आचार्य प्रशांत: कहानी है 'श्रद्धा से दर्शन मिले'। तो कथा में बताया गया है कि कैसे एक जगह गीता का पाठ हो रहा था, और जो सुनने वाला था, श्रोता, वह सुने और रोए। तब उससे पूछा गया कि भाई ये जो कुछ कहा जा रहा है तुझे समझ में आ रहा है? तू इतना भाव विभोर हो गया है, गीता सुन-सुनकर, ये जितने श्लोक, जितनी बातें तुझसे कही जा रही हैं, तुझे समझ में आ रही हैं?
उस आदमी ने कहा, "एक बात समझ नहीं आ रही, मुझे तो पता ही नहीं, क्या कहा जा रहा है।" पूछने वाले ने पूछा, "फिर तू रोता काहे है?"
तो श्रोता ने बड़ा कीमती ज़वाब दिया, उसने कहा, मैं तो बस इतना देख रहा हूँ कि अर्जुन रथ पर बैठा है और कृष्ण उसे समझा रहे हैं। और इतना ही देखने में, मेरे आँसू झरते जा रहे हैं, मुझे नहीं पता कृष्ण क्या कह रहे हैं। मैं बस इतना देख रहा हूँ कि अर्जुन रथ पर है और नारायण उसे समझाए जा रहे हैं। तो मोनिका (प्रश्नकर्ता) का प्रश्न है कि "वो आदमी रो क्यों रहा है?"
वो आदमी रो रहा है क्योंकि दृश्य बहुत करुण है, वो आदमी रो रहा है मानवता की नासमझी पर।
अर्जुन का व्यक्तिगत मामला है, राज्य की लड़ाई है, भाईयों की आपसी गुटबंदी है और अर्जुन उलझा हुआ है। वो जान भी नहीं रहा है कि उचित कर्म क्या है। एक साधारण मानव है अर्जुन। ऐसे ही उलझा है वो धन-संपत्ति और रिश्तों के जाल में जैसे हर कोई उलझा हुआ है। लाखों-करोड़ों हैं अर्जुन जैसे।
और इतना छोटा है अर्जुन कि अपनेआप को ही कुछ नहीं दे सकता, तो कृष्ण को क्या देगा। कृष्ण को अर्जुन से कुछ नहीं मिल सकता। और कृष्ण अर्जुन को समझाए जा रहे हैं, समझाए जा रहे हैं, समझाए जा रहे हैं; उनके धैर्य की कोई सीमा नहीं। और अर्जुन समझने से इनकार कर रहा है, इनकार कर रहा है, इनकार कर रहा है; उसके हठ और मूढ़ता की कोई सीमा नहीं।




