प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। हिंदी से ही मेरा प्रश्न है। हिंदी की जो दुर्दशा देश में हो रही है, कहीं-न-कहीं मुझे लगता है कि इसके जो ज़िम्मेवार हैं वो विद्यालय भी हैं, या विद्यालय ही हैं। एक हिंदी के सब्जेक्ट (विषय) को छोड़ कर बाकी सभी सब्जेक्ट के पाठ्यक्रम इंग्लिश भाषा में हैं, और कहीं-न-कहीं बच्चों को प्रेरित किया जा रहा है इंग्लिश में बातें करने के लिए, कि ताकि..।
आचार्य प्रशांत: विद्यालय इस समस्या के मूल में नही हैं; इसके मूल में हैं वो लोग जिन्होंने आज़ादी के बाद से ही हिंदी को हाशिये पर ढकेल दिया।
देखो, धूमिल की पंक्तियाँ हैं, उनसे बात समझ जाओगे — "आज मैं तुम्हें वो सत्य बताता हूँ जिसके आगे हर सच्चाई छोटी है, इस दुनिया में भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क सिर्फ़ रोटी है।"
तुमने हिंदी को रोटी से काट दिया, तुमने छोटे-से-छोटे रोज़गार के लिए अंग्रेज़ी अनिवार्य कर दी, तो लोग कह रहे हैं कि “जब हिंदी से हमें रोटी मिल ही नहीं सकती, तो हिंदी का करें क्या?” आज तुम स्थितियाँ ऐसी बना दो, कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई, मेडिकल की पढ़ाई हिंदी में हो सकती है, सब किताबें हिंदी में उपलब्ध रहेंगी, और बाकी सब भारतीय भाषाओं में भी, लोग नहीं जाएँगे अंग्रेज़ी की ओर। ये सब तो बेकार के तर्क होते हैं, कि “अंग्रेज़ी इंटरनेशनल भाषा है,” ये सब..। अंग्रेज़ी इंटरनेशनल भाषा है ये बात वो बोल रहे हैं जिनकी सात पुश्तों में कोई इंटरनेशनल नहीं गया, न आने वाली सात पुश्तों में कोई इंटरनेशनल जाएगा; इंटरनेशनल छोड़ दो, वो एयरपोर्ट के आस-पास भी नहीं फटकने वाले। पर वो कहते हैं, “अंग्रेज़ी हम इसलिए सीख रहे हैं क्योंकि ये इंटरनेशनल भाषा है;” तुम करोगे क्या इंटरनेशनल भाषा का, रहना तुम्हें यहाँ देश में है।




