महाभारत, और भारत का अभाग || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी. रुड़की में (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा प्रश्न महाभारत से सम्बन्धितहै। महाभारत हमारे भारत का सबसे बड़ा महाकाव्य है, इसका एक उपभाग भगवद्गीता जैसा ग्रंथ है, इतने अच्छे सबक हम सीखते हैं। पर हमने हमेशा से देखा है, बचपन से ही, कि घरों में महाभारत का पाठ नहीं होता है। रामायण का पाठ होता है।
महाभारत के लेसन्ज़ या सबक क्या हमारे डोमेस्टिक वैल्यू एन्हैन्स्मन्ट (घरेलू मूल्यवर्धन) के लिए ज़रूरी नहीं है? या हम सूपर्स्टिशस (अंधविश्वास) वाले डर या उसके दुष्प्रभाव से इतने डरे हुए हैं कि उससे हम लेसन्ज़ लर्न (सबक सीखना) करना ही नहीं चाहते?
अचार्य प्रशांत: देखिए, भारत जितना विलक्षण और सौभाग्यशाली देश रहा है, भारत का अभाग भी उतना ही बड़ा है। जो ऊँची- से- ऊँची बातें हो सकती थीं, वो भारत को बहुत जल्दी मिल गयीं। मिली पूरे विश्व को, पर बाद में मिली। कई बार भारत से ही मिली बाद में, उनको। भारत को बहुत जल्दी मिल गयीं।
दिक्क़त बस ये है कि जो ऊँची बात होती हैं, पहली बात वो आसानी से समझ में नहीं आती। दूसरी बात, जब समझ में आती है, तो बहुत ज़ोर का झटका दे देती है। और वो ऊँची चीज़ आपके पास आ गयी है और जल्दी आ गयी है और आसानी से आ गयी है। तो ज़्यादातर लोग फिर क्या करेंगे? उस ऊँची चीज़ से वो क्या करेंगे? वो घबरा जाते हैं। वो घबरा जाते हैं। तो भारत में ही जो उच्चतम ग्रंथ हैं उनके विरुद्ध साज़िशें भी रची गयीं। जहाँ उच्चतम ग्रंथ हैं ही नहीं, वहाँ साज़िश की भी ज़रूरत नहीं है।
आप सोचिए न कि वेदांत भारत में है, पर दुनिया भर की उल्टी-पुल्टी प्रथाएँ भी भारत में ही हैं; ;ये दोनों एक साथ कैसे हो गया? वेदांत भारत में है और सती प्रथा भी भारत में रही; ये कैसे हो पाया? वेदांत भी है और जाति प्रथा भी है; ये हो कैसे पाया? कहाँ वेदांत, कहाँ जाति प्रथा; ये साथ-साथ कैसे चल गये? ये पूछिए तो अपनेआप से।



