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व्यर्थ का ज्ञान ही बंधन है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।।

मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

—श्रीमद्भगवद्गीता ,अध्याय ९, श्लोक ४

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आज हम लोग गीता पाठ कर रहे थे तो श्लोक चार में भगवान कृष्ण कहते हैं कि सभी भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं। और उसके अगले ही श्लोक में कहते हैं कि वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं है। तो मुझे यहाँ विरोधाभास दिख रहा है, कृपया स्पष्ट कीजिए।

आचार्य प्रशांत: भूतों की दृष्टि से देखें तो सब भूत श्रीकृष्ण में स्थित हैं। भूत माने पदार्थ, जड़, प्रकृति। भूत की दृष्टि से देखने का अर्थ ही यही हुआ कि भूत है। अगर है तो कहीं तो होगा। कहाँ होगा फ़िर? उन्हीं में होगा।

तो वो कहते हैं कि जैसे आसमान में वायु व्याप्त है, वैसे ही मुझमें समस्त भूत व्याप्त हैं। आकाश आता-जाता नहीं; वायु झोंके लेती रहती है, बहती रहती है, कभी चल रही है, कभी नहीं चल रही, कभी साफ़ है, कभी गंदी है। भूतों की दृष्टि से देखें तो भूत है, और भूत है तो कहीं तो होना पड़ेगा। कहाँ है? कृष्ण में है।

और अगर कृष्णत्व के केंद्र से देखें तो कृष्ण मात्र हैं; भूत है ही नहीं। कृष्ण तो असंग हैं। तो कैसे कह दें कि कृष्ण के भीतर भूतों का भी अवस्थान है? तो इसलिए दोनों ही बातें सही हैं। बात यह है कि आप किस तल पर देख रहे हैं। जीव बनकर देखोगे तो कहना पड़ेगा कि 'मैं जीव हूँ और मैं परमात्मा में स्थित हूँ'। और आत्मा अगर बोलेगी तो वह कहेगी कि 'मैं मात्र हूँ, जीव है कहाँ।' तो दोनों बातें बिलकुल ठीक हैं। बोलने वाले का अंतर है।

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।।

यह विज्ञानसहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल वाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है।

—श्रीमद्भगवद्गीता ,अध्याय ९, श्लोक ४

प्र२: तो इस श्लोक में उन्होंने विज्ञान की चर्चा की है और कुछ अगले श्लोकों में कर्म पर चर्चा की है। तो एक साइंस (विज्ञान) बताया गया है कि कैसे यह सारा प्रकृति में चल रहा है। लेकिन मैं इस विज्ञान से आज के समय में कैसे लाभ ले सकता हूँ?

आचार्य: अध्यात्म की भाषा में विज्ञान का वह अर्थ नहीं होता जिसको आप साइंस में अनुवादित कर सकें। अगर आप उपनिषदों के पास जाएँगे तो वो मन के कोशों की बात करते हैं, तो उनमें अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, फ़िर मनोमय कोश और फ़िर विज्ञानमय कोश आता है। विज्ञानमय कोश से तात्पर्य होता है किसी तरीके का बंधा हुआ, सधा हुआ ज्ञान, आयोजित ज्ञान। विज्ञान से अर्थ आप साइंस से मत ले लीजिएगा। ज्ञान ही जब और व्यवस्थित हो, आयोजित हो तो अध्यात्म की भाषा में वह विज्ञान हो गया।

अब आप पूछ रहे हैं कि आपके काम का कैसे है। तो कह तो रहे हैं, "यह सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल वाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है।" ये लाभ हैं उसके।

प्र२: मात्र इसी नॉलेज (ज्ञान) से?

आचार्य: नहीं, मात्र इसी नॉलेज से नहीं। अगर मैं आपको यह बता दूँ, उदाहरण के लिए, कि आपको सेब खाने की ज़रूरत है तो फ़िर आप यह ज्ञान ख़ुद ही इकट्ठा करने चले जाओगे न कि सेब मिलता कहाँ है और कितने रुपए में मिलता है? तो जब श्री कृष्ण कह रहे हैं कि यह ज्ञान, ज्ञानों में सर्वोपरि है, तो उनका अर्थ यह नहीं है कि यही ज्ञान लेकर रुक जाना है, उनका अर्थ है कि जिसको आध्यात्मिक ज्ञान मिल गया, वह फ़िर यह भली-भाँति समझ जाता है कि ज्ञान भी कौन-सा हासिल करने लायक है।

नहीं समझे बात को? ज्ञान में भी तो बड़ी विविधताएँ हैं न? यह जान लो, कि वो जान लो, यहाँ जान लो। जानते तो सभी हैं; नादान कोई नहीं है। दिक़्क़त यह है कि हम सब व्यर्थ की ही चीज़ें जानते रह जाते हैं। हमारा यही हाल है न, कि सब जो मूर्खतापूर्ण बातें होती हैं, उन्हीं का हमें खूब ज्ञान होता है, उन्हीं से हमारा पूरा मन भरा होता है—सही बात हमें पता ही नहीं होती।

आध्यात्मिक ज्ञान के बाद आप यह जान जाते हो कि दुनिया में कौन-सा ज्ञान लेने लायक है और कौन-सा ज्ञान लेने लायक नहीं है। तो आध्यात्मिक ज्ञान लेने का मतलब यह नहीं है कि अब और किसी ज्ञान की आपको ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। आध्यात्मिक ज्ञान लेने का मतलब है कि अब आपको वह कसौटी मिल गई जिससे आप यह जान सकोगे कि आगे और कौन-सा ज्ञान लेना है। समझ रहे हो बात को?

किसी लाइब्रेरी (पुस्तकालय) के मैनुअल (नियमावली) की तरह है अध्यात्म। आज-कल जिस तरह के पुस्तकालय होते हैं, उनमें किस तादाद में किताबें होती हैं? कितनी किताबें होती हैं आज के एक आम पुस्तकालय में? असंख्य होती हैं अब, क्योंकि मामला ऑनलाइन हो गया है। और एक लाइब्रेरी दूसरी लाइब्रेरी से अप-कनेक्टेड है तो अब वह अनिवार्यता या सीमा भी नहीं रही कि हार्ड कॉपी लाइब्रेरी में उपलब्ध है या नहीं है; हार्ड कॉपी मिली तो मिली, नहीं तो सॉफ्ट कॉपी होगी। सॉफ्ट कॉपी अगर वहाँ के लोकलाइज्ड (स्थानीय) सर्वर पर नहीं है तो कहीं किसी और सर्वर पर रखी होगी। दुनिया भर में कहीं भी होगी, वह आपको कनेक्ट करके, खोज करके बता देगा कि यह किताब अमुक जगह पर है। यह लीजिए इस तरीके से आपको मिल सकती है, या तो फ़लानी मेंबरशिप (सदस्यता) ले लीजिए, यह कर लीजिए; कोई विधि बता देगा और आपको आपकी किताब मिल जाएगी।

अब मुझे यह बताइए कि आज फ़िर पुस्तकालय में किताब का होना बड़ी बात है या उस सॉफ्टवेयर का होना बड़ी बात है जो आपको बताए कि किताब कहाँ पर है? क्योंकि किताबें तो सब हैं, कोई किताब नहीं जो उपलब्ध नहीं। किताब माने ज्ञान, पुस्तकालय संसार है। हर तरह का ज्ञान दुनिया में तुम ले सकते हो। उसमें घटिया-से-घटिया ज्ञान भी शामिल है और ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञान भी शामिल है, दाईं तरफ का भी शामिल है, बाईं तरफ का भी शामिल है, दुनिया के हर क्षेत्र का ज्ञान है जो उपलब्ध है आपको। भाई, ये इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (सूचना तकनीक) का युग है न, तो जिस तरह का ज्ञान चाहिए आपको मिलेगा। और यही आपकी बदक़िस्मती है क्योंकि ज़िंदगी कितनी है? छोटी सी। और ज्ञान कितना है? अतिविस्तृत।

तुम पूरी ज़िन्दगी भी ज्ञान लेते जाओ तो भी दुनिया भर का ज्ञान ले सकते हो क्या? नहीं न? इसीलिए अध्यात्म की आज और ज़्यादा ज़रूरत है ताकि तुम्हें यह पता लग सके कि कौन-सा ज्ञान लेने लायक है और कौन-सा ज्ञान लेने लायक नहीं है।

व्यर्थ का ज्ञान ही बंधन बनता है। शिव सूत्र याद है न? ‘ज्ञानम् बंधः’ (ज्ञान ही बन्धन है)।

बंधन और थोड़े ही कुछ है। तुमने बेकार का ज्ञान इकट्ठा कर लिया, यही बंधन है। अध्यात्म इसीलिए ज़रूरी है कि ज्ञान इकट्ठा करने से पहले तुम यह जान पाओ कि कौन सा ज्ञान लें और कौन से ज्ञान की तरफ देखें भी नहीं।

अब जुआ खेलना कितने लोगों को आता है यहाँ पर? ख़ैर, आता भी होगा तो बताएँगे थोड़े ही न यहाँ पर, कैमरा लगा रखा है। वह भी तो ज्ञान ही है न? आम आदमी के बस की बात है कि जुआ खेल जाए और जीत भी जाए? वो भी बड़ी सफ़ाई की, बड़ी कला की, बड़े हुनर की चीज़ है। ज्ञान, ज्ञान में अंतर होता है। कुछ ज्ञान लेने लायक होते हैं और कुछ ज्ञान लेने लायक नहीं होते हैं।

अध्यात्म वह ज्ञान है जो आपको बताता है कि कौन-सा ज्ञान लो और कौन-सा ज्ञान तुम्हारे लिए व्यर्थ है।

आदमी को जिन जगहों पर बड़ी दुविधा होती है, उनमें से एक जगह यही है – पुस्तकालय या पुस्तकों की दुकान, बड़ी दुकान। आप वहाँ कभी जाइएगा और लोगों को टहलते हुए देखिएगा। एक-के-बाद एक अलग-अलग तरीके के वहाँ पर सेक्शन (विभाग) बने हुए हैं और एक विभाग का दूसरे विभाग से कोई लेना देना नहीं है, पर हैं सब। मैं जब जाया करता था तो देखता था।

अब एक सज्जन हैं, वो अभी कौन सा विभाग देख रहे हैं? साइंस फिक्शन और लगे हुए हैं साइंस फिक्शन देखने में, देख रहे हैं, देख रहे हैं। और अचानक मुड़े और अब क्या देखने लगे? कलिनरि (पाक शास्त्र)। वहाँ पर तरह-तरह के व्यंजन बनाने की रेसिपी की किताबें हैं। मुझे समझ में ना आए कि अभी-अभी तो यह आदमी इसाक असीमोव देख रहा था और यह वापस मुड़कर देख रहा है कि मलाई-कोफ़्ता कैसे बनाना है, क्यों? क्योंकि हमें पता ही नहीं है कि हमें चाहिए क्या, तो वहाँ जो कुछ होता है, हमें बड़ा आकर्षक लगता है। यह भी देख लिया, वह भी देख लिया।

अभी थोड़े ही देर तक फ़िलॉसफ़ी सेक्शन में मुँह डाले रहे, उसके बाद पहुँच गए फ़िक्शन में। तुम गजब आदमी हो, यार! तुम दर्शन से सीधे कहानीबाजी पर उतर आए। और उन्हीं में एक विभाग आजकल होता है रिलेशनशिप्स (रिश्ते), सेवन ट्रिक्स टू सेव योर मैरिज (अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के सात तरीके), इस तरह से। तो उसने उसमें मुँह डाल रखा है और वहाँ से मुँह निकाला तो वह पहुँच गया स्पाई थ्रिलर्स में। यह क्या? ‘संबंध क्या है?’ ’हाउ टू सेव योर मैरिज?’ , अभी यह देख रहा था वो और अभी पहुँच गया जासूसी विभाग में। हम जीवन से इसी तरह यात्रा करते हैं।

हर जगह कुछ-न-कुछ है जानने के लिए और हमें पता ही नहीं है कि क्या जानने योग्य है और क्या जानने योग्य है ही नहीं। तो नतीजा यह निकलता है कि हमें जो ही कुछ मिलता है, हम उसमें उत्सुकता दिखाना शुरू कर देते हैं।

जैसे कि नाई की दुकान, वहाँ आप बाल कटाने जाइए और लंबी कतार हो, अगर रविवार वग़ैरह को गए हैं तो आपको बैठा देता है और आपके सामने बहुत तरह की बेहूदी किताबों का एक पुलिंदा रख दिया जाता है। वो बहुत ही पुरानी-पुरानी होती हैं। तमाम तरह की फ़िल्मी गॉसिप की पत्रिकाएँ आपके सामने रख देंगे और वो भी तीन-तीन, चार-चार साल पुरानी, वहीं पड़ी हुई हैं, उनमें बीच-बीच में बालों के जत्थे हैं। फिल्मी पत्रिकाएँ होंगी और ये और वो और जो मुफ़्त की पत्रिकाएँ जो एयरलाइंस में दी जाती हैं उनको कोई उठा लाया है चुराकर, वो भी वहाँ ही रख दी हैं, वो सब वहाँ पड़ी हुई हैं। किसी आदमी को वहाँ घण्टे भर इंतज़ार करना है बाल कटाने के लिए तो अब क्या पाओगे? पढ़ा-लिखा आदमी होगा बाल कटाने आया है, वो क्या कर रहा है? अब वो बैठ करके वही चार साल पुरानी फ़िल्मी गॉसिप की पत्रिका चाट रहा है।

हम ऐसे ही हैं। हममें ज़रा भी विवेक, डिस्क्रीशन नहीं है कि कौन-सा ज्ञान लेने लायक है और कौन-सा ज्ञान बिलकुल भी स्पर्श करने लायक नहीं है। हमें जो ही चीज़ मिलती है, हम उसी में उत्सुक हो जाते हैं। हमारा जैसे कोई द्वार, कोई चौकीदार ही नहीं है, जो कुछ भी हममें प्रवेश करने वाला हो, हम उसी के लिए खुले खड़े हैं, "हाँ, आओ। बताओ क्या बताना चाहते हो?" और हमने सुन लिया। "तुम क्या बताना चाहते हो?" तुमसे भी सुन लिया। "और आप क्या बता रहे हैं?” आप बता रहे हैं, अच्छा, अच्छा, आज-कल बाज़ार में कौन से नए तरीके के चमड़े के जूते आ रहे हैं, हमारी उसमें भी रुचि है। आप बता रहे हैं कि आज-कल जंगलों के जलने की गति क्या है, हमारी उसमें भी रुचि है। आप कुछ और बता रहे हैं, टायरों (पहियों) का नया ब्रांड कौन सा उतरा है बाज़ार में, हमारी उसमें भी रुचि है। आप बता रहे हैं कि कौन सी टेलीविज़न सीरियल में कौन सी नई तारिका आने वाली है, हमारी उसमें भी रुचि है। और यह सब जो हम अपने भीतर जाने देते हैं, वही भीतर का कचरा, मल, दूषण बन जाता है।

यह बड़ी-से-बड़ी दुर्बलता और बड़े-से-बड़ा पाप है कि आपके कान हमेशा खुले हुए हैं कुछ भी सुनने के लिए। आप सोचते हो कि जो आप सुन रहे हो, वो आपको ताक़त देगा। यही कहते हैं न हम, *’नॉलेज इज़ पावर’*। आप सोचते हो कि और सुन लो, और सुन लो; जो कुछ भी सुन रहे हैं, उससे कुछ लाभ ही होगा। सच तो यह है कि आपकी जीवन की जितनी दुर्बलताएँ हैं, वो आपके द्वारा इकट्ठे किए गए व्यर्थ ज्ञान के कारण ही हैं। जिस ज्ञान पर कान नहीं धरना चाहिए था आपने उस ज्ञान को बिलकुल अपने मन के केंद्र पर जगह दे दी। जो बातें आपको बिलकुल पता ही नहीं होनी चाहिए थी, वे बातें आपको पता क्यों हैं? आवश्यकता क्या है? मैं फ़िर पूछ रहा हूँ, आपको जुआ खेलना आता है? तो जुए के नियमों से आप परिचित नहीं हैं न, क्या करोगे उस ज्ञान का?

आपका बेटा आईआईटी-जेईई की तैयारी कर रहा है, अगर वह कहे कि "पापा, मुझे पता ही नहीं है कि टीवी में कौन से सीरियल चल रहे हैं।" तो आप उसको डाँट दोगे कि "बड़ा मूर्ख, बड़ा अज्ञानी है तू"? डाँटोगे क्या? या खुश हो जाओगे? खुश हो जाओगे न। क्योंकि यह ज्ञान लेने लायक नहीं है, तो भली बात बेटा कि तुझे इस चीज़ का ज्ञान नहीं है, ज्ञान होना भी नहीं चाहिए। नॉलेज (ज्ञान) पावर (शक्ति) नहीं होता। दुनिया को लगता है नॉलेज इज़ पावर (ज्ञान शक्ति है), तात्विक दृष्टि से देखिए तो ओनली राइट नॉलेज इज़ पावर , रॉन्ग नॉलेज इज़ बॉन्डेज , रॉन्ग नॉलेज इज़ ग्रेट वीकनेस (केवल सही ज्ञान ही शक्ति है, ग़लत ज्ञान बंधन और बहुत बड़ी कमज़ोरी है)।

जितना ज़रूरी है सही को जानना, उतना ही ज़रूरी है व्यर्थ को न जानना। कमज़ोर-से-कमज़ोर आदमी वो है जिसकी व्यर्थ में उत्सुकता है।

इसलिए कृष्ण यहाँ पर कह रहे हैं आरंभ में ही, अध्याय के बिलकुल आरंभ में ही कह रहे हैं कि जिसने यह ज्ञान ले लिया, उसको अब ज्ञानों का ज्ञान मिल गया, उसको उच्चतम ज्ञान मिल गया; क्योंकि यह ज्ञान लेने के बाद अब वह व्यक्ति व्यर्थ का ज्ञान लेगा ही नहीं। अब आगे वह वही ज्ञान ग्रहण करेगा जो मुक्ति की दिशा में उपयोगी, फलदायी होगा, बाकी सब बातों को वो सुनेगा ही नहीं और ध्यान ही नहीं देगा।

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