प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे अपनी मृत्यु से बहुत डर लगता है, इसी कारण गंगा में भी स्नान नहीं कर पाया हूँ। कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: शारीरिक मृत्यु का खौफ़ जाता रहता है, जब वो तुम्हारे भीतर मर जाता है जो नाहक ही ज़िन्दा रहने का स्वांग करता है। समझना बात को। शारीरिक मृत्यु का डर नहीं है तुमको। घर के भीतर अगर तुम न हो तो घर में आग लगने से डरोगे क्या? घर है तुम्हारा।
शरीर के मिटने को लेकर इसीलिए चिन्तित रहते हो, क्योंकि तुम शरीर के भीतर घुसे बैठे हो। आवश्यक नहीं है शरीर के भीतर अवस्थित रहना। जब तक तुम शरीर के साथ जुड़े ही बैठे रहोगे, तब तक शरीर की मृत्यु तुम्हें अपनी मृत्यु लगेगी। जब तक तुम शरीर से जुड़े बैठे रहोगे, तब तक शरीर की मौत तुम्हें अपनी मौत लगेगी। शरीर से जुड़ो मत, फिर शरीर की मौत से घबराओगे भी नहीं।
प्र: शरीर में रहकर शरीर के पार का हमको तो कोई अनुभव नहीं है।
आचार्य: नहीं, शरीर में तुम रह नहीं रहे हो। शरीर एक स्वायत्त इकाई है। तुम शरीर के भीतर नहीं हो, तुम शरीर से चिपके हुए हो। मैंने कह दिया कि शरीर घर है तुम्हारा; शरीर तुम्हारा घर भी नहीं है, शरीर किसी का घर नहीं है। शरीर अगर घर है, तो कुछ कीड़े-मकोड़ों का, छोटे-छोटे कीटाणुओं का, जीवाणुओं का जो शरीर के भीतर रहते हैं। शरीर तो अपनी चाल चलना जानता है, तुम व्यर्थ उससे संलग्न हो।
प्र: शरीर के माध्यम से सुख लेने की कोशिश कर रहे हैं। ख़ूब सुख ले रहे हैं।




