इन तीन तरह के लोगों का भरोसा बिल्कुल मत करना || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

आचार्य प्रशान्त ज़्यादातर लोग, सभी लोग बहुत सारे लोग होते हैं। एक व्यक्ति बहुत सारे चेहरे रखता है। इसी बात का प्रतिनिधि दशानन है, अपने दस सिरों के साथ।
तो हर इंसान के भीतर बहुत-बहुत सारे हिस्से होते हैं। ये बात तुम्हें उसके चेहरे से पता नहीं चलेगी, क्योंकि चेहरा तो एक ही होता है। तुम्हें लगता है तुम एक इंसान से बात कर रहे हो; सुबह तुमने बात करी उससे और शाम को बात करी, तुम्हें लगता है तुम उसी व्यक्ति से बात कर रहे हो। क्यों? क्योंकि उसका चेहरा तो वही था न, उसकी फ़ोटो खींचोगे कैमरे से तो वही फ़ोटो आएगी, तो तुम्हें लगता है उसी इंसान से बात कर रहे हो। जबकि हक़ीक़त ये है कि भीतर-ही-भीतर उसका चेहरा बदल चुका है, वो भीतर से बिलकुल दूसरा इंसान हो चुका है।
पर हमारे पास वो आँखें नहीं हैं जो उसके भीतर के बदले हुए चेहरे को देख लें, तो हम इस भ्रम में रह जाते हैं कि हमने सुबह जिससे बात करी थी, शाम को भी उसी से बात कर रहे हैं। शाम को इंसान दूसरा है। फिर हमें धोखा हो जाता है; वहाँ दुख है, वहाँ पीड़ा है, वहाँ फिर जैसे जीना बेस्वाद हो गया, मज़ा एकदम किरकिरा हो गया। और तुम सोच में पड़े हो, तुम चौंक गये हो, तुम्हें किसी ने उठाकर पटक दिया है - 'ये क्या हो गया मेरे साथ!’
ये न हो तुम्हारे साथ, इसलिए ऐसे पर टिकना मत, ऐसे का भरोसा करना मत जिसके एक नहीं, बहुत सारे केंद्र हों। जिसको संचालित करने वाले, जिस पर मालिकाना हक़ रखने वाले, जिस पर प्रभाव रखने वाले कई स्रोत हों, ऐसे का भरोसा मत कर लेना, क्योंकि उसका चेहरा बदल जाएगा तुरंत; उसके एक चेहरे का मालिक एक है, उसके दूसरे चेहरे का मालिक दूसरा है। और जब भी दो मालिक होंगे, दो चेहरे होंगे।
समझ में आ रही है बात?
और हममें से ज़्यादातर लोगों के बहुत सारे मालिक होते हैं, बहुत सारे चेहरे होते हैं। इसीलिए हम दूसरों को शरण तो क्या देंगे, हम स्वयं को शरण देने लायक भी नहीं होते; हम दूसरों को सलाह तो क्या देंगे, हम स्वयं को सलाह देने लायक नहीं होते; हम दूसरों को रोशनी क्या देंगे, हम ख़ुद को रोशनी देने लायक नहीं होते।



