मिलिए आज तक के सर्वश्रेष्ठ गुरु से (बोलो टू प्लस टू फ़ोर) || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। एक्चुअली आज सुबह मेरी एक दोस्त से मेरी बात हो रही थी, वो मेरी बीस साल पुरानी दोस्त है, और कहीं-न-कहीं ये मेरी आदत है कि जो भी चीज़ मुझे थोड़ी अच्छी मिलती है तो मुझे लगता है कि वो मैं सबके साथ शेयर (साझा) करूँ। तो पिछले कुछ दो सालों से जब से मैं आपसे जुड़ी हुई हूँ तो मुझे जो भी आपकी वीडियो अच्छी लगती थी, मैं उसके साथ शेयर करती रहती थी। लेकिन वो स्पिरिचुअली किसी और को शुरू से फॉलो (अनुसरण) कर रही है, लेकिन वो इन दो सालों में परेशान ही थी किसी-न-किसी चीज़ से, तो मुझे लगता था शायद ये वीडियो उसकी मदद कर देगी।
तो आज कुछ ऐसा हुआ कि बात करते-करते हमारी लड़ाई हो गयी इस बात पर कि उसको लगा कि मैं बहुत ही ज़्यादा इम्पोस (आरोपित) कर रही हूँ आपको उसके ऊपर। उसने बोल भी दिया कि तुम अपनी बातों से मुझे बहुत ज़्यादा इम्पोस कर देती हो, मुझे नहीं सुनना और मतलब सबके अपने-अपने तरीक़े होते हैं। तो उसने मुझे एग्ज़ामपल्स (उदाहरण) देने शुरू करे कि हर इंसान अलग-अलग तरह से बना होता है, सबकी चॉइसेस (चुनाव) अलग होती हैं। किसी को कैसे समझ में आता है, किसी को कैसे समझ में आता है।
लेकिन मुझे लगा कि हम सबकी कहीं-न-कहीं इंसान होते हुए दिक्क़तें तो सेम (एक जैसी) होती हैं, कामनाएँ सेम होती हैं, वासनाएँ भी सेम होती हैं और सबको मुक्ति चाहिए। तो ऐसा कैसे होता है कि गुरु अलग-अलग होते हैं या मुझे लगता है कि जो चीज़ मुझे यहाँ मिली है वो सबको मिले। तो मैं चाहे स्कूल में हूँ या मैं कहीं पर भी हूँ, मैं बस आपकी ही बातें करती रहती हूँ सभी से, किसी को किताब देना, किसी से वीडियो शेयर करना।
लेकिन आज मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि क्या हमें किसी के ऊपर अपनेआप को इम्पोस करना चाहिए इस तरह से? लेकिन ये भी ख़याल साथ-साथ था कि मैं चाहती हूँ कि तुम ख़ुश रहो। मेरी



