जो ये जान जाएगा वो रिश्तों में कभी धोखा नहीं खाएगा || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि इंसान अपनों से भी चोट क्यों खाता है?
आचार्य प्रशान्त: देखिए, हमारा जैसा जन्म ही होता है, हम बचपन से ही जैसे होते हैं, जैसा हमारा शरीर है, उसकी निर्मिती, उसकी संरचना है, हम भीतर से एक अपूर्णता, एक तरह की बेचैनी, एक खालीपन लेकर के ही पैदा होते हैं — और वो दुख देता है, चुभता है — ये हर इंसान की बात है। तो इंसान उसको किसी तरीक़े से भरना चाहता है — भीतर के खालीपन को।
तो हिंसा की — शुरू करने के लिए अभी आज की चर्चा को — जो मैं परिभाषा दे सकता हूँ, वो ये है कि भीतर की बेचैनी का इलाज करने की कोशिश करना बिना उस बेचैनी को समझे, यही हिंसा है।
मैं भीतर से एक खलबली सी अनुभव करता रहता हूँ। ठीक है! ज़िंदगी में कुछ कमी है, अच्छा नहीं लग रहा, मन उद्विग्न रहता है। उसका मुझे कुछ तो करना पड़ेगा न? जैसे शरीर में तकलीफ़ हो तो इंसान कुछ तो उसका उपचार करना चाहता है, वैसे मन को लगातार तकलीफ़ बनी हुई है, उसका कुछ इलाज करना है। उसका नकली इलाज, बिना बीमारी को समझे इलाज करने की कोशिश हिंसा है।
क्योंकि, देखिए क्या है — दो मिनट और लेकर बोलता हूँ उस पर — भीतर जो कुछ भी है, वो बेचैन करता है, दुख देता है। हर इंसान अनुभव करता है कि ज़िंदगी में कुछ कमी है। कोई आपको नहीं मिलेगा जो कहेगा कि सब बढ़िया चल रहा है। कोई नहीं कहेगा कि आगे कुछ नहीं चाहिए; सबको अभी आगे चाहिए। सबकी इच्छाएँ, तमन्नाएँ हैं आगे के लिए।
और कहाँ जाकर के इच्छा पूरी करेगा इंसान! उसको सामने दुनिया ही दिखाई देती है। उसको लगता है यही है सबकुछ, इसी में जाकर के किसी तरीक़े से अपनी अतृप्ति है, उसको ठीक कर लो। तो जो भी कुछ उसको नज़र में आता है, जिस भी चीज़ पर वो अपने हाथ रख सकता है, उसका फिर वो शोषण करता है। यही हिंसा है।



