आलूका-पाका-टोको: यो तो गयो || आचार्य प्रशांत, वेदान्त महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

प्रश्नकर्ता :प्रणाम,आचार्य जी। मेरा सवाल माता-पिता के साथ जो सम्बन्ध है, उसके विषय में है। मैं आपको डेढ़-दो साल से सुन रहा हूँ और काफ़ी बदलाव भी आया है जीवन में। जैसे आप बंधनों काटने की बात करते हैं तो उस तरह से थोड़ा साहस आ गया था। जैसे जिन स्वार्थों की वजह से मैं माता-पिता के ज़्यादा समीप रहता था, उन स्वार्थों को छोड़ने की कोशिश करी। जो जॉब (नौकरी) वगैरह में था, वो सब भी मैंने छोड़ने की कोशिश करी।
लेकिन जैसे आप अभी कह रहे थे कि कटोरे में कचरा चिपक गया है, तो बहुत छोटी उम्र से यह शिक्षा दी गई थी कि दूसरों की मदद मत करो नहीं तो वो तुमसे आगे निकल जाएँगे।
जो प्रतियोगी परीक्षाएँ वगैरह हैं उसमें मुझे सफलता मिली, और जो-जो उपलब्धियाँ हुईं, वैसे-वैसे घमंड भी बढ़ता गया। यह सारी चीज़ें, जो मेरे जीवन की कहानी है वैसे हुई। बट (लेकिन) जो फाउंडेशन (आधार) था इसका, जो आधार था इन सब चीज़ों का, वो जो वैल्यूज (मूल्यों) थीं, वो वहाँ से आयी थीं, माता-पिता से आयी थीं।
अब कॉरपोरेट जॉब छोड़ करके अभी एक कोचिंग में पढ़ाता हूँ, फिजिक्स (भौतिकी), मैथ्स (गणित), मैं उस तरफ़ चला गया हूँ। पर माता-पिता की जो एक्सपेक्टेशन्स (अपेक्षा) हैं वह अब क्लियर (स्पष्ट) हो गयी हैं। मैंने स्पष्ट कर दिया है कि इस तरह से मैं जीवन नहीं जीना चाहता। मतलब मेरी तरफ़ से तो मुझे यह बात ठीक लगती है लेकिन हो क्या गया कि फिर मेरे पिताजी अवसाद का शिकार बन गए।
मैं उनकी मदद करना चाहता हूँ क्योंकि जैसे भी हो, जो भी उन्होंने मूल्य दिए हों, जो पढ़ाई की सारी, जो सारा खर्चा वगैरह था, सारा उन्होंने उठाया। और जो भी सुख-सुविधाएँ आज मेरे पास हैं या मेरे पास रही हैं, जैसे आपकी भी बातें मैं सुन पाता हूँ, समझ पाता हूँ, ये जो चीज़ें हैं, एक तरह से तो उनका भी उसमें योगदान तो है न।



