
Practices do not determine the core of spirituality; consciousness does. If someone is feeding you practices in the name of spirituality, then that fellow is either ignorant or cunning or both, which is actually the same thing.



प्रश्नकर्ता: सर, मास फिनोमेना नहीं।
प्र२: सर, लगता है कि जानते नहीं हैं।
आचार्य:…
We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?

"मुझे आश्चर्य होता है ये देखकर कि कैसे भगवान ने चार करोड़ बंगालियों को बनाते हुए, एक आदमी को भी जन्म दिया।"
जिस 'आदमी' की बात यहाँ गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर कर रहे हैं, उनके लिए एक बार गांधी जी ने कहा था,
"विद्यासागर की उपाधि उन्हें उनके ज्ञान के लिए…

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! डू वी नीड टू क्रिएट गॉड्स ऑर वी हैव ऑलरेडी (क्या हमें भगवान बनाने होंगे या वो पहले से हमारे पास हैं)? जैसे हम कुछ अच्छी क्वालिटीज़ हम जो पढ़ते हैं शास्त्रों में, कई बार हमारे पास नहीं होती है, या वो हमारे पास है, हम अनदेखा…

The building is raised on a weak foundation, and now you want to penalize everybody who comes and shakes it up even a little? You don't do this. Why did you allow this building to stand on such a weak foundation, and now you are trying to protect it through legislation? What kind of stupidity is this?

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य प्रशांत जी! हमारे लिए समय निकालने के लिए। अभी जैसे हम लोग देख रहे हैं कि कोरोना काल चल रहा है और जीवन का भी काफ़ी लॉस (हानि) हुआ है, जीवनी का भी काफ़ी लॉस हुआ है। ये क्या एक कलेक्टिव मॉर्निंग (सामूहिक शोक) जो हो रही…

प्रश्नकर्ता: सत श्री अकाल आचार्य जी। आज सुबह से टीवी (दूरदर्शन) पर देख रहा हूंँ कि हमारे सिख भाई अफ़गानिस्तान से जान बचाकर भागने पर मजबूर किये जा रहे हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब जी को सिर पर धारण करके बुरी हालत में उन्हें देखकर मुझे दुख भी है और गुस्सा…

Acharya Prashant: Hell is a place where you get a lot of sympathy, consolation, condolence, and commiseration. You're told that we agree that you are in a miserable state. Your neighbor comes to you, puts his hand on your shoulder, and with a grave face tells you that you are…

ये जो पैसे की अंधाधुंध दौड़ है, प्लेसमेंट, प्लेसमेंट — ये नशा कैसे नहीं है? बताओ न!

प्रश्नकर्ता: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति या कहें शख्सियत आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं। इन्होंने आइआइटी से इंजीनियरिंग की, आइआइएम से…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं राजस्थान से हूँ। राजस्थान भारत के उन राज्यों में से है जो लिंगानुपात की दृष्टि से पिछड़े हुए राज्य हैं। मेरा प्रश्न ये है कि आज के समाज में भी जब परिवार में बिटिया का जन्म होता है तो एक असंतोष का माहौल बनता है,…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं कसौली हिमाचल प्रदेश का रहने वाला हूँ, शिमला के पास में ही है बिलकुल। यहाँ पर पिछले कुछ सालों में टूरिज्म बहुत बढ़ गया है। और उससे जॉब्स तो क्रिएट हो रही हैं, परकैपिटा इन्कम भी बढ़ रही है। बल्कि रीसेंटली मैंने एक स्टडी पढ़ी…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! मेरा नाम ऋचा है। आप तीन महीने पहले मुझे यूट्यूब में आप मिले और तब से मुझे लग रहा है कि हाँ, कुछ हो सकता और कुछ बदलाव हम कर सकते हैं अपनी ज़िंदगी में। अन्यथा काफ़ी कुछ मन में चल रहा था।
मेरा जो व्यक्तित्व…

धर्म आपके शरीर की रक्षा थोड़ी करेगा। रक्षा शब्द की जब बात आती है तो ये समझना पड़ेगा कि आपको बड़ा ख़तरा क्या होता है। ख़तरे के संदर्भ में ही रक्षा शब्द का कुछ अर्थ है ना। ख़तरा हो तभी रक्षा की बात होती है। ख़तरा ही नहीं तो रक्षा शब्द अर्थहीन है। हाँ तो सबसे पहले तो ये जानना पड़ेगा कि हमें ख़तरा क्या है? एक मनुष्य को सबसे बड़ा ख़तरा क्या है? क्या मृत्यु? क्या किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि उसका शरीर गिर जाएगा, मृत्यु हो जाएगी — ये होता है? किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि मृत्यु आने से पहले वो मुक्त नहीं हो पाएगा। ये होता है ख़तरा।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। कोटि-कोटि नमन। मेरा प्रश्न ‘घर-घर उपनिषद्’ से सम्बन्धित है। ये जो अभियान है, यह मुझे बहुत उत्साह दे रहा है। और मैंने पाया है कि उपनिषदों से आम लोगों का परिचय नहीं है। मेरा ख़ुद परिचय इक्कीस-बाइस की उम्र में हुआ था। और जब कि मुझे…

आचार्य प्रशांत: स्त्री में इस बात की कभी बहुत प्रशंसा नहीं की गयी कि उसके पास दमदमाता, दहकता रूप है। और आज भी अगर आप थोड़ा देहात की तरफ जाएँगे, जहाँ पाश्चात्य हवा ज़रा कम बहती हो, तो आप पाएँगे कि अगर कोई लड़की बहुत ज़्यादा रूप-श्रृंगार करके घूम रही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कभी दहेज जैसी कुप्रथा के ऊपर कुछ क्यों नहीं बोलते?
आचार्य प्रशांत: विचार नहीं आया कि इस पर भी अलग से कुछ बोला जाना चाहिए। संबंधों पर खूब बोला है, प्रेम पर बोला है, माया पर बोला है, लालच पर बोला है, झूठ पर बोला है।…

जबकि ये जानी-समझी बात है कि स्मृति में जो कुछ लिखा है, उसे श्रुति-सम्मत होना चाहिए, और स्मृति अगर श्रुति का उल्लंघन कर रही है तो स्मृति को हटा दो, श्रुति की बात मानी जाएगी, क्योंकि श्रुति वो देती है जो कालातीत सत्य है। और स्मृति वो बातें कहती है जो उस समय के समाज में प्रचलित हैं। उस समय समाज में जो प्रचलित है, उन चीज़ों को माध्यम बनाकर, सहारा बनाकर, उन चीज़ों को भी सम्मान देकर किसी तरह से धर्म को अशिक्षित लोगों तक भी पहुँचा सको, इसके लिए स्मृति थी।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुजी। मैं पुलिस ही हूँ और थाना एस.एच.ओ.(थाना प्रभारी) भी हूँ, तो मुझे एक दिक्कत आ गई है– आपके काम से मैं बहुत प्रभावित हुआ और थाना मैं ये सब करने लगा, अच्छा लगा; पहले तो बहुत टेंशन में आया, जब पहले आया तो नौकरी छोड़ने का…

आचार्य प्रशांत: अद्वैत वेदान्त झूठ नहीं बोल सकता इसलिए बहुत प्रसिद्ध नहीं हो पाया। सम्मानित बहुत हुआ, प्रचलित नहीं हो पाया। झूठ बोलना नहीं जानता। बाक़ी इंसान का ऐसा है कि वो दर्शन के नाम पर भी झूठ ही चलाता है। अद्वैत अकेला होता है जो झूठ बोलने वाले की…

जिसने शोषण करा है न, वो लोक धर्म है बेटा। वो सनातन धर्म नहीं है, सनातन धर्म नहीं है। सनातन धर्म में केंद्रीय स्थान श्रुति का है, श्रुति की बहुत केंद्रीय बात ये है कि ये जो तुम अपने आप को देह माने बैठे हो न, तुम देह नहीं हो, “नाहम् देहास्मि।” और अगर आप देह नहीं हो, तो जाति कहाँ से आ गई? श्रुति जाति को किसी हालत में नहीं मानती है। यहाँ तक कि आप जिसको वर्ण व्यवस्था कहते हो, उसका भी स्थान नहीं है। क्योंकि जब आप देह हो ही नहीं, तो वर्ण किसका? जो पूरा वर्णाश्रम धर्म है उसको श्रुति मानती ही नहीं है।

Questioner (Q): Good evening, sir. Sir, because this conference is on Psychology and Technology, I would like to talk about something that’s very, very close to this. So, there’s a very famous quote by Carl Young, and I’ll use my phone so that I don’t get it wrong. It says,…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। हम पाकिस्तान से हैं। वैसे तो आप हिंदुओं के गुरु हैं, लेकिन हम मुसलमान भी आपको आलिम-फ़ाज़िल की तरह देखते हैं। आपके चाहने वाले पाकिस्तान में भी कम नहीं हैं। खासकर उपनिषद् और गीता पर आपकी तक़रीर को हम बड़ी इज्ज़त से सुनते हैं।
हमारा प्रश्न…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपका स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतिहास में ये भी देखा गया है कि धर्म परिवर्तन भी सबसे ज़्यादा भारतीयों का या स्पसिफिक्ली (विशेष रूप से) कहूँ तो हिन्दुओं का ही ज़्यादा हुआ है; तो उस पर भी मैं आपसे कुछ स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतनी आसानी से…

प्रश्नकर्ता: (माताजी से प्रश्न पूछते हुए) आपकी तरफ़ से कुछ सुनना चाहूँगा। कुछ चीज़ें जो बस़ हमने कल फ़िल्मों में देखी। और मुझे लगता है की फ़िल्म में जो दिखाया गया वो बहुत कुछ था। उसने बहुत कुछ चीज़ें फैक्ट्स (तथ्य) थे, पर आपके साथ कुछ ऐसा हुआ या जो…

प्रश्नकर्ता: “अहिंसा परमो धर्म:।” श्लोक के इस अंश में एक तरफ़ तो भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा परमो धर्म:” और दूसरी तरफ़ वो गीता का ही इस्तेमाल कर रहे हैं, अर्जुन से हिंसा करवाने के लिए। तो ये बात तो सरासर गलत है। कृष्ण हिंसा करवा रहे हैं और…

Questioner: Namaste Acharya ji. My question is that I see many institutions are fueling the concept of Maya. Because I have seen on many premier institutions having Upanishadic phrases as their mottos—Na hi jnyānen sadṛushan pavitramih vidyate, Téjasvi nāvadheetamastu, sā vidyā yā vimuktaye. But at its…

Acharya Prashant: Before we say love for the country, we should know what is this thing called country. If we don’t know what is country then whom do we love? If we don’t know what country is then what do we call love as?
This is just a machine (pointing…

आचार्य प्रशांत: तो ले देकर एक नए तरह के अध्यात्म और एक नए तरीके के धर्म का निर्माण किया जा रहा है चोरी-छुपे। एक ऐसे अध्यात्म का निर्माण किया जा रहा है जिसमें धर्मग्रंथों के लिए कोई स्थान नहीं है। जिसकी कोई आत्मा ही नहीं है। उसमें किस चीज़ के…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी! पहले मैं सोशल मीडिया पर ज़्यादा सक्रिय नहीं था। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय आने के बाद, मैं थोड़ा ज़्यादा सक्रिय हो गया हूँ। तो मैं देखता हूँ, सोशल मीडिया पर आजकल बहुत सारे बाबा लोग हैं, जो अपना आधिकारिक ऐप बना लिये हैं। और ऐड के माध्यम…

प्रश्नकर्ता: सब ही भूमि बनारसी, सब नीर गंगा तोय। ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय।। ~गुरु कबीर साहब
आचार्य जी, मेरी समझ से इस दोहे का ये अर्थ है कि ज्ञानीजन कोई भेदभाव नहीं करते। उनके लिए सिर्फ़ गंगाजल ही पवित्र नहीं होता, बल्कि हर जगह का जल…

प्रश्नकर्ता: ये जो परिस्थितियाँ वर्तमान में चल रही हैं जिसमें असत्य की सत्य के ऊपर जीत देखी जाती है तो ऐसी परिस्थितियों में एक मनुष्य अपने आदर्शों को कैसे कायम रख सकता है? कैसे दृढ़ संकल्प रह सकता है? उसके लिए आप कुछ ज्ञान या दिशानिर्देश दें।
आचार्य प्रशांत: पहली…

आचार्य प्रशांत: इसलिए तुम्हारा दिल टूटा हुआ है, क्योंकि तुम्हें अभी भी पुराने, सामाजिक और आध्यात्मिक प्रचार में बहुत विश्वास है। तुम उस प्रोपगेंडा (झूठ जिसे सच की तरह दिखाने की कोशिश की जाए) के मारे हुए हो जिसने तुमको बता दिया है कि तुम आत्मा हो और ताऊ इंद्र…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले कुछ समय से महिलाओं के प्रति दुराचार की घटनाएँ बहुत सामने आ रही हैं। यह सब देख कर मन बहुत खिन्न है। कृपया कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: देखो, मैं तीन की बात करता हूँ हमेशा। एक होती है आत्मा, सच्चाई; दूसरे होते हैं सांसारिक प्रभाव और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार! मेरा नाम माणिक पांडे है, मैं हंसराज कॉलेज का विद्यार्थी हूँ और इतिहास में बीए ऑनर्स कर रहा हूँ। मेरा आपसे ये प्रश्न था कि क्या आध्यात्मिकता के लिए हमें किसी धर्म या आस्था से जुड़ना ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: किताबी तौर पर, सैद्धान्तिक तौर पर—नहीं।…

प्रेम तो होश की बात होती है, हम तुम्हें छुएँगे भी सिर्फ़ तब जब तुम अपने पूरे होशो-हवास में हो और प्रेम का क्षण है। नहीं तो इंसान कैसा है, जो किसी बेहोश इंसान को छू भी सकता है।

मेंस्ट्रुएशन को लेकर जो बड़ा हौवा है, उसको जो एक टैबू की तरह हम देखते हैं, उसका कारण ये नहीं है कि हम मेंस्ट्रुएशन को लेकर अनकंफ़र्टेबल रहते हैं। उसका कारण ये नहीं है कि हमें अजीब लगता है, असंगत लगता है कि ये मेंस्ट्रुएशन क्या चीज़ होती है। उसका कारण थोड़ा उससे आगे का है एक कदम, हम सेक्स को लेकर ही अभी तक सहज नहीं हो पाए हैं। हमारी असहजता मेंस्ट्रुएशन, मासिक-चक्र से उतनी नहीं है, हमारी असहजता सीधे-सीधे सेक्स से है। और उसके पीछे बड़ा गहरा कारण है, जो अगर हम समझेंगे तो जीवन को ही समग्रता से समझने में मदद मिलेगी।

Questioner: Good evening sir. I’m…. and I’m a PhD student here at IIT, Kanpur. Sir, I have a very personal question. Being a girl child, especially in India, comes with very different sets of consequences. Despite being given equal opportunities like education and skills, at the end where we’re supposed…

Formal education is important to the extent the body is important. The less the body-identification, the less is the importance of object-centric education. A person's attachment to material possessions, driven by societal values, leads to poverty and duality. Poverty, unlike the natural world, is man-made and rooted in the desire to accumulate. While education enables material progress, it doesn’t address deeper issues of self-identity and existence.

प्रश्नकर्ता१: आचार्य जी, थैंक यू अपना समय देने के लिए, हम सभी को। तो हम सभी यहाँ पर आपस में एक विषय पर स्पेशली हाल ही में जो तीन घटनाएँ घटी हैं उनके ऊपर चर्चा कर रहे थे, और चर्चा करते वक़्त हमने यह पाया कि वो जो घटनाएँ हैं…

Vedānta is about the person gaining liberation from both of these—body identification and mental conditioning. So, ideally spirituality should be the woman’s best friend. But practically, evidence has been rather mixed; in fact, evidence has been that religion historically has been on the side of the oppressors when it comes to the women, oppressors of the women. The reason is that religion itself has not been well understood. Religion itself has been a victim of contamination, and when religion is contaminated then religion becomes a tool towards exploitation of women.

There is a search within the human being, always for the greatest, the absolute, and that is what differentiates humans from animals. India was fertile, and there was abundance. You had ample leisure, and in that leisure there was space for intellectual inquiry. The sages and the seers would talk to each other purposelessly. And from that purposeless discussion, from silent observation of life for hours, days, months, and years, came those insights that you today recognize as Indian philosophy.

There is only one Dharma. And that is to attain liberation or peace, to gain freedom from your bondages, to gain freedom from your inner chaos and noise, to gain freedom from your inner falseness. Gaining freedom from inner falseness is more commonly known as Truth realization. It is a euphemism—a very decorated euphemism. It’s not really Truth that is really realized; it is falseness that is dropped.

डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है।

किसी ग्रंथ में कुछ खटका, तो हमने पूरी परंपरा ही ठुकरा दी, ठीक वैसे जैसे साल भर पढ़ाई से भागे छात्र फ़ेल होकर किताब ही जला दें। या हम सब ग्रंथ अपने पास सजा लेते हैं, पर उन्हें अलग-अलग मानकर, और फिर दो प्यारी बातें हमें दो उलटी दिशाओं में खींचने लगती हैं: ज्ञान चुनें या भक्ति? दोष ग्रंथों का नहीं, हमारी नासमझी का है, और यह बँटवारा ही वह ज़मीन है जिस पर हमारी अलग पहचान टिकी है। अगर गीता, बुल्ले शाह और लाओ त्ज़ु एक ही बात कह रहे हों, तो हम आख़िर किस बात पर लड़ रहे हैं?