आचार्य प्रशांत: मीडिया हो, राजनीतिक व्यवस्था हो, न्यायिक व्यवस्था हो, शैक्षणिक व्यवस्था हो, पारिवारिक व्यवस्था हो, सामाजिक व्यवस्था हो, हमारे जितनी संस्थाएँ हैं, ये जितने इंस्टीट्यूशन्स (संस्था) हैं हमारे, इनके कोई बहुत ऊँचे उद्देश्य नहीं हैं। आप ये नहीं कह पाएँगे कि हमारी शैक्षणिक व्यवस्था इसलिए है कि मनुष्य में करुणा का विकास हो और मनुष्य या जो बच्चे, छात्र वहाँ से निकल रहे हैं वो अंततः मुक्ति को प्राप्त हों, ऐसा नहीं है।
उसी तरीक़े से जो आपकी आर्थिक व्यवस्था चल रही है, इसका उद्देश्य आपको बोध इत्यादि की गहराई देना नहीं है। इसका भी उद्देश्य यही है कि भई ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग खायें-पियें, मौज करें।
राजनीति भी हमारी इसलिए नहीं है कि राजनीति के फलस्वरूप देश में उच्चतर मूल्यों की स्थापना हो। राजनीति भी इसलिए है कि कुछ लोगों के हाथ में सत्ता, ताक़त आ जाए और वो राज करें। या कि एक वर्ग होता है वो चाहता है कि उसका प्रतिनिधि दिल्ली में बैठ जाए। तो वही सामुदायिक, सांप्रदायिक, कबिलाई बात; कोई ऊँची बात नहीं।
तो ऐसे करके हमारी सारी व्यवस्थाएँ चल रही हैं। और आदमी के भीतर जो निचले केंद्र हैं, जो निचली वृत्तियाँ हैं, उन्होंने ही तमाम संस्थाओं की, माने जो इंस्टीट्यूशन्स हैं, और व्यवस्थाओं की शक्ल ले ली हैं।
जैसे जानवर भोग करना चाहता है, वैसे ही सब व्यवस्थाएँ चल रही हैं भोग कराने के लिए। अब जानवर में और मनुष्य में एक अंतर यह है कि जानवर की भोग की इच्छा प्रकृति द्वारा निर्धारित होती है और इसलिए सीमित होती है। कोई भी जानवर असीमित भोग नहीं करना चाहता। उसको भोगना है पर प्रकृति ने उसको जो सीमाएँ दे दी हैं उसके भीतर।




