Acharya Prashant is dedicated to building a brighter future for you
Articles
जो ये जान जाएगा वो रिश्तों में कभी धोखा नहीं खाएगा || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
38 min
103 reads

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि इंसान अपनों से भी चोट क्यों खाता है?

आचार्य प्रशान्त: देखिए, हमारा जैसा जन्म ही होता है, हम बचपन से ही जैसे होते हैं, जैसा हमारा शरीर है, उसकी निर्मिती, उसकी संरचना है, हम भीतर से एक अपूर्णता, एक तरह की बेचैनी, एक खालीपन लेकर के ही पैदा होते हैं — और वो दुख देता है, चुभता है — ये हर इंसान की बात है। तो इंसान उसको किसी तरीक़े से भरना चाहता है — भीतर के खालीपन को।

तो हिंसा की — शुरू करने के लिए अभी आज की चर्चा को — जो मैं परिभाषा दे सकता हूँ, वो ये है कि भीतर की बेचैनी का इलाज करने की कोशिश करना बिना उस बेचैनी को समझे, यही हिंसा है।

मैं भीतर से एक खलबली सी अनुभव करता रहता हूँ। ठीक है! ज़िंदगी में कुछ कमी है, अच्छा नहीं लग रहा, मन उद्विग्न रहता है। उसका मुझे‌ कुछ तो करना पड़ेगा न? जैसे शरीर में तकलीफ़ हो तो इंसान कुछ तो उसका उपचार करना चाहता है, वैसे मन को लगातार तकलीफ़ बनी हुई है, उसका कुछ इलाज करना है। उसका नकली इलाज, बिना बीमारी को समझे इलाज करने की कोशिश हिंसा है।

क्योंकि, देखिए क्या है — दो मिनट और लेकर बोलता हूँ उस पर — भीतर जो कुछ भी है, वो बेचैन करता है, दुख देता है। हर इंसान अनुभव करता है कि ज़िंदगी में कुछ कमी है। कोई आपको नहीं मिलेगा जो कहेगा कि सब बढ़िया चल रहा है। कोई नहीं कहेगा कि आगे कुछ नहीं चाहिए; सबको अभी आगे चाहिए। सबकी इच्छाएँ, तमन्नाएँ हैं आगे के लिए।

और कहाँ जाकर के इच्छा पूरी करेगा इंसान! उसको सामने दुनिया ही दिखाई देती है। उसको लगता है यही है सबकुछ, इसी में जाकर के किसी तरीक़े से अपनी अतृप्ति है, उसको ठीक कर लो। तो जो भी कुछ उसको नज़र में आता है, जिस भी चीज़ पर वो अपने हाथ रख सकता है, उसका फिर वो शोषण करता है। यही हिंसा है।

चूँकि वो ख़ुद को नहीं समझता, अपनी बेचैनी को नहीं समझता, इसीलिए वो ये नहीं समझता कि क्या करके वो चैन तक, शान्ति तक पहुँच सकता है। फिर उसको बाहर जो कुछ भी दिखाई देता है — रुपया-पैसा, जीव-जंतु, स्त्री-पुरुष — वो हर चीज़ पर चढ़ बैठना चाहता है। और किसी भी तरीक़े से उसका इस्तेमाल करके अपने खालीपन को भरना चाहता है। तो इसलिए हमें हर तरीक़े की हिंसा दुनिया में दिखाई देती है।

जिन पर हिंसा की जा रही है, वो स्वयं भी हिंसक हैं, बस बात संयोग की है। बात इसकी है कि किसका पलड़ा भारी पड़ जाता है। दो हिंसक पशु हैं, आपस में वो भिड़े हुए हैं, एक जीत जाता है, एक हार जाता है। जो हार गया है, जिसका शोषण हो रहा है, उसका बस चले तो वो भी शोषण कर ही डाले — हिंसक वो भी है।

तो ऐसा नहीं है कि जो शोषक है मात्र वही हिंसक है, जो शोषित है वो भी हिंसक है। हिंसा का सम्बन्ध अनिवार्य रूप से शोषक होने, एक्सप्लॉयटर (शोषक) होने या एक्सप्लॉयटेड (शोषित) होने से नहीं है। हिंसा का सम्बन्ध अनिवार्य रूप से आंतरिक अज्ञान से है। जो ख़ुद को नहीं जानता, जो अपने मन को नहीं समझता, दुनिया में वो है क्या और ये दुनिया क्या चीज़ है — इसको नहीं समझता, वो हिंसक ही होगा। उस हिंसा की अभिव्यक्ति भले ही दस, बीस, सौ, पचास अलग-अलग रूपों में होती रहे। वो सब जो रूप हैं, आपने कहा, उसकी चर्चा होगी अभी।

प्र: तो क्या हम सबकी प्रवृत्ति ही ऐसी है? या शुरुआत में सभी की होगी; या जो अंदर से समझने की कोशिश करता है वो बदल जाता है। या हम सब वैसे ही बने हैं?

आचार्य: सबकी वही है। सब वैसे ही हैं। देखो न हम जन्म से कैसे होते हैं? एक छोटा बच्चा होता है वो क्या करता है? उसको क्या समझ में आ रहा है? वो भ्रमित ही तो है लगातार। उसे झुनझुना दे देते हो, वो थोड़ी देर के लिए खुश हो जाता है, मन बहल जाता है। न वो दुनिया को जान रहा है, न अपनेआप को जान रहा है। उसमें भ्रम भी है, अज्ञान भी है, स्वार्थ भी है, ईर्ष्या भी है उसमें; ये सब छोटे बच्चों में होती हैं न चीज़ें!

कुछ ऐसा नहीं है कि कोई उन्हें सिखा देगा तो ये सब उनमें आएगा। और ये सब चीज़ें पशुओं में भी पायी जाती हैं। तो जो बच्चा पैदा होता है, हम जैसे जन्म लेते हैं, हम पशुओं जैसे ही तो होते हैं। बस इतना है कि पशुओं में कोई बेचैनी नहीं होती जिसका उन्हें इलाज करना है। पशु पूरे तरीक़े से प्राकृतिक होते हैं। वो अपनी शारीरिक संरचना से बँधे हुए हैं और उससे उन्हें कोई तकलीफ़ नहीं है।

प्र: तो वो सम्पूर्ण हैं फिर।

आचार्य: अपने तरीक़े से सम्पूर्ण हैं। वो जहाँ भी हैं उन्हें उससे आगे जाना ही नहीं है। और अगर वो उससे आगे नहीं जाते, तो वो घबरा नहीं जाते हैं। उनको तनाव, मनोरोग, डिप्रेशन , एंग्ज़ाइटी , ये सब नहीं हो जाता है। शेर जंगल में घूम रहा है वो कोई तरक़्क़ी थोड़े ही कर पाता है ज़िंदगी में। ऐसा थोड़े ही होता है कि ग़रीब पैदा हुआ था और कोशिश करके अमीर हो गया।

प्र: कोई मुकाम लेकर नहीं घूम रहा।

आचार्य: उसे कोई मुकाम चाहिए ही नहीं। लेकिन इंसान चूँकि भीतर से खाली है, एक तरह से पिछड़ा हुआ है, तो उसे एक मुकाम की तलाश है। और हम उससे ये नहीं कह सकते कि मुकाम की ख़्वाहिश छोड़ ही दो बिलकुल।

समझना पड़ेगा कि इंसान है क्या और वास्तव में उसे कौनसा मुकाम चाहिए। नहीं तो वो अंधे तरीक़ों से अपनी कामनाओं को पूरी करने के लिए कुछ भी करता है — यही हिंसा है। हिंसा का सम्बन्ध दूसरे को दुख देने से भी नहीं है।

जो हम कहते हैं न कि अगर आपने दूसरे का दिल तोड़ दिया, दूसरे को तकलीफ़ दे दी, तो वो हिंसा है। वो भी आवश्यक नहीं है। आप हो सकता है अपनी ओर से दूसरे को सुख दे रहे हों, वो भी बहुत बड़ी हिंसा हो सकती है। क्योंकि हिंसा का सम्बन्ध दुख-सुख से नहीं है, हिंसा का सम्बन्ध आपके अज्ञान से है।

भीतरी तौर पर नासमझ रहते हुए आप दूसरे की भलाई करना चाहो, वो भी हिंसा है।

माँ-बाप और बच्चे! (मुस्कुराते हुए) दुनिया के सब माँ-बाप ऊपरी तौर पर तो यही कहेंगे न कि बच्चों की भलाई करना चाहते हैं। पर माँ-बाप को न मन का कुछ पता है न जीवन का कुछ पता है, तो भले ही उनका कहना ये रहता है कि बच्चे का मैं भला करना चाहता हूँ, पर देखिए, बच्चों की क्या हालत कर देते हैं!

भई! दुनिया की अधिकांश आबादी — लगभग पिच्चानवे-निन्यानवे प्रतिशत आबादी — माँ-बाप के ही पालन-पोषण, संरक्षण से निकल करके आयी है न। आज आप दुनिया के जितने भी लोग देख रहे हैं उसमें से कुछ बेचारों को छोड़ दीजिए — अनाथ हो गये, यतीम हो गये या कोई और उनकी वजह थी, माँ-बाप के साथ नहीं रहे। पर सौ में से निन्यानवे लोग तो माँ-बाप के द्वारा ही पाले-पोसे गये हैं, बड़े किये गए हैं। और बड़े होकर के देखिए कैसे निकल आते हैं!

अगर सब माँ-बाप बच्चों का भला करना चाहते हैं, तो दुनिया की आबादी इतनी बुरी क्यों है? इन्हें बुरा किसने बना दिया? तो इसका मतलब भलाई की नीयत मात्र से भलाई नहीं हो जाती। भलाई की नीयत रहते हुए भी घोर हिंसा हो सकती है अगर आप समझ नहीं रहे हैं। वो जो समझ की कमी है, बोध की कमी है, वही आध्यात्मिक ज्ञान है। उसके बिना हिंसा होगी ही होगी।

प्र२: तो ये एक जात का संस्कारित होना है। और ये संस्कारित परंपरा पर ज़्यादा आधारित रहती है। जैसे फिर वो बच्चा जैसे बड़ा होता जाता है, प्रश्न पूछने की या सोचने की जो योग्यता है वो नहीं रहती।

जैसे मैं एक उदाहरण देती हूँ, मुझे विगनिज़्म (शुद्ध शाकाहार) के बारे में कुछ बीस साल की थी या बाईस साल की थी, तब पता चला। तब तक मेरे मन में ये प्रश्न भी नहीं आया कि ये दूध कहाँ से आ रहा है। पता है कि गाय से आ रहा है लेकिन कैसे आ रहा है, किसके लिए आ रहा है, ये सब प्रश्न मेरे मन में आये ही नहीं। और वो शायद कंडिशनिंग (संस्कारित होने) के कारण था।

आचार्य: नहीं, ये भी हो सकता है कि ये जो प्रश्न आया कि दूध कहाँ से आ रहा है, ये भी एक तरह की कंडिशनिंग हो गयी। मूल प्रश्न ये नहीं है ‘दूध कहाँ से आ रहा है?’ मूल प्रश्न ये है ‘मैं कहाँ से आ रहा हूँ?’ (मुस्कुराते हुए)

भाई! ऐसा थोड़े ही है कि बच्चे सवाल नहीं पूछते हैं। बच्चे बहुत तरह के सवाल पूछते हैं, पर उन सवालों से कोई बहुत लाभ होना नहीं है। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि उन सवालों के उत्तर नहीं दिये जाने चाहिए या उन सवालों को दबा दिया जाना चाहिए। पर बच्चा जो प्राकृतिक रूप से प्रश्न पूछ रहा है वो ठीक है उसकी जिज्ञासा, कौतूहल है, कुछ उसका दे दीजिए समुचित उत्तर, लेकिन उनसे बहुत लाभ होने वाला नहीं है।

जो मूल प्रश्न है वो ये है कि ये मन क्या चीज़ है और इसमें क्या चल रहा है। इसको चाहिए क्या? अगर वो ये प्रश्न नहीं पूछ रहा है, तो बहुत सारे प्रश्न पूछेगा। क्रिकेट मैच चल रहा होता है, लोग बार-बार पूछते हैं, ‘स्कोर क्या हो गया? स्कोर क्या हो गया?’ अब इन प्रश्नों से क्या लाभ है।

तो हम बहुत ज़्यादा इम्फेसिस (ज़ोर) दे देते हैं, महत्व दे देते हैं इस बात को कि सवाल पूछो। लेकिन सिर्फ़ सवाल पूछने से क्या होगा? व्यर्थ के सवाल पूछते रहिए जीवनभर, उससे कुछ मिलना नहीं है।

देखिए, आपने अभी प्रश्न करा न, उसमें थोड़ा सा ये भाव निहित है कि बच्चा ठीक-ठाक पैदा हुआ था, कंडिशनिंग ने उसको ख़राब कर दिया। नहीं, वो बात नहीं है। हम पैदा ही गड़बड़ होते हैं। ऐसा नहीं है कि हम ठीक पैदा हुए थे और कंडिशनिंग ने, सामाजिक व्यवस्था ठीक नहीं थी और शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं थी और ‘तारे ज़मीन पर’ हो गया, तो उस कारण हम ख़राब हो गये — वो सब बात नहीं है।

जैसे हम अपनेआप को बताते हैं जो बच्चे की मासूमियत का सिद्धान्त है। बच्चे की मासूमियत का हमने जो एक सपना बना रखा है उसको बरक़रार रखने के लिए। बच्चा नहीं मासूम पैदा होता, बच्चा जानवर पैदा होता है।

तो कंडिशनिंग जिसको आप कहते हैं, थोड़ा सा हम उस पर बात करेंगे — है क्या कंडिशनिंग ? एक बच्चा है, आप उसको कुछ बोल रहे हो, कुछ आपने उसको बता दिया। यही कंडिशनिंग है न! तो कंडिशनिंग भी एक प्रकार का ज्ञान है। ऐसा नहीं है कि बच्चे को कुछ बताना ग़लत है। सही ज्ञान बच्चे की पुरानी कंडिशनिंग को साफ़ करता है। कंडीशन्ड (संस्कारित) तो हम पैदा होते ही हैं न! कौनसी कंडिशनिंग लेकर के? संस्कारित हम पैदा हुए हैं। वो कौनसी कंडिशनिंग है जो हम लेकर पैदा हुए हैं? बायोलॉजिकल, जैविक कंडिशनिंग है न इसमें!

प्र१: भूख लगी है, खाना खाना है।

आचार्य: बहुत बढ़िया! बहुत अच्छे! तो भूख लगी है, खाना खाना है। खाना नहीं मिला, तो शोर मचाना है। ठीक है? छोटा सा बच्चा भी होता है, उसे गुस्सा आ जाता है, तो ऐसे पकड़ करके नोचेगा। अब ये सब तो हम लेकर पैदा हुए ही हैं न। ये हटाने के लिए भी ज्ञान ज़रूरी है।

तो ऐसा नहीं है कि बच्चे को अगर आप कुछ चीज़ें बता रहे हो, सिखा रहे हो, तो ये अपनेआप में कोई गुनाह हो गया। न ही ये आवश्यक है कि बच्चे को वही बातें बतायी जाएँ जिनका सवाल उसने करा है। क्योंकि अगर आप उसको वही सब बताएँगे जिसके बाबत वो सवाल कर रहा है, तो उसके सवाल तो बहुत सीमित होते हैं।

और उसके सवाल भी कहाँ से उठ रहे हैं? वो भी उसकी अपनी फ़िज़िकल कंडिशनिंग (दैहिक संस्कार) से उठ रहे हैं। यदि उन सवालों का ही उत्तर दिया गया मात्र, तो बच्चे को बहुत लाभ नहीं होना है। तो एक बात तो ये कि बच्चे को बताना, सिखाना, पढ़ाना, उससे बातें करना बहुत आवश्यक है।

जो बातें उससे की जा रही हैं, जो शब्द उसके कान में पड़ रहे हैं, जो प्रभाव उसके मन पर पड़ रहे हैं अगर वो उसकी फ़िज़िकल कंडिशनिंग को, उसकी जो प्राकृतिक, पाशविक वृत्तियाँ हैं, उनको हटा पा रहे हैं, तो हम उसको फिर कह देंगे कि उसको ज्ञान मिल रहा है।

ज्ञान की निशानी ये होती है कि वो मुक्ति देता है। बंधन खोलता है।

प्र१: किसी लिमिटेशन (सीमा) से।

आचार्य: लिमिटेशन्स से उसको। है न! मान लीजिए कि बच्चा है, अब वो दो साल का हो गया, तीन साल का हो गया, उसको कोई छोटा बच्चा मिल गया छ: महीने का और इनमें भी आपस में बड़ी ईर्ष्या हो जाती है। एक डेढ़ साल वाला हो घर में, एक छ: महीने वाला आ जाए घर में, वो डेढ़ साल वाले को उससे समस्या हो जाती है कि सब उसको देख रहे हैं, हमें नहीं देख रहे।

तो अब उसको आपने कुछ बातें बतायीं। बैठ करके, उसके तरीक़े से, जैसे वो समझ सकता है आपने उसको कुछ समझाया। ये बताना अगर उसको बेहतर बना देता है तो इसको हम कह देंगे, ‘ज्ञान मिला उसको’। अब जो उसके पाशविक बंध थे, जो उसकी एनिमल इंस्टिंक्ट (पशु वृत्ति) थी, उससे उसको थोड़ी मुक्ति मिली।

लेकिन माँ-बाप जो बता रहे हैं या टीवी से उस पर जो प्रभाव पड़ रहा है अगर उससे उसकी फ़िज़िकल कंडिशनिंग के ऊपर सोशल कंडिशनिंग की एक तह और पड़ रही है, धूल के ऊपर धूल की एक तह और पड़ रही है, तो आप कहिए कि वो बच्चा कंडीशन्ड किया जा रहा है।

असल में शिक्षा का उद्देश्य क्या है? शिक्षा का उद्देश्य है कि हम जिन संस्कारों और बंधनों के साथ पैदा ही हुए हैं, शिक्षा उनका समाधान करे, बंधनों की गाँठ को खोले। शिक्षा का ये उद्देश्य है। शिक्षा ऐसा तभी कर पाएगी जब शिक्षा में ही आत्मज्ञान निहित हो।

इसी तरीक़े से बच्चे को जो संस्कार दिये जाते हैं, वो संस्कार ऐसा नहीं है कि सब व्यर्थ ही हैं। बच्चे को संस्कार तो देने पड़ेंगे पर वो संस्कार ऐसे होने चाहिए जो पुराने संस्कारों को काटें। लेकिन हम गड़बड़ क्या कर देते हैं कि चूँकि हम ख़ुद ठीक से संस्कारित नहीं हैं, हमारे अपने ही पुराने बंधन नहीं कटे हैं, तो बच्चे को जो हम संस्कार देते हैं वो उसके पुराने संस्कारों को तो नहीं ही काटते हैं, वो स्वयं नये बंधन बन जाते हैं।

तो ऐसी सी बात है कि बच्चा बीमार पैदा हुआ और क्या बीमारी है उसकी? उसकी देह ही उसकी बीमारी है। उसकी बायोलॉजी , उसकी बर्थ (जन्म) ही उसकी बीमारी है। एक बीमारी वो लेकर पैदा हुआ और फिर जहाँ पैदा हुआ जिस दुनिया में, वहाँ सब बड़े-बूढ़े, शिक्षक और माँ-बाप और सब ज़िम्मेदार क़िस्म के लोग हैं। वो कह रहे हैं, ‘भाई, हमारे पास दवाइयाँ हैं। हम तुम्हारी बीमारी को दूर करेंगे।’

और जो वो ज़िम्मेदार क़िस्म के लोग हैं, ये ख़ुद एकदम गोल हैं दिमाग़ से, तो उन्होंने उसको दवाई दे दी। उस दवाई को क्या बोलते हैं — सामाजिक संस्कार और शिक्षा। और ये जो दवाई थी इसने क्या करा? जो पहली बीमारी थी वो तो बनी ही रही, इस दवाई ने एक नयी बीमारी पैदा कर दी। वो एक बंधन लेकर पैदा हुआ था।

प्र१: ओवरडोज़ (अधिमात्रा) हो गया।

आचार्य: बहुत बढ़िया! वो एक बंधन लेकर पैदा हुआ था, अब उसके दो बंधन हो गये। कौनसे लेकर पैदा हुआ था? शारीरिक बंधन लेकर पैदा हुआ था, सामाजिक बंधन हमने उसके ऊपर और डाल दिये।

तो कंडिशनिंग वाली जो बात है, वो थोड़ी सी सूक्ष्म है। हमें उसको, बच्चे को सिखाना तो पड़ेगा ही। हम यदि ये सोचें कि वो मासूम पैदा होता है और समाज ने उसको बिगाड़ दिया, तो ये बात बिलकुल ठीक नहीं है। समाज का बच्चे के प्रति दायित्व है और समाज यदि बच्चे को सिखाएगा नहीं, समझाएगा नहीं, तो बच्चा वैसा ही रहेगा जैसे जंगल में कोई जानवर पैदा होता है।

एक बच्चा पैदा हो और वो जन्म से ही जंगल में रहा आये, जंगल में ही पले-बढ़े, तो आपको क्या लगता है कि बीस की उम्र आते-आते वो महाविद्वान बन जाएगा! वो कैसा हो जाएगा? वो जैसे जंगल का एक बर्बर पशु है वैसा ही रहेगा। हम जंगल में ही तो थे सब-के-सब। अभी इंसान ताज़ा-ताज़ा ही तो जंगल से बाहर आया है दस-चालीस हज़ार साल पहले। तो हम क्या करते थे जब हम जंगल में थे? इंसान जंगल में ही तो था, तो क्या करा करता था तब वो?

बाक़ी सब जानवर थे वैसे ही इंसान था। लेकिन बाक़ी जानवरों से इंसान में एक शारीरिक फ़र्क है। वो ये है कि हमारा मस्तिष्क, हमारा जो पूरा डीएनए है, वो इस क़िस्म का है कि हम बेचैनी अनुभव करते हैं। तो आप बच्चे को आज जंगल में छोड़ दीजिए, वो भी वही कहानी दोहराएगा जो हमने दोहराई थी। जंगल में आज से एक लाख साल पहले हमने क्या करा था?

बाक़ी जानवरों जैसा जीवन बिताते-बिताते हमने आग पैदा करी, फिर हमने पत्थर के हथियार बनाए और फिर हमने ये करा, फिर वो करा। और फिर एक दिन हम जंगल से बाहर आकर के खेती करने लग गये। बच्चा भी वही करेगा। उसे आप बस पर्याप्त समय दे दीजिए। एक जन्म में न कर पाए वो, पर उस बच्चे की अगर पुश्तें निकल गयीं, तो दस-बीस हज़ार साल में फिर वही कहानी दोहराएगा जो हमने दोहरायी थी लाख साल पहले।

प्र१: उन्हें बताओ न बताओ, पर वो उसी मुकाम पर हैं।

आचार्य: क्योंकि वो सारा कार्यक्रम प्राकृतिक है, प्री-कंडीशन्ड (पूर्व संस्कारित) है। आज सारी सृष्टि नष्ट हो जाए…

प्र१: जिज्ञासा?

आचार्य: नहीं, जिज्ञासा नहीं। बेचैनी। आप मान लीजिए, आज एक आणविक युद्ध हो जाता है। ठीक है! सबकुछ नष्ट हो जाता है। जंगल भर बचते हैं कुछ। और कुछ इंसान उन जंगलों में हैं और उन इंसानों के पास अब ज़्यादा कुछ बचा नहीं है; न स्कूल है न कॉलेज है। थोड़ा-बहुत ज्ञान है और ज्ञान भी किसी तरह समय के साथ नष्ट हो जाता है। तो हम फिर से वही लाखों साल वाली पुरानी स्थिति पर पहुँच जाते हैं। क्या होगा? कालचक्र स्वयं को पुनः दोहराएगा। जैसा-जैसा हमने लाख, दो लाख या दस लाख साल पहले करा था, वही हम पुनः करेंगे।

प्र१: तो फिर मेरा एक सवाल है कि जितना हम या ये पूरी दुनिया आधुनिकता का आविष्कार कर रही है, उसी के ज़रिए लोगों ने आविष्कारों के नाम पर परमाणु बम और क्या-क्या नहीं बना लिया। लेकिन अंततः हम सब अपने उसी खालीपन को मारने के लिए ही ये सब कर रहे हैं। उसको नाम दे दिया जाता है कि ये तो विज्ञान है, पूर्ण सम्मान व प्रेम के साथ।

वास्तव में विज्ञान बहुत शक्तिशाली है लेकिन अंततः उसके ज़रिए हम ऐसे आविष्कार कर रहे हैं जो अंततः हम सभी को मार डालने वाले हैं और हम वैसे ही ज़रिए अपने लिए बना रहे हैं। हर जगह ख़तरा-ही-ख़तरा बना रहे हैं उसके नाम पर।

आचार्य: जंगल के चिम्पेंज़ी हैं हम; वनमानुष। वनमानुष हैं हम। आप उसके हाथ में स्टेनगन (बेहोश कर देने वाली बंदूक) दे देंगे या न्यूक्लियर वेपन (नाभिकीय हथियार) का बटन दे देंगे, तो क्या करेगा? भीतर से तो हम वही हैं न जो हम हुआ करते थे लाखों साल पहले। हम जानवर ही तो हैं। जानवर जिसने कपड़े पहन लिए हैं, जानवर जिसने भाषा सीख ली है, जानवर जिसके पास अब कई तरह की तकनीकें आ गयी हैं, ताक़त आ गयी है लेकिन अपने अंतिम, भीतरी केंद्र पर तो उसकी वृत्तियाँ सब पाशविक हैं। हम कुछ भी ऐसा करते हैं क्या जो जंगल के जानवर नहीं करते, मूल रूप से?

हमें क्या चाहिए? हमें ताक़त चाहिए। जंगल के जानवर की भी वही वृत्ति रहती है। हमें अपने कबीले पर राज करना है, हम अपने क्षेत्र में किसी और को घुसने नहीं देना चाहते। हम अपना ही वंश चलाना चाहते हैं। नर को मादा के पीछे भागना है। वो जंगल में भी होता है, वो शहर में भी होता है। तो बहुत अंतर थोड़े ही आ गया! अंतर बस ये है कि जो छटपटाहट हममें है, वो जंगल के जानवर में नहीं है।

तो हमारी जो मूल कामना ही है, वो है छटपटाहट से मुक्ति की। और हमारी छटपटाहट इतनी गहरी है कि वो हमसे न जाने कितने अपकृत्य करा लेती है — वही हिंसा है। हमारी जो भीतरी तड़प है, वही बाहर हिंसा बनकर अभिव्यक्त होती है। जो इंसान ख़ुद दुखी है, वो दूसरों को दुखी करेगा न!

बस यही हो रहा है।

प्र२: तो एनिमल इंस्टिंक्ट तो अभी भी है ही।

आचार्य: अभी भी है।

प्र२: शायद जानवरों से ज़्यादा है।

आचार्य: अभी भी है ही और बेईमानी ये हुई है कि चूँकि हम शहर में रहने लगे हैं, हमने ये सब बना लिया है, हम कपड़े-वपड़े पहन रहे हैं, हम सड़कों पर चलते हैं, तो हमारे लिए मानना और-और-और मुश्किल होता जा रहा है कि हम जानवर हैं। और जब तक हम ये मानेंगे नहीं कि हम जानवर हैं, तब तक हम उस जानवर का कोई इलाज भी नहीं कर पाएँगे। किसी बीमारी का इलाज हो सकता है अगर आप उसका डायग्नोसिस , निदान ही स्वीकार करने को तैयार न हों?

प्र२: लेकिन हमें कुछ ग़लत लगता ही नहीं है।

आचार्य: हमें लगता है हम बहुत बढ़िया हैं। बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया लोग हैं। ‘देखो, हम क्या-क्या कर लेते हैं। हम तो इतने अच्छे आदमी हैं।’

प्र१: तो उपचार क्या है? क्या जल्दी पहुँच गये उसपर?

आचार्य: नहीं-नहीं। मैंने जल्दी से उत्तर भी दे दिया।

वो जो जानवर है भीतर, वो यूँही नहीं बना हुआ है। हम उसको अपने कामों से रोज़-रोज़ ताक़त देते हैं। तो उस जानवर से मुक्ति पाने के लिए कोई नया, बड़ा काम नहीं करना होगा। आपने कहा न कि बहुत बड़ा काम है उससे तो डील (व्यवहार) करना। नहीं, ऐसा नहीं है। उससे मुक्ति पाने के लिए सबसे पहले कुछ काम रोकने होंगे; नये काम शुरू करने ज़रूरी नहीं हैं।

जो काम हम करे ही जा रहे हैं, वो सारे काम कौन कर रहा है? हमारे भेष में जानवर कर रहा है। उन कामों को रोकना होगा! और वो काम हम बहुत मेहनत से करते हैं। उन कामों को करने के लिए हम ज़िंदगीभर खटते हैं। तब वो काम साकार होते हैं। तब भी हो नहीं पाते हैं। कामनाएँ पूरी कहाँ होती हैं हमारी! और सारी कामनाएँ हमारी पशुता की कामना है।

जब आप ये समझ जाएँगे कि आप जिसको कहते हो अपनी कामना, अपनी हसरत, अपना उद्देश्य, अपना लक्ष्य; मैं ये हूँ, मुझे यहाँ जाना है, ये करना है — वो सब कुछ नहीं है, वो भीतर का जानवर है जो ये सब करवा रहा है, तो फिर आप उन सब चीज़ों में बहुत ज़ोर नहीं लगाओगे न! उन चीज़ों में ज़ोर लगाना ही हिंसा है और उन कामों से हाथ वापस खींच लेना ही अहिंसा है।

उदाहरण के लिए जंगल का जानवर जान लगा देता है कि कबीले पर राज करूँगा। ठीक है! भेड़ियों के एक ही दल के दो भेड़िये आपस में लड़ मरते हैं, क्यों? क्योंकि सरदार दोनों को बनना है। सरदार हमें भी बनना होता है और उसके लिए ज़िंदगी में कितनी मेहनत करते हैं!

एक बार आप समझ जाएँ कि ये भीतर का भेड़िया है जो ये सबकुछ कर रहा है, आप अपनी मेहनत रोक देंगे न! जीवन में थोड़ी शान्ति आएगी। क्योंकि अगर आप भेड़ियों के सरदार बन भी गये, तो रहे तो भेड़िये ही। क्या मिल जाना है उससे!

यही सब काम इन पर लागू होते हैं कि भाई, मुझे और पैसा कमाना है, मुझे इतना बड़ा घर बनाना है, मुझे अपना नाम बरक़रार रखना है। ये सारे काम हमसे हमारा जानवर करा रहा है और हम ये काम करने के लिए बहुत खट रहे हैं। हमारा खून-पसीना एक हो गया है भीतर के जानवर को समर्थन देते-देते।

प्र३: पर इसका परिणाम बहुत अच्छा भी है। इंसान ने जंगल से आकर कितनी प्रगति की है! अगर ये खालीपन, ये बेचैनी नहीं होती हममें, तो शायद हम इतना कुछ करते ही नहीं जितना कर रहे हैं। ये टेक्नोलॉजी (तकनीक), इन्होंने न्यूक्लियर कहा, न्यूक्लियर के अपने फ़ायदे भी हैं — सूरज की जो अन्दर की ताक़त है वो हमने समझा। फ्यूज़न-फ़िशन (संलयन-विखंडन) को समझना और इस्तेमाल भी कर रहे हैं। अगर खालीपन, बेचैनी नहीं होती, तो हम करते ये?

आचार्य: तो ये सब हमने आपके अनुसार, जैसा आप बोल रहे हो, इसीलिए किया है क्योंकि बेचैनी थी। तो हमने जो भी कुछ करा है ये सार्थक भी एक ही शर्त में माना जाता है कि बेचैनी कुछ कम होती।

प्र३: लेकिन बेचैनी से अच्छे काम भी हो सकते हैं और बुरे भी हो सकते हैं।

आचार्य: अरे! भाई, थमिए पहले। कोई काम आप इसलिए कर रहे हो क्योंकि बेचैनी है। तो उस काम को सफल सिर्फ़ एक शर्त में माना जा सकता है कि बेचैनी हट गयी। हट गयी?

प्र३: नहीं, बेचैनी हटती नहीं।

आचार्य: तो कहाँ से सार्थक हो गया काम! आपने इतनी शताब्दियों तक श्रम करा है और जिस बेचैनी के कारण श्रम करा है वो बेचैनी यथावत है, बल्कि और बढ़ गयी है। आदमी आज मानसिक रूप से जितना बीमार है उतना तो कभी नहीं था। तो बेचैनी से आपने बहुत मेहनत करी और वो मेहनत करके बेचैनी और बढ़ा ली। ये आपकी सफलता है?

प्र३: सर, कार्य प्रगति पर है बोलें तो?

आचार्य: वो जो वर्क इन प्रोग्रेस है, वो किस दिशा में जा रहा है? बेचैनी तो बढ़ ही रही है न! एक प्रतिशत भी कम हुई है क्या?

प्र२: तो एक साधारण इंसान को कैसे जीना चाहिए?

आचार्य: रुकिए, रुकिए! अभी पहले समझें तो जी कैसे रहा है। फ़िलहाल कैसे जी रहा है पहले ये तो देख लें। अभी और आगे आते हैं। आपने जो बातें की थीं वो भौतिक तल की थीं, मटीरियल (भौतिक) तल की थीं। न्यूक्लियर एनर्जी मिल गयी है, ये हो गया मटीरियल प्रोग्रेस (भौतिक विकास)। आप जब मटीरियल प्रोग्रेस देखते हो, तो आप अकाउंटिंग (लेखा-जोखा) ठीक से नहीं कर रहे हैं। सारी जो वहाँ समस्या है न वो अकाउंटिंग की है।

आप अपनी कंपनी का या अपनी संस्था का पीएनएल बनाते होंगे — प्रॉफिट एंड लॉस (लाभ और हानि)। आप बैलेंसशीट (चिट्ठा) बनाते होंगे। प्रॉफिट एंड लॉस में आप सिर्फ़ रेवेन्यूज़ (आय) लिखते हैं या खर्चे भी लिखते हैं? और कोई ऐसा है जो सिर्फ़ रेवेन्यू लिखे, खर्चे लिखे ही न, उसको आप क्या कहेंगे?

अकाउंटिंग हुआ ही नहीं। और वो पगला है, वो अपनेआप को झाँसे में रखना चाहता है कि मैं तो बड़े मुनाफ़े में हूँ। इसी तरीक़े से आप कंपनी का बैलेंसशीट बनाएँ, उसमें आप एसेट्स (संपत्ति) दिखायें; लाइबिलिटीज़ (दायित्व) आप दिखायें ही नहीं कितनी खड़ी कर रखी हैं। बैंक का आपके ऊपर दस करोड़ का कर्ज़ा है, वो आप दिखा ही नहीं रहे। आप बस ये दिखा रहे हो, ‘देखो, मेरे एसेट्स कितने हैं।’ तो ये आपने क्या करा अपने साथ?

तो आप पूरी मानवता को एक ऑर्गेनाइज़ेशन (संगठन) मान लीजिए और ज़रा अपना पीएनएल और बैलेंसशीट बना लीजिए और बताइए कि एसेट्स आपने बढ़ायी हैं या लाइबिलिटीज़ खड़ी करी हैं ज़्यादा? आपका रेवेन्यू ज़्यादा है या आपकी कॉस्ट (लागत) ज़्यादा है?

बस ये है कि आपको कॉस्ट अकाउंटिंग (आय-व्यय लेखांकन) करनी आती नहीं है। तो आपको लग रहा है कि साहब, हमने तो पिछले दस हज़ार साल में जो काम करा है, ये जो ह्यूमन कंपनी (मानव) ने जो काम करा है, जिसका मैं हिस्सा हूँ, मैं उसमें एक स्टेक होल्डर (हित धारक) हूँ — वर्कर (कार्यकर्ता) भी हूँ, स्टेक होल्डर भी हूँ। हमने जो काम करा है वो बहुत मुनाफ़े का काम रहा है।

सिर्फ़ इसलिए लग रहा है मुनाफ़े का क्योंकि अकाउंटिंग नहीं कर रहे हैं ठीक से हम।

मैं बात कर रहा था कि जिस होटल में हूँ, ठीक उसके सामने वहाँ पर समुद्र है। मैं कह रहा था औसत डेढ़ डिग्री तो तापमान बढ़ ही चुका है। अभी जब भी तीन-चार डिग्री बढ़ेगा तो ये होटल भी नहीं बचेगा — जुहु पर है। और उसके सामने वो सड़क है, वो सड़क लगभग समुद्र तल पर है। जैसे ही पानी बढ़ेगा वो होटल भी जाएगा, वो सड़क भी जाएगी।

ठीक है?

वहाँ पर आपको बनाना पड़ेगा एक बहुत ऊँचा और मज़बूत एम्बैंकमेंट (तटबंध)। क्या आपने अपनी अकाउंटिंग में इस कॉस्ट को शामिल करा है? आप रेवेन्यू शामिल कर रहे हो, कॉस्ट तो शामिल कर ही नहीं कर रहे। और मैं मटीरियल कॉस्ट की बात कर रहा हूँ अभी; जो उसकी इन्टेंजिबल कॉस्ट है, जो आंतरिक कॉस्ट है, उसपर बाद में आएँगे। पहले जो उसकी मटीरियल कॉस्ट है, क्या हम उसको भी शामिल कर रहे हैं?

क्या हमें पता भी है कि हमने कितना पाया है, कितना खोया है प्योरली मटीरियल टर्म्स में (शुद्ध भौतिक रूप में)! हमें वो भी नहीं पता है। उदाहरण के लिए, दो सौ अस्सी पीपीएम से बढ़कर कार्बन डाईऑक्साइड साढ़े चार सौ पीपीएम हो गयी है। ये मटीरियल बात है न बिलकुल? इसकी कोई अकाउंटिंग होती है किसी कंपनी की बैलेंसशीट में या किसी नेशन (राष्ट्र) के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में?

आपने जो तरक़्क़ी करी उस तरक़्क़ी में आपने इतना कार्बन वातावरण में उत्सर्जित कर दिया। पर आप जब अपना जीडीपी बताते हो कि मेरा जीडीपी इतना हो गया है और इतने प्रतिशत की उसमें बढ़ोतरी है, उसमें कहीं बताते हो कि उसकी इनवायरमेंटल कॉस्ट (वातावरणीय लागत) क्या है?

नहीं बताते न?

आप कहते हो, ‘मैंने ये कर लिया।’ बाज़ार में इतनी सारी चीज़ें आ गयी हैं। ये आ गया बाज़ार में (पानी का गिलास दिखाते हुए)। आप जब इसकी क़ीमत देते हो बाज़ार में, उसमें कहीं आपसे पूछा जाता है कि इसको बनाने में जितना आपने दुनिया को बर्बाद करा है उसका भी तो टैक्स (कर) दे दो? जबकि इसकी क़ीमत में दुनिया की बर्बादी शामिल है। या नहीं शामिल है? और मैं दुनिया की इन्टेंजिबल बर्बादी की, आंतरिक बर्बादी की बात नहीं कर रहा, मैं मटीरियल डिप्लीशन (भौतिक ह्रास) की बात कर रहा हूँ। हम क्या उन मटीरियल कॉस्ट्स की भी अकाउंटिंग कर रहे हैं?

तो एक तो ये बात हुई कि आप जो ये पूरी व्यवस्था चला रहे हो, वो नीचे से क्या लेती है? रॉ मटीरियल (कच्चा माल)। रॉ मटीरियल की आप कोई अकाउंटिंग कर ही नहीं रहे। पृथ्वी को आपने पूरा ख़त्म कर दिया; आम आदमी की कामनाओं को पूरा करने के लिए क्या पृथ्वी के पास संसाधन हैं?

प्र२: हाँ।

आचार्य: नहीं हैं। अरे! कहाँ से हैं?

प्र२: माने जो जीने के लिए चाहिए, वो है।

आचार्य: आपके पास हैं, जितने लोग हैं दुनिया में सब आपके ही स्तर पर जीना शुरू कर दें तो दस पृथ्वियाँ चाहिए होंगी। आबादी की भी बात नहीं है। हमारा एक स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग (जीने का स्तर) है, स्टैंडर्ड ऑफ कंज़म्प्शन (उपभोग का स्तर) है जो कि औसत से बहुत ऊपर का है।

हम यहाँ जो चार लोग बैठे हैं, भारत में ही हम औसत से बहुत ऊपर का उपभोग, कंज़म्प्शन करते हैं। भारत की पूरी आबादी सिर्फ़ उतना कंज़म्प्शन शुरू कर दे जितना कि हम लोग करते हैं तो क्या पृथ्वी के पास उतना संसाधन है?

और भारत की आबादी ‘प्रति व्यक्ति’, ’पर कैपिटा’ , उतना कंज़म्प्शन शुरू कर दे जितना औसत एक अमेरिका का व्यक्ति करता है तो सत्रह पृथ्वियाँ चाहिए होंगी। तो आप जो अपनी कंपनी चला रहे हो ’द ह्यूमन कंपनी’ , उसको तो रॉ मटीरियल की सप्लाई (आपूर्ति) ही नहीं हो सकती। क्योंकि एक के बाद दूसरी पृथ्वी तो है नहीं कोई आपके पास, आप रॉ मटीरियल कहाँ से लाओगे अपनी कंपनी चलाने के लिए?

तो पहली बात तो रॉ मटीरियल नहीं है। दूसरी बात, जो आउटपुट निकल रहा है उसमें आपका जो डिज़ायर्ड गोल (अपेक्षित लक्ष्य) था, वो था बेचैनी से मुक्ति, वो तो मिली ही नहीं। (मुस्कुराते हुए) इनपुट के तौर पर आप सब खा गये और आउटपुट आपका कुछ निकला नहीं!

ये जो हमने मशीन बनायी है द ह्यूमन मशीन , द ह्यूमन कंपनी , वो एक ऐसी मशीन है जो सारी मटीरियल चीज़ें खाये जा रही है। सब नष्ट कर दिया — जंगल खा गयी, सारे संसाधन खा गयी, मिनरल्स खा गयी, जानवर खा गयी, सब खा गयी। समुद्रों को खा लिया, पहाड़ों को खा लिया, नदियों को खा लिया। जो कुछ भी मटीरियल था, सब खा लिया हमारी ह्यूमन मशीन ने।

आउटपुट क्या दिया है? और ज़्यादा बेचैनी।

हम कितने स्मार्ट लोग हैं! हम कितने स्मार्ट लोग हैं! इनपुट में क्या करा? पूरी पृथ्वी को खा लिया। यही करा है न हमारी ह्यूमन मशीन ने पिछले दस हज़ार साल में कि सारा रॉ मटीरियल खा लिया और बर्बाद कर दिया सब। कुछ नहीं छोड़ा। रेत तक खा गयी। नदी किनारे की रेत तक हमने खा ली। ठीक?

कुछ नहीं छोड़ा। और आउटपुट में हमें चाहिए क्या था? कि यार थोड़ा चैन मिल जाए; वो भी नहीं मिला। ज़बरदस्त लोग हैं कि नहीं!

प्र२: और बेचैन हो गये। और हम ज़्यादा एम्बिशियस (महत्वाकांक्षी) ही होते जा रहे हैं।

आचार्य: और हमारी एम्बिशन (महत्वाकांक्षा) को पूरा करने के लिए पृथ्वी के पास संसाधन ही नहीं है। एम्बिशन होगी कहाँ से पूरी! और वो सारे संसाधन आप खा भी लें, मान लीजिए, कर लीजिए इस्तेमाल सारे संसाधनों का, तो भी क्या वो एम्बिशन पूरी हो पाती है?

जिन्होंने सारे संसाधनों का कर डाला उपभोग, उनको कितना चैन मिल गया है? और ऐसा नहीं है कि वो चैन मिल नहीं सकता। एक रिटोरिकल (शब्दाडंबर पूर्ण) बात नहीं है कि चैन तो साहब, ऐसी चीज़ है किसी को मयस्सर नहीं होता। हम शायरी नहीं कर रहे हैं। चैन मिल सकता है। बस, वैसे नहीं मिल सकता जैसे हमने सोचा है कि मिलेगा।

प्र१: जैसे अब तक करते आये हैं।

आचार्य: जैसे अब तक करते आये हैं, बिलकुल। ये तो चुनाव की बात है कि सचमुच चाहिए कि नहीं। वेदान्त इसको माया कहता है। आपको जो सचमुच चाहिए आप उसी से सबसे ज़्यादा डरते हो। जो चीज़ आपको शान्त करती है वही चीज़ आपको लगता है कि आपको ख़त्म करती है। तो शान्ति मिलती है ख़ात्मे के साथ ही, एक तरीक़े के अंदरूनी ख़ात्मे के साथ ही। और ख़ात्मे से हम बहुत डरते हैं, तो इसलिए शान्ति भी हमें नहीं मिलती।

प्र२: लेकिन हम वो पहचान ही नहीं पाते हैं।

आचार्य: शान्ति नहीं पहचान पाये, कोई बात नहीं। अशान्ति क्यों नहीं पहचानते?

प्र२: लेकिन अशान्ति किस कारण हो रही है?

आचार्य: हो रही है, ये तो पहचानें। हम तो जब अशान्त होते हैं तो भी ऐसे दिखाते हैं कि वाह! सब बढ़िया चल रहा है। चिल ! कूल !

प्र३: आप कहते हैं कि मैं नहीं करूँ, ख़त्म कर दूँ, फिर क्या करूँ? फिर मेरी पहचान क्या है? यानी मेरी पूरी पहचान ही मेरा ये जो काम है, ये जो मैंने किया है आज तक, आप कहेंगे ख़त्म कर दो। ख़त्म करके फिर क्या करूँ?

आचार्य: सामने कुछ रखा हुआ है, उसमें भारी मिर्च डली हुई है, ज़हर जैसी भारी। और वो मुँह में ले ली है और मुँह पूरा जल रहा है। कोई आकर कह रहा है, ‘उसको थूको और पानी पियो।’ तो क्या आप पूछेंगे कि यदि इसको थूक दिया तो खाऊँगा क्या?

प्र१: नहीं, आपको तो शान्ति चाहिए उससे।

आचार्य: इससे तो छुटकारा लो न, फिर देखेंगे कि क्या करना है। और इसको अगर मुँह में रखा है, तो मुँह ही नहीं दिमाग़ भी जल रहा है। और जलते दिमाग़ के साथ तो मैं बिलकुल नहीं जान पाऊँगा कि खाने के लिए कहाँ और कुछ मिल सकता है। और क्या मिल सकता है खाने के लिए, वो जानने के लिए भी पहले इसे थूकना पड़ेगा। इसको थूकूँगा तो दिमाग़ थोड़ा शान्त होगा। तो मैं जान पाऊँगा कि कहाँ क्या मिल रहा है।

प्र३: नहीं मिला तो?

आचार्य: ‘नहीं मिला तो?’— ये प्रश्न जलते हुए दिमाग़ का है। थूक दीजिए, फिर शायद ये प्रश्न भी शान्त हो जाए।

प्र१: शायद पानी में ही?

आचार्य: देखिए, सोचिए न, मैं बैठा हुआ हूँ, मैं जानवर, मैं हूँ वनमानुष और मैंने मुँह में मिर्च इतनी भर रखी है।

प्र३: ये उल्का हैं। इनकी पहचान, इनका काम ये इंडस्ट्री (उद्योग) में है। बंद कर दें, रुक जाएँ, फिर?

आचार्य: देखिए, आप जिस इंडस्ट्री में हैं वो लोगों को प्रदर्शित करती है कि जीवन क्या है, कैसा है। ठीक है न? आप ज़िंदगी का एक ख़ाका खींचते हैं लोगों के सामने। कहानियाँ, किरदार, टीवी, सिनेमा, ये आपका काम है। अब आप ऐसी भी चीज़ लोगों को दिखा सकते हो जिससे उनको तात्कालिक मनोरंजन मिलता है। और ठीक है वो अपना थोड़ी देर के लिए उनको लगता है कि कुछ मिला और फिर वही “ढाक के तीन पात”। बल्कि स्थिति पहले से भी बदहाल!

और आप कुछ उन्हें ऐसा भी दे सकते हो जो थोड़ा स्थायित्व रखता है, जिसमें शाश्वतता है, जो उनके सचमुच काम आएगा। और भूलिए नहीं कि आदमी, हर आदमी, चाह कुछ ऐसा ही रहा है जो सचमुच उसके काम आये।

तो मैं तो ये पूछ रहा हूँ कि व्यापारिक तौर पर भी, अगर आप ये भी देखें कि आपकी फ़िल्म या आपका टीवी सीरियल कितना मुनाफ़ा कमाएगा, व्यापारिक तौर पर भी सबसे अच्छा काम क्या है, सबसे अच्छा पेशा क्या हुआ?

आपकी भी गहन प्यास, शान्ति की, मुक्ति की, बोध की है। और जो चीज़ आपको जितनी शिद्दत से चाहिए होती है आप उसके पीछे उतना भागोगे न? उसकी माँग उतनी ज़्यादा करोगे न? अगर मैं उस माँग को पूरा कर पाऊँ, व्यापार के तौर पर भी, तो वो व्यापार अच्छा चलेगा कि नहीं चलेगा?

तो ये थोड़े ही बात है कि आप जो काम कर रही हैं, उसको बंद करना है। बस, उस काम को सही करना है। बल्कि आपके काम में तो अपार संभावना है कि ज़िंदगी का जो असली ख़ाका है वो खींच दिया जाए, हक़ीक़त बिलकुल बयान कर दी जाए। लेकिन चीज़ें दोनों हो सकती हैं। रजत पटल पर आप उनको सच्चाई भी बता सकते हैं और सच्चाई से उनको बहुत दूर ख़्वाबों की दुनिया में भी ले जा सकते हैं।

दुर्भाग्य यही है कि निन्यानवे प्रतिशत जो प्रोडक्शन (उत्पादन) होता है वो तो इसीलिए होता है कि आपको आपकी ज़िंदगी के तथ्यों से और दूर किसी रूमानी, फंतासी (कल्पना) की दुनिया में ले जाया जाए जहाँ पर थोड़ी देर के लिए आप ऐसे हो जाएँ कि वाह! क्या बढ़िया परीकथा चल रही है। देख लो, मस्त हो जाओ, खा-पी के वापस आ जाओ। उससे क्या मिलना है? थोड़ी देर के लिए लगता है मुनाफ़ा हो गया; मुनाफ़ा नहीं होता, घाटा ही होता है।

प्र१: तो आप अपनी भी (बेचैनी) बढ़ा रहे हैं और सबकी बढ़ा रहे हैं।

आचार्य: बहुत बढ़िया! घाटा सिर्फ़ दर्शक को ही नहीं हो रहा है। घाटा उसके अभिनेताओं को भी हो रहा है, निर्माता को भी हो रहा है, निर्देशक को भी हो रहा है। बस हमें पीएनएल बनाना नहीं आता तो हमें समझ में नहीं आता कि घाटा हुआ है। सोचिए, एक बैंक हो जिसको अपना पीएनएल बनाना नहीं आता। ठीक है?

प्र१: क्योंकि हमें नहीं पता कि अब इस मिर्च के अलावा क्या खाना है।

आचार्य: वो इसलिए नहीं पता क्योंकि मुँह में मिर्च भरी हुई है। मुँह में से मिर्च थूकिए, सब पता चल जाएगा। थूकना ज़रूरी है। उसके लिए थोड़ी श्रद्धा रखिए कि थूक देंगे फिर कुछ अच्छा हो जाएगा।

प्र२: लेकिन वो एक शारीरिक पीड़ा है। उसमें रिस्पोंस (प्रत्युत्तर) तुरन्त आता है। जबकि आप जो कह रहे हैं वो एक आध्यात्मिक तल है। वो सबको नहीं आता है।

आचार्य: ऐसा कैसे है? अभी आप मुझे कोई अपशब्द बोल दें।

प्र२: सिखाया है।

आचार्य: नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है। आप मुझे अभी कोई अपशब्द बोल दें, तुरन्त यहाँ (मन पर) चोट लगती है या नहीं लगती है? लगती है नहीं लगती है?

आप किसी के घर जाएँ, वो आपके लिए खड़ा न हो, आपको पानी न पूछे, तुरन्त चोट लगती है या नहीं लगती है? तो ऐसा थोड़े ही है कि मुँह में मिर्ची आएगी तभी चोट लगेगी। जो इन्टेंजिबल चीज़ें होती हैं वो भी हमें चोट तो बराबर की देती हैं, तत्काल देती हैं। तो वो बात नहीं है।

प्र१: न निर्णय कर पा रहे हैं, न समझ पा रहे हैं; बौखला गये हैं।

आचार्य: हम बढ़ रहे हैं एक विस्फोट की तरफ़। जैसे बबल (बुलबुला) बनता है न पहले एक अर्थव्यवस्था में और फिर फटता है। वो बबल भी कैसे बना था? आप दो हज़ार आठ का याद करिए, जो इकॉनमिक कैटेस्ट्रॉफी (आर्थिक तबाही) हुई थी, वो पूरी क्या थी?

यही तो थी कि आप जिन चीज़ों को अपना एसेट गिन रहे थे वो आपके एसेट थे ही नहीं, वो फ़िक्टीशियस (काल्पनिक) थे। लाइबिलिटी आपकी खड़ी हुई थी, उनकी ओर आप ठीक से देख नहीं रहे थे। अपनेआप को धोखा दिये हुए थे कि साहब, मेरा बैंक तो बहुत मुनाफ़े में चल रहा है। और एक दिन आ करके सच्चाई आपको झटका देती है। आपको पता चलता है आपने इतने सालों तक सिर्फ़ और सिर्फ़ नुक़सान कमाया है।

तो वहाँ तो चलिए बस अर्थव्यवस्था की बात थी, कुछ बैंक दिवालिया हो गये, बच गये। यहाँ तो पूरी पृथ्वी दिवालिया है। और यहाँ सबको यही लग रहा है कि हम बहुत होशियार लोग हैं और मुनाफ़े का काम कर रहे हैं। हर आदमी घाटे का काम कर रहा है।

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=kw5sQvT3t90

GET EMAIL UPDATES
Receive handpicked articles, quotes and videos of Acharya Prashant regularly.
View All Articles