आत्मा और जीवात्मा से जुड़ा सबसे बड़ा भ्रम || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि | तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही || २, २२ ||
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक २२
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भगवान कृष्ण कहते हैं कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।
ये जीवात्मा कौन है, सूक्ष्म शरीर है, मन है? और सूक्ष्म शरीर को अहम् वृत्ति और तादात्म्य के सम्बन्ध में कैसे समझें? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: जिसे जीवात्मा कह रहे हैं कृष्ण, वो वही है जिसे जीव आत्मा समझता है। आत्मा माने 'मैं', जो तुम वास्तव में हो। तुम्हारा असली नाम, असली पहचान, उसका नाम है - आत्मा। पर जीव आत्मा में तो जीता नहीं। जीव का केंद्र क्या होता है? अहम्। तो जीव जिसे आत्मा समझे, वो हुआ जीवात्मा, अहम्।
तो आत्मा और जीवात्मा बहुत दूर-दूर की बाते हैं। आत्मा और जीवात्मा को एक मत समझ लेना। आत्मा परम सत्य है और जीवात्मा परम भ्रम है। और चूँकि जीव अहम् को ही आत्मा का नाम देता रहता है, कहता रहता है न, “मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ” तो उसने तो 'मैं' के साथ न जाने क्या-क्या जोड़ दिया — अहम् को ही आत्मा बना डाला।



