प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि भगत सिंह की तरह हम कोई क्रांति लाने के बारे में क्यों नहीं सोच पाते?
आचार्य प्रशांत: तुम जिस ज़िंदगी की ओर बढ़ रहे हो वो भगत सिंह की है या चुन्नीलाल की? जल्दी बोलो! ये तो अजीब बात है! किताबों में भगत सिंह को पढ़ रहे हो। जब चुन्नीलाल जैसी ज़िंदगी जीनी थी, तो किताबों में भी चुन्नीलाल को ही पढ़ा होता! तो ये तो हो गया न अब बड़ा पाखंड हो गया। और ये तय सबने कर रखा होता है और माँ-बाप ने तो पूरा ही तय कर रखा होता है। माँ-बाप को पता चल जाए कि लड़का भगत सिंह की तरफ़ जा रहा है, तुरन्त छाती पीटने लगेंगे।
दुनिया में इतनी मूर्खता फैली हुई है, इतना अन्याय है, इतना अत्याचार है, पागलों ने आग लगा दी है दुनिया में! तुम बस किसी मजबूरी तले अपनेआप को दबा मत लेना। विद्रोह तो कर ही दोगे। क्योंकि जो सब चल रहा है दुनिया में वो एकदम प्रत्यक्ष और स्पष्ट है। विद्रोह तो कर ही दोगे। पर कोई करता नहीं। क्यों? क्योंकि सब अपनेआप को मजबूरियों तले दबा लेते हैं। एक बार दब गये तो अब क्या विद्रोह करोगे! वो मत करना बस!
दस-दस साल सरकारी नौकरी की तैयारी चल रही है। ये आदमी कौनसी महानता हासिल करेगा, बताओ। कि करेगा? जिन रास्तों से कोई लेना-देना नहीं उन पर चल पड़े हैं। कहीं भी वेकेन्सी (भर्ती) निकल रही है खट से उसका फॉर्म भरे दे रहे हैं। मछली-पालन में फॉर्म भर दिया, मुर्गी-पालन में फॉर्म भर दिया। सरकारी नौकरियाँ इन सब की भी निकलती हैं — मत्स्य-पालन और कुक्कुट-पालन।
या प्राइवेट (निजी) में चले गये। वहाँ कुछ भी है — जाओ, क्रेडिट कार्ड बेचो! वो बेच रहे हैं। तब एक पल को याद नहीं आता कि जिन लोगों की कहानियाँ बचपन में पढ़ी थीं क्या उन्होंने ये रास्ते चुने थे? बोलो! और कुछ नहीं तो पचास-सौ महान लोगों को तो तुम सभी जानते होगे। ठीक? उन्होंने क्या ये रास्ते चुने थे जो सब टिंकूलाल चुनते हैं?




