प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! आचार्य जी, आपकी जो भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियाँ हैं उनमें से कोई एक भी अगर किसी इंसान में हो तो वो एक बहुत ही एक्सक्लूसिव कैटेगरी (विशिष्ट श्रेणी) में चला जाता है और आपके पास तो वैसी उपलब्धियों की तो पूरी लिस्ट (सूची) है जो मूलत: आपको दुर्लभ से भी दुर्लभतम बनाता है इसलिए सबसे पहले, आप जो कर रहे हैं इसके लिए बहुत-बहुत आभार प्रकट करता हूँ।
आप एक ऐसे वर्ग से आते हैं जिसमें कि आप बस अपना हाथ बढ़ाकर दुनिया से कुछ भी प्राप्त कर सकते थे। लेकिन फिर भी आप ये एक ऐसी भाषा में कर रहे हैं जिसे हम आसानी और विस्तार से समझ सकें। इसीलिए मैं आपके इस कार्य की तहे दिल से प्रशंसा करता हूँ। आपके इस कार्य के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद!
मेरे दो प्रश्न हैं। बचपन से मेरी एक बहुत मूल्य केन्द्रित दृष्टिकोण रहा है, वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण रहा है किसी चीज़ को देखने का। अगर उसमें मुझे कोई मूल्य संवर्धन नहीं दिखता है तो इस तरह की किसी भी बातचीत के लिए मेरे पास बहुत कम धैर्य है। इसलिए मैं ये जानना चाहता हूँ कि क्या ये नज़रिया सही है? क्योंकि कई बार ये मुझे बहुत कुंद और असभ्य बना देता है जो मुझे समझ नहीं आ रहा है मैं इसे लिखता हूँ और आगे बढ़ जाता हूँ—एक तो ये प्रश्न है।
दूसरा प्रश्न है कि मैं करियर पर जहाँ पर अभी हूँ मुझे काफ़ी सारे अवसर दिखते हैं सामने। मैं उन सभी अवसरों का लाभ उठाना चाहता हूँ। फिर मैं अपनेआप से पूछता हूँ कि मैं आगे क्यों बढ़ना चाहता हूँ। मुझे जो उत्तर मिलता है वो है— पैसा। फिर मैं पूछता हूँ— मैं पैसे का क्या कर रहा हूँ? मुझे कोई जवाब नहीं मिलता है। क्योंकि उपभोग कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मैं चाहता हूँ। इसलिए ये सिर्फ़ एक प्रक्रिया है क्योंकि मुझे और कुछ आता नहीं।
मैं सिर्फ़ काम करना जानता हूँ। मैं अपने काम का आनंद लेता हूँ। औसतन मैं एक दिन में पंद्रह-सोलह घंटे काम करता हूँ। और इस पूरे प्रक्रिया में मुझे बहुत मज़ा आता है। लेकिन एक तरफ़ हमेशा दिमाग में रहता है कि ये सब अंततः एक खेल ही है। मैं इसमें बस भाग रहा हूँ। इसमें मिलना-जाना कुछ है नहीं। चाहे कितनी भी पूँजी प्राप्त कर लूँ।




