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आत्मा परमात्मा जीवात्मा - एक हैं? अलग हैं? || (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: जीवात्मा, जीव और परमात्मा तीनों अलग-अलग हैं क्या?

आचार्य प्रशांत: जीव तो यही है, जो शरीरी, जिसको कहते हैं आप। ठीक है? यह जीव कहलाता है। जीवात्मा माने अह्म; परमात्मा माने आत्मा। अच्छे से इसको बिलकुल समझ लें क्योंकि यह शब्द आपके सामने बार-बार, बार-बार आएँगे, कभी इधर से कभी उधर से और इनमें उलझने का बड़ा ख़तरा रहता है। परमात्मा शब्द सही से उपयुक्त हुआ है तो उसका अर्थ एक ही है — सत्य या आत्मा। सत्य बराबर आत्मा बराबर ब्रह्म। आत्मा को ही और ज़्यादा ज़ोर दे कर के बोलने के लिए, स्पष्ट करने के लिए कह देते हैं परम आत्मा। पर आत्मा बोले या परम आत्मा, आशय सत्य से ही है, आत्मा मात्र।

जीव आप हैं। आपकी जो 'मैं' की भावना है, अह्म, उसी को जीवात्मा कहते हैं। यह जो 'मैं' की भावना मिटने को तैयार रहती है, कहीं पहुँचने को तैयार रहती है, उस जगह को आत्मा कहते हैं। स्पष्ट है बिलकुल?

प्र: आचार्य जी, जीव माने क्या?

आचार्य: जो अपने आप को जीवित माने, जो कहे कि 'मैं हूँ', वो जीव है।

प्र: जीवात्मा जो अह्म से जुड़ी हुई है?

आचार्य: अह्म अकेला होता है, कहता है — मैं। और फ़िर जब वह कहने लग जाता है 'मैं शरीर' तो जीव हो गया। अगर सिर्फ़ कहो कि 'मैं कौन?', तो बोलो जीवात्मा। आत्म माने 'मैं।' ठीक है? अह्म।

तुम सिर्फ़ कभी यह थोड़े ही बोलते हो कि 'मैं हूँ'। पूरी बात क्या बोलते हो? 'मैं कुछ हूँ, मैं राहुल हूँ, मैं अनिरुद्ध हूँ। मैं यहाँ का हूँ, मैं वहाँ का हूँ।' तब तुम हो गए — जीव। तब हो गए जीव। और जीव का जो आत्म है, जीव का जो अह्म है, जीव के आत्म को कहते हैं — जीवात्मा। जीव के ही अहंकार को कहते हैं जीवात्मा। जीव जिसको आत्म, माने 'मैं' बोले, वो हो गया जीवात्मा।

प्र: एक बार जीव पर फिरसे।

आचार्य: अपना परिचय दो।

प्र: मैं रोहित।

आचार्य: हाँ ये जीव है। ये जीव है। जो अपना परिचय ऐसे देता है, “मैं रोहित हूँ”, वो जीव है। और 'मैं रोहित' में, रोहित प्रकृति है और ‘मैं’ अह्म है। बताओ कैसे पता चलता है तुम रोहित हो? किसी को भी रोहित का पता कैसे चलता है, हम कैसे जानेंगे ये रोहित है? शरीर देखकर, पहचान देखकर, कपड़े देखकर, वर्तमान देखकर, भूत देखकर भविष्य देखकर, माँ-बाप का नाम देख करके। वह सब क्या है? वो सब प्रकृति के तत्व हैं। तो अह्म हमेशा किसके साथ जुड़ा होता है? प्रकृति के तत्वों के साथ। इसमें एक चीज़ ये भी याद रखना कि अहं स्वयं भी प्रकृति का एक तत्व है। अहम प्रकृति का वो तत्व है जो प्रकृति के अन्य तत्वों के साथ बहुत जल्दी संबंधित हो जाता है। संबंधित क्यों हो जाता है? क्योंकि उसे किसी-न-किसी से संबंधित होना है। गड़बड़ वह यह कर लेता है कि वह अपने ही कुटुंब में संबंधित हो जाता है।

जबकि वह वास्तव में संबंधित किससे होना चाहता है?

श्रोतागण: आत्मा परमात्मा से।

आचार्य: उसको संबंधित वहाँ होना था। भीतर-ही-भीतर उसने रिश्ते बना लिए। तो तुम्हारा अह्म संबंधित होना चाहता है किसी और से, पर उसने संबंध किससे बना लिया है? तुम्हारे कुर्ते से, तुम्हारी भावनाओं से, तुम्हारे विचारों से, तुम्हारे शरीर से।

प्र२: आचार्य जी आपने कहा कि आत्मा जब अह्म का रूप ले लेती है तो उसके लिए खेल है। और अह्म के लिए आत्मा एक माया है।

आचार्य: अह्म जब इधर-उधर फँस जाता है तो यह माया है। ये जो खेल चल रहा है ये आत्मा की तरफ से लीला है और अह्म की तरफ से माया है।

प्र२: इसको एक उदाहरण के साथ बता दें।

आचार्य: बाप अपने बेटे को यूँ ही छोड़ देता है। थोड़ा एक बड़ा सा मैदान है, जहाँ पेड़-पौधे और इस तरह की चीज़ें हैं। थोड़ा अंधेरा है। बाप ले आता है, बेटा तीन-चार साल का है, उसे छोड़ देता है। रौशनी भी थोड़ी कम है। और बाप एक पेड़ के पीछे छुपा हुआ है। बाप अच्छे तरीके से जानता है इस चीज़ को। बाप का ही लगाया हुआ बाग़ है।

वो एक-एक पौधे को, ज़मीन के एक-एक हिस्से को घास के एक-एक कतरे को जानता है। उसने बेटे को छोड़ दिया है। बाप की ओर से क्या है? लीला। और बेटा वहाँ पर गया है फँस। वो खो गया और अब चिल्ला रहा है, "बापू-बापू!" और बापू नहीं मिल रहा, तो कभी जाकर गधे को पकड़ लिया, बापू बोल दिया। कभी कुछ और गुज़रा, कभी किसी पेड़ पर चिपट गया, उसको बापू बोल रहा है। उसे बापू चाहिए, बापू मिल नहीं रहा तो कहीं भी जाकर के 'बापू-बापू' कर रहा है। तो उसकी ओर से क्या हो गई? माया।

प्र: परमात्मा इस लीला में हस्तक्षेप क्यों नहीं करता?

आचार्य: उसने हस्तक्षेप पूरा कर रखा है। उसने आपको ताक़त दे दी है कि आप उसको खोज लें। अब आपके हस्तक्षेप करने की ज़रूरत है। कि उसने आपको जो ताक़त दी है आप उसका इस्तेमाल करें।

अब चलिए कहानी को आगे बढ़ा देते हैं। तो बापू ने लड़के को एक घंटी भी दे रखी है, क्या? कि जब ज़्यादा खो जाओ और यही लगे कि बापू वापस चाहिए तो घंटी बजा देना। अब लड़के को भी इधर-उधर गधों से लिपटने में मज़ा आ रहा है, उन्हीं को बापू मान रहा है कि यह बापू है। वह घंटी बजा ही नहीं रहा। तो हम यह क्यों बोलें कि बापू हस्तक्षेप क्यों नहीं कर रहा। बापू ने तो घंटी दे रखी थी न, कि घंटी बजाओ, बापू पाओ। तुम घंटी काहे नहीं बजा रहे? तो वो अपनी ओर से आपको जो ताक़त दे सकता है, उसने दे दी है। वो आपके भीतर ही बोध बन कर बैठ गया है। वो आपके भीतर ही विवेक बन कर बैठ गया है। अब आपको उसका इस्तेमाल करना है, आपको चुनाव करना है। भई, बेटे को अगर बापू चाहिए ही नहीं, तो बापू कैसे मिलेगा? चुनना तो पड़ेगा न बापू को।

चाहिए नहीं तो कैसे मिले?

प्र: यदि जीवात्मा को परमात्मा मिल जाता है तो क्या उस जीवात्मा की अकाल मृत्यु नहीं होती?

आचार्य: हाँ, जीवात्मा की मृत्यु हो जाती है, वैसे ही जैसे आप यहाँ बत्ती जलाते हो तो अंधेरे की मृत्यु हो जाती है। उससे किसी को क्या नुकसान हो गया, और उससे वास्तव में मिट भी कौन गया? आप यहाँ आए कमरे में, आपने बत्ती जला दी तो तुरंत मृत्यु हो गई, किसकी? अंधेरे की। उससे वाकई क्या किसी की मृत्यु हुई? अंधकार था, एक तरह का अज्ञान था जो मिट गया। जीवात्मा कुछ होता थोड़े ही है। वो कुछ होता तो मिट कैसे जाता? वो तो एक तरह का भ्रम है।

वो कहता है कि 'मैं हूँ' पर वो है नहीं। जीवात्मा कहता भर रहता है, "अरे मैं हूँ, मैं हूँ, मैं रोहित हूँ, मैं फलाना हूँ, मैं ढिकाना हूँ।" वह कुछ है थोड़े ही। उसको जितना आप जाँचते-परखते हो, पता चलता है झूठ बोल रहा है। अभी ये बात भी झूठ बोली, ये बात भी झूठ बोली। थोड़ी देर में आप सर पकड़ लेंगे, कहेंगे, "सब कुछ तो झूठ ही बोल रहा है। ये है भी क्या?" जिसकी हर पहचान झूठ हो उसका अस्तित्व भी है क्या? कोई एक बात तो अपने बारे में सच्ची बोले। उसके बारे में तो जो हर एक बात है उसी का परीक्षण करो तो पता चलता है झूठी है। तो फिर क्या वो वाकई है भी? एग्जिस्टेंस , अस्तित्व भी है क्या उसका? तो कहाँ मिटा वो? कौन सी अकाल मृत्यु? मरने के लिए कोई होना चाहिए, था कहाँ कि मिटेगा?

आपके भीतर कुछ था जो अभी-अभी मिट गया। कौन सी अकाल मृत्यु? बहुत भारी शब्द है 'अकाल-मृत्यु'। इसका इस्तेमाल करके तो आप स्वयं को डरा रहे हैं ज्ञान के विरुद्ध। कुछ था न भीतर जो मिटा है। अभी हम घण्टे-दो-घण्टे से बात कर रहे होंगे, बहुत कुछ है जो मिटता जा रहा है न। तो उसको अंधेरे का हटना कहें या अकाल-मृत्यु कह दें?

श्रोतागण: अंधेरे का मिटना।

आचार्य: हाँ, बस यही है। भ्रमों का टूटना, सपने का मिटना। ऐसे कहें तो ज़्यादा ठीक है। कुछ लग रहा था, था नहीं।

प्र: आपने जीव और जीवात्मा के बीच अंतर बताया तो क्या जीवात्मा के भाव में, ‘मैं हूँ’ के भाव में जीना ज़्यादा बेहतर होगा?

आचार्य: ‘मैं हूँ’ अटका देगा। ‘मैं हूँ’ कोई स्थाई भाव नहीं हो सकता न। एक ओर तो कह रहे हो 'मैं हूँ', दूसरी ओर तुम्हें ये भी नहीं पता है कि क्या हूँ। तो देर-सवेर तुमको कहीं-न-कहीं जाकर के अटकना ही पड़ेगा।

मैं कुछ हूँ उससे हटने के लिए विधि के तौर पर तुम कह सकते हो कि ‘मैं हूँ’। पर मैं हूँ भी बहुत देर तक बोलते रहोगे तो कहीं-न-कहीं जाकर के फँसोगे। मैं हूँ एक विधि हो सकती है, सत्य नहीं हो सकता। सत्य में 'मैं हूँ' का भाव भी नहीं रह जाता।

क्या नाम है? "मैं अंकित हूँ।" उसके पार जाने के लिए ये विधि कई बार बताई गई है कि बोलो, ‘मैं हूँ’। 'मैं अंकित हूँ' यह मत बोलो, 'मैं हूँ' बस, ठीक है। अपने-आपको एक उपस्थिति की तरह बोलो, एक प्रेज़ेन्स की तरह बोलो, 'मैं हूँ'। लेकिन 'मैं हूँ' करके बहुत समय तक नहीं रह पाओगे। क्योंकि यह जो अह्म है यह उत्तर माँगता है, ये पूर्ति माँगता है, साथी माँगता है। अधूरा है न। तो कुछ-न-कुछ चाहिए इसे अपने-आपको पूरा करने के लिए। अभी बोल रहे थे 'मैं अंकित हूँ' फिर बोलने लग जाओगे 'मैं हूँ, मैं हूँ'। वो बहुत देर तक चलेगा नहीं। फिर बोलने लग जाओगे 'मैं शंकित हूँ, मैं शंकित हूँ'। और फिर शंकित होकर कहीं-न-कहीं जाकर के फँस जाओगे। आख़िरी बात तब होती है जब कह दो कि "हम हैं भी? हमें तो पता ही नहीं।" ऐसा कब होता है? सोते समय होता है। सोते समय पता नहीं चलता कि मैं हूँ भी कि नहीं।

और कोई अगर ज़बरदस्ती तुममें यह भाव डाले कि तुम हो, तो फिर तुम चौंक जाओ। जैसे किसी ने गहरी नींद से उठा दिया। तुम्हें अच्छा ना लगे कि, "मुझे क्यों वापस मौजूद करा दिया गया, उपस्थित करा दिया गया। मैं तो चला गया था मुझे वापस क्यों खींच लाए?" जैसे यह एक विधि होती है न, ' आई एम ', वैसे ही एक विधि ये भी होती है 'मैं नहीं हूँ'। वह भी बराबर की अच्छी होती है, और ज़्यादा अच्छी होती है। पर यह दोनों ही विधियाँ भर हैं। बहुत आगे तक नहीं ले जा पाएँगी। कुछ लोग इसका इस्तेमाल करते हैं — मैं हूँ आई एम , आई एम * । कुछ ऐसे भी होते हैं जो ये भी चलाते हैं — * आई एम नॉट , मैं हूँ ही नहीं। वो भी ठीक है। लेकिन अंततः तो आई एम को भी तुम्हें भूलना है। तो बहुत उसमें फिर सूरमा लोग होते हैं, वह कहते हैं, " आई एम रिमेंबरिंग दैट आई एम नॉट , मैं जानता हूँ कि मैं नहीं हूँ।" गजब! मिले हैं, वो जब आते हैं तो कहते हैं कि, "आचार्य जी, इतना तो मैं जानता हूँ कि मैं नहीं हूँ।" बाप रे!

प्र३: आचार्य जी, जीवात्मा का आत्मा बनना या अह्म का आत्मा बनना, ये आपने कल भी बताया था कि सिर्फ़ चुनाव की बात है और हम चुनते ही नहीं हैं। हमारे लिए हमेशा वो उपलब्ध है। अब चुनाव के तौर पर तो मुझे या अह्म को तो सिर्फ़ यही पता है कि सुख कहाँ पर है। तो मतलब सुख का पीछा करते-करते अंतिम में उसे पता लगता है कि शायद परमात्मा कुछ ऐसी चीज़ है जहाँ पर सुख है जो कभी खत्म नहीं होगा। तो मेरा प्रश्न ये है कि अह्म को वास्तव में प्रेम सुख से है या परमात्मा से?

आचार्य: हाँ, उसे ऐसा लगता है कि सुख के माध्यम से परमात्मा है। ये नहीं समझ पाता कि चूँकि उसे परमात्मा चाहिए इसलिए उसे सुख पसंद है।

प्र३: अगर एक काल्पनिक स्थिति लूँ कि मुझे प्रकृति के तत्वों में ही भरपूर सुख मिल जाए तो क्या वो परमात्मा कभी याद आएगा?

आचार्य: आपकी जेब में हो सकता है कि आपकी माता जी की, या आपके किसी इष्ट देवी-देवता की या आपकी बेटी की या बेटे की तस्वीर हो। आपका प्रेम किससे पहले है, आपकी बेटी से या उसकी तस्वीर से?

प्र३: बेटी से।

आचार्य: पर आपके पास लगातार क्या है?

प्र३: तस्वीर।

आचार्य: यह परमात्मा और सुख का रिश्ता है। वो तस्वीर आपके पास इसलिए है क्योंकि आपको पहला प्यार बेटी से है। अगर आपको बेटी से प्यार ना होता तो उसकी तस्वीर आप जेब में रखते क्या? परमात्मा से प्यार ना होता तो सुख का क्या करते?

देखिए मामला उतना जटिल नहीं है। हमने अभी कहा था न कि बाप ने दे रखी है घंटी, कि बटन दबा देना जब वापस लौटना हो। तो यह जो भी यात्रा है, खेल है, लीला है, माया है जो भी है इसके अंत तक जाने के, आख़िरी जीत तक जाने के सब साधन आपके पास मौजूद हैं। नहीं तो फिर तो बहुत अन्याय हो जाएगा न, कि आप को बाप ने जंगल में छोड़ दिया और आपको कोई तरीका, कोई साधन भी नहीं दिया वापस लौटने का। यह तो बच्चे के साथ फिर नाइंसाफी हो गई। ऐसा नहीं है। एक तरफ तो आपका मन है जो सुख की ओर खींचता है, दूसरी ओर भूलिए नहीं कि आप इंसान हैं जिसके पास बुद्धि भी है विवेक भी है, स्मृति भी है, प्रज्ञा भी है। आपके पास और भी बहुत कुछ है। बिलकुल आप सुख की ओर आकर्षित होते हैं लेकिन साथ-ही-साथ क्या आपको नहीं पता कि सुख धोखा कितना देता है और कीमत कितनी माँगता है?

तो हम एक ही पक्ष की बात ना करें कि सुख आकर्षित करता है। सुख की सच्चाई क्या है वो भी तो हम जानते ही हैं न। दूसरी बात; किसने कह दिया कि सच्चाई के रास्ते पर दुःख-ही-दुःख मिलते हैं? ये भी मेरी नज़र में अहंकार की ही एक चाल है; ऐसा वक्तव्य देना। क्योंकि एक बार आपने बोल दिया कि सच्चे रास्ते पर चलोगे तो दुःख-ही-दुःख पाओगे तो सच्चे रास्ते पर वैसे ही कोई नहीं चलेगा। नहीं, ऐसा तो है नहीं कि दुःख-ही-दुःख पाओगे। मज़े भी आते हैं। सच्चाई का भी अपना रस है। सुख-दुःख सही जिओगे तो भी मिलेगा, ग़लत जिओगे तो भी मिलेगा। जो ग़लत जी रहे हैं उन्हें भी क्या सिर्फ़ सुख-ही-सुख मिल रहा है? जो सही जी रहे हैं उन्हें क्या बस दुःख-ही-दुःख मिल रहा है?

तो ऐसी धारणा करना कि जो ग़लत हैं, भ्रष्ट हैं और झूठे हैं उनके तो मज़े आ रहे हैं और जो सही ज़िंदगी जी रहे हैं वो बेचारे कष्ट में जी रहे हैं, ऐसी धारणा नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा है नहीं। कुछ फ़र्क हो सकता है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि आप जितने डूबते जाएँगे और भ्रष्ट होते जाएँगे और कामी होते जाएँगे और आसुरी होते जाएँगे उतना आपके सुख में वृद्धि होती जाएगी। ऐसा कोई नियम नहीं है भाई।

शहादत अच्छी चीज़ है पर ज़बरदस्ती का शहीद नहीं बनना चाहिए। क्योंकि ज़बरदस्ती अब यही दिखा दो कि सेना में जितने जाते हैं सब शहीद हो गए तो सेना में जाएगा कौन? शहीद भी होते हैं, ठीक है अच्छी बात है, सम्मान की बात है। कोई वीरगति को प्राप्त हुआ। पर ये नहीं दिखा देना चाहिए कि बारह-लाख शहीद हो गए एक झटके में। कि देखो ये तो रास्ता सूरमाओं के लिए है, जो पहले अपना सर काटते हैं फिर सेना में आते हैं। तो शहीद तो वो पहले ही हो गए थे। तो लोग सुन तो लेंगे पर सुनने के बाद सैनिक नहीं बनेंगे वो।

इसीलिए फिर संतों ने खूब रस बिखेरा। उन्होंने कहा कि तुम सुख के लिए तड़पते हो न, सुख पर ही मरते हो न, आओ तुमको दिखाते हैं अध्यात्म में कितना सुख है। उन्होंने एक-से-एक गीत गाए। सड़कों पर गीत गाए। बोले, "तुम्हें नाच-गाना धूम-धमाका यही करना है न, हम तुमको दिखाते हैं नाच कर। तुम्हारा क्या नाच है, तुम तो दस साल में एक बार नाचते हो किसी की शादी में। वो भी नाचते ऐसा हो कि पी ली गिर गए, चोट और लगा आए, मुँह फुड़वा कर लौट आए, नाचने गए थे। बेइज़्ज़ती! हम दिखाएँगे हम रोज़ नाचेंगे। हम अखंड नाचेंगे।" नाचते ही गए। "लो तुम भी गाने बनाते हो, तुम्हारे गानों में भी कोई बात है? भद्दे! दो दिन नहीं चलते तुम्हारे गाने। हम ऐसे गाने बनाएँगे जो दो-सौ साल बाद भी लोग गाएँगे। किसने कह दिया कि अध्यात्म में दुःख-ही-दुःख है?" आओ इधर भी, अलग तरह का सुख है बस थोड़ा। कड़ा सुख, टफ प्लेज़र !

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