प्रश्नकर्ता: भगवान श्री नमन। जो अभी चर्चा हो रही थी, कि ‘निर्मम’, ‘निराशी’, और ‘युध्यस्व’, ‘विगतज्वर’, तो जो वर्तमान अध्यात्म में चला था कि विषय भी हैं और हम अंदर से बदल जाएँगे, इसमें भी मेरा एक भ्रम बचा हुआ है, कि सम्बन्ध तो विषय से है, तो विषय को हटाएँगे तो फिर मानसिक – ममता मन में है, उसने विषय को पकड़ा हुआ है – और हमने अगर निर्मम किया, तो सम्बन्ध बदलेगा या फिर विषय ही हट जाएगा?
आचार्य प्रशांत: नहीं, थोड़ा और व्यावहारिक होकर सोचते हैं। अगर मुझे चाहिए ही नहीं तो मेरी मेज़ पर ये सारी चीज़ें पड़ी क्यों रहेंगी, और कब तक पड़ी रहेंगी? और पड़ी रहेंगी भी तो ऐसे कि जैसे अतीत का एक गतिवेग है। तो पड़ी हुई हैं, पुराना मोमेंटम (संवेग) समझ लीजिए। नहीं तो जिस चीज़ से मुझे ममता नहीं, वो चीज़ विषय बनकर मेरे जीवन में भी कब तक मौजूद रह जाएगी?
भई, आपके घरों में बहुत सारी चीज़ें होतीं हैं, उन्हीं को विषय कहते हैं न? सत्तर चीज़ें होतीं हैं – कपड़े-लत्ते, गुलदस्ता, पंखा, फ्रिज, ये, वो, पचास चीज़ें – वो चीज़ें घर में यूँ ही पड़ी हुईं हैं या आप उनको लेकर के आए हैं और अपनी ऊर्जा से उनको साफ़ करते हैं, मरम्मत देते हैं और उनको रखे रहते हैं? बताइए! तो जब आपका उनसे नाता नहीं रह जाता तो वो चीज़ें भी या तो बस पड़ी रहतीं हैं आपके लिए महत्वहीन होकर के, जब तक कि उनका आप कह सकते हैं कि जो प्रारब्ध-काल है वो बीत नहीं जाता, या फिर आप उन चीज़ों को हटा ही देते हैं।
प्र: जो मैं समझ रहा था, आचार्य जी, वो ये था कि जैसे कोई वस्तु है, उसको मैंने उसकी उपयोगिता से ज़्यादा मूल्य दे दिया – ये ममता हो गया।
आचार्य: बहुत बढ़िया!




