किसी इंसान ने ही लिखे होगें उपनिषद, हमें नहीं पढ़ना || आचार्य प्रशांत (2021)

आचार्य प्रशांत: (प्रश्नकर्ता का प्रश्न पढ़ते हुए) ‘आप इतना जो़र देते हैं गीता पर, उपनिषद् पर और ग्रंथों पर, ख़ासकर वेदान्त पर तो उपनिषद् भी। तो इंसानों ने ही लिखे है न, तो हम किसी और इंसान कि लिखी हुई चीज़ को क्यों पढ़ें? और जिन्होंने उपनिषद् लिखे हैं उन्होंने पहले तो कोई उपनिषद् पढ़ा नहीं था, तो माने, बिना उपनिषद् पढ़े भी अपने अनुभवों से ज्ञान पाया जा सकता है। जब उन सब लोगों ने पा लिया तो हम क्यों नहीं पा सकते?’
बिलकुल पाया जा सकता है और इंसानों से ही आये हैं उपनिषद् और वेदों को कहा जाता है ‘अपौरुषेय’। लेकिन चेतना कितनी भी ऊँची हो, उसकी अभिव्यक्ति तो किसी इंसान के ही माध्यम से होती है। तो बिलकुल ठीक है कि इंसानों के ही माध्यम से अभिव्यक्त हुई है, चाहे गीता हों, चाहे उपनिषद् हों। और जो आपने भाव व्यक्त करा है कि जब वो इंसान थे उपनिषद् लिख सकते थे बिना अन्य उपनिषदों को पढ़े तो हम क्यों नहीं कर सकते?
कुछ बातें हैं, इसमें समझनी होगी। पहली बात तो मैंने तुरन्त ही मान लिया कि वेद हों, उपनिषद् हों, किसी दैवीय चमत्कार का नतीज़ा नहीं हैं। बिलकुल ठीक कह रहे हो प्रवीण कि वो इंसान से ही आये हैं। तो यहाँ तक आपकी बात ठीक है। फिर आगे कह रहे हो कि जब एक इंसान उन्हें लिख सकता है तो दूसरा इंसान भी लिख सकता है।
अब यहाँ पर बात थोड़ी सूक्ष्म हो जाती है, समझना होगा। देखो, इंसान और इंसान बराबर नहीं होते। यह बात मुझे पता है कि सुनने में थोड़ी विचित्र लगेगी पर बोले देता हूँ। यह तो छोड़ दो कि दो इंसान आपस में बराबर होते हैं, एक ही इंसान एक पल में जिस स्तर पर होता है, दूसरे पल उस स्तर पर नहीं होता।
तुम एक इंसान की हाथ की लंबाई नापो आज और दो साल बाद तो कोई अंतर न मिले शायद और मिले भी तो बहुत न्यून। लेकिन तुम एक इंसान कि चेतना नापो आज और दो साल बाद तो बहुत अंतर मिलेगा। अब मैं तुमसे पूछ रहा हूँ, 'इंसान क्या है, उसका दायाँ हाथ या उसकी चेतना? इंसान क्या है?'



