इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।३.१२।।
यज्ञ से उन्नत होकर देवता तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करेंगे, इस प्रकार उन देवताओं से प्राप्त हुई सामग्री को दूसरों की सेवा में लगाए बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है।
~ श्रीमद्भगवद्गीता
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, इस श्लोक में जो बताया गया है कि यज्ञ से उन्नत होकर देवता तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करते रहेंगे लेकिन उनको अर्पण किये बिना जो मनुष्य उनके द्वारा दिये पदार्थों को स्वयं भोगता है, वह चोर ही है। तो ये चोर मुझे समझ नहीं आया। इसपर मैंने आपकी 'कर्मयोग' पुस्तक से पढ़ा भी है काफ़ी लेकिन मुझे अभी स्पष्ट नहीं हो पाया।
आचार्य प्रशांत: यज्ञ से देवता उत्पन्न होते हैं। यज्ञ का अर्थ होता है वो सबकुछ आहुति में डाल देना जो किसी श्रेष्ठतर को अर्पित किया जा सकता है। ये आगे बढ़ने की प्रक्रिया है।
मेरे पास बल है, मेरे पास बुद्धि है, मेरे पास ज्ञान है, मेरे पास धन है; मैं इसको वहाँ समर्पित कर देता हूँ जहाँ कोई ऊँचा उद्देश्य है — ये यज्ञ है।




