कि उस वक़्त उस बात को तुमने जो सुना, जो समझा, वो मैंने कहा ही हो। ध्यान इस पर दो कि अभी क्या कहा। ठीक है?

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