धर्म का पता नहीं, पर कट्टरता पूरी है || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, सर! वर्तमान में यह देखा जा रहा है कि धार्मिक कट्टरता बहुत दिखाई दे रही है। चूंकि मेरा जन्म एक धर्म विशेष में हुआ है, और इसके कारण मेरी एक धार्मिक पहचान भी है। और इस पहचान के कारण जो एक दूसरा धर्मविशेष है, उसकी धार्मिक कट्टरता के कारण मैं अपनेआप को बहुत असुरक्षित महसूस करता हूँ।
तो इससे जुड़े मेरे दो प्रश्न हैं। पहला यह है कि 'मैं अपनी सुरक्षा के लिए यदि किसी संगठन के एक सदस्य के रूप में काम करता हूँ, तो वह कहाँ तक सही है?' दूसरा प्रश्न यह है कि 'वर्तमान में जो धार्मिक कट्टरता है, उसका हम आध्यात्मिक दृष्टि से कैसे सामना करें, या किस प्रकार से इसको दूर करें हम?'
आचार्य प्रशांत: धार्मिक कट्टरता से आशय क्या होता है हमारा? धर्म का मतलब तो होता है— स्वयं को जानना, जीवन को जानना। और जानकर समझना कि जीना कैसे है। अपने अंधेरे को, भ्रम को, बन्धनों को पहचानना और इस तरह जीना कि अँधेरा रोशन हो जाए, बन्धन ढीले हो जाएंँ, मन मुक्ति की ओर बढ़े, यह धर्म है।
अगर यह धर्म की मूल और एकदम सीधी-सादी परिभाषा है, तो यह धार्मिक कट्टरता क्या चीज़ होती है? जैसे कि कट्टरता धार्मिक हो सकती है! यह बात हुई धर्म के बारे में।
अब कट्टरता की क्या परिभाषा है? कट्टर माने क्या? यदि कट्टर माने वह, जो पूरी तरह से धर्मनिष्ठ है, धर्म को ही समर्पित है; तब तो कट्टर होने में कोई बुराई नहीं है। क्योंकि धर्म माने क्या? धर्म माने वो, जो जीने का सबसे सही तरीक़ा है। जो आपको सोचना चाहिए, समझना चाहिए, और अपने जीवन के प्रत्येक कर्म में ध्यान रखना चाहिए, सो धर्म है।
और अगर कट्टरता का मतलब है, धर्म को पकड़कर चलना, धर्म से चिपककर चलना, तब तो कट्टरता में कोई बुराई ही नहीं है। लेकिन अगर कट्टरता का कुछ और ही मतलब है, तो वो धार्मिक नहीं हो सकती। तो जब आप कहते हो धार्मिक कट्टरता, तो इन दोनों शब्दों में से ज़ोर किस पर है? इन दोनों शब्दों में से केंद्रीय कौन है? इन दो में से हाईलाइटेड कौन है? यदि धार्मिक है, तो कोई समस्या नहीं है। फिर उसको कट्टरता बोलो,



