प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। दो-हजार ग्यारह से धार्मिक पुस्तकें पढ़ने का मन करने लगा था। अर्थ समझ नहीं आया, तो यूट्यूब पर सर्च किया। विद्वानों द्वारा अर्थ किए गए अर्थ सुनती रही। सिख धर्म से होने के कारण पहले तो दो साल वही सुना। फ़िर जो भी सामने आता, वही सुनने लगती। अब एक साल से आपको सुन रही हूँ। अब परिवार में भी मन नहीं लगता, क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: यह मत कहिए कि परिवार में या संसार में मन नहीं लगता। यह कहिए कि जैसा हमने परिवार बना रखा है, उसमें नहीं लगता मन। और जैसा हमने अपने चारों ओर संसार रच रखा है, उसमें नहीं लगता मन।
परिवार-संसार से हटकर कहाँ जाएँगे? एक परिवार छोड़ भी दिया, तो किसी दूसरे तरह का कोई और परिवार बन ही जाएगा। और अगर हम आंतरिक रूप से वैसे ही हैं जैसे हमेशा से थे, तो पहले परिवार में जो दोष थे वह दूसरे परिवार में भी मौजूद रहेंगे-ही-रहेंगे।
हम थोड़ी देर पहले कह रहे थे न, क्या? सदा अपनी ओर देखना है। जैसा परिवार हमारा बना हुआ है, क्या अचानक बन गया? हाँ, हमारी रुचि अध्यात्म की ओर हो गई पिछले कुछ सालों में, पर उससे पहले हम भी तो बहुत कुछ उन्हीं के जैसे थे न, जो हमें अब भाते नहीं? है न?
किसी वजह से हमारी राह थोड़ी मुड़ गई, हमें कुछ बातें दिखाई देने लग गईं; उनको अभी तक दिखाई नहीं दे रही। बल्कि जिन्हें दिखाई नहीं दे रही हैं, वह चकित रहते होंगे कि यह भी तो अभी दस साल पहले तक हमारे ही जैसी थी। अब यह बहकी-बहकी बातें करती है।
परिवार में यदि आप हैं, तो यह साफ़ समझ लीजिए की पहली कोशिश आपकी, और पुरज़ोर कोशिश आपकी होनी चाहिए परिवार को बदलने की, छोड़ने की नहीं। अध्यात्म प्रेम और करुणा की बात है। यह छोडा-छाड़ी, तत्काल त्याग, यह सब नहीं।




